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बैर कराती मधुशाला!

- सलमान रावी (रायपुर)

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छत्तीसगढ़
BBC
ग्रामीण इलाकों में लगभग 270 शराब की दुकानों को बंद करने के बाद छत्तीसगढ़ की सरकार ने अब राज्य में शराब मुक्ति के लिए एक नया अभियान शुरू किया है। इस अभियान में मुख्य रूप से महिलाओं को शामिल किया गया है, जो लोगों पर शराब छोड़ने के लिए दबाव बनाने का काम कर रही हैं।

भारत माता वाहिनी के नाम से गठित इस दल में शामिल महिलाएं शराबियों के घर के बाहर भजन गाकर उन पर सामाजिक दबाव डालने का काम कर रही हैं ताकि वे शराब से तौबा कर लें।

छत्तीसगढ़ की सरकार ने इस शराब व्यसन मुक्ति अभियान की शुरुआत स्वतंत्रता दिवस से की तो है, लेकिन इससे भी पहले उसने विशेषकर ग्रामीण इलाकों में लगभग 270 शराब की दुकानों को बंद करने का निर्णय भी ले लिया है।

रायपुर के चंदखुरी गांव में मेरी मुलाकात महिलाओं के ऐसे ही एक दस्ते से हुई, जो भजन का सहारा लेकर शराबियों के घर के सामने डेरा डाले हुए थीं। 'ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सम्मति दे भगवान' वह तब तक गाकर धरना देती रहीं, जब तक शराबी ने शराब से तौबा करने का वादा नहीं कर लिया।

अभियान : बाद में इस समूह की महिलाओं ने बताया कि वे भजन का सहारा लेकर ही अपने अभियान को चला रही हैं।

इस दल में से एक महिला नें बीबीसी को बताया, 'अब किसी के साथ जोर-जबरदस्ती तो नहीं कर सकते। समझा ही सकते हैं और सामजिक दबाव ही बना सकते हैं। यही हम कर रहे हैं।'

महिलाओं का कहना है की शराब धीरे-धीरे ग्रामीण इलाकों में लोगों को खोखला करती जा रही है। ग्रामीण इलाकों के किसान और मज़दूर अपनी कमाई का ज़्यादातर हिस्सा शराब में ख़र्च कर दे रहे हैं। इस समूह में शामिल महिलाओं का कहना है, 'अब दिनभर मजदूरी कर अगर सौ रुपए कोई कमाता है, तो उसमें से 60 रुपए की शराब पी जाता है तो घर के लिए क्या बचा।'

एक दूसरी वृद्ध महिला कहती हैं कि शराब की वजह से गांव में मजदूर है, तो वह किसी काम का नहीं। अगर किसान भी है, तो वह भी किसी काम का नहीं क्योंकि शराब की वजह से इनकी ज्यादातर कमाई मधुशालाओं में चली जाती है।

इस अभियान में औरतों के आने से समाज में एक दबाव जरूर बन गया है, ऐसा जानकारों का मानना है। शराब की लत का सबसे बुरा दंश घर की महिलाओं को झेलना पड़ता है, क्योंकि नशे में धुत घर का मुखिया मार-पीट पर आमादा हो जाता है।

अभियान अपनी जगह पर, सरकार की इस पहल से शराबी नाराज हैं। वे नाराज हैं, तो हुआ करें, इससे सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता। कम से कम छत्तीसगढ़ बेवेरेज कॉरपोरशन के अध्यक्ष देवजी भाई पटेल तो ऐसा ही मानते हैं।

वे कहते हैं, 'शराबी सरकार को कोस रहे होंगे। कुछ पी कर तो कुछ बिना पीये। मगर एक दिन उनकी समझ में आएगा कि सरकार ने शराब की दुकाने बंद कर अच्छा काम किया है।'

देवजी भाई पटेल का कहना है कि शराब के सेवन का सबसे ज्यादा दंश महिलाएं ही झेलती हैं। इसलिए सरकार ने उन्हीं के जरिए इस शराब व्यसन अभियान को चलाने का फैसला किया है। शराब व्यसन मुक्ति कार्यक्रम के तहत प्रदेश के सात ज़िलों के 15 विकास खंडों में 75 गांवों को शामिल किया गया है।

भारत माता वाहिनी के प्रत्येक दल में कम से कम 15 और ज्यादा से ज्यादा 100 महिलाओं की टोली बनाई गई है। वाहिनी में किसे शामिल किया जाए, इसके लिए गांव के स्तर पर ही सरपंच, सचिव, स्वास्थ्य कार्यकर्ता और सेवा सहायता समूह के प्रतिनिधियों को रखा गया है।

तो क्या छत्तीसगढ़ में मधुशालाएं पूरी तरह बंद हो जाएंगी? मैंने पूछा देवजी भाई पटेल से, जो स्वीकार करते हैं कि मधुशालाएं बंद नहीं हो सकतीं। अलबत्ता जागरूकता से शराब पीने का चलन कम किया जा सकता है।

आरोप : लेकिन छत्तीसगढ़ की विधान सभा में विपक्ष के नेता रवींद्र चौबे का आरोप है कि सरकार का शराब व्यसन मुक्ति अभियान दिखावा मात्र है। वे कहते हैं कि मधुशालाएं बंद कर सरकार शराब के ठेकेदारों की ही मदद कर रही है।

वे कहते हैं, 'अगर एक चौराहे पर महात्मा गांधी के साथ मुख्यमंत्री का फोटो लगा हुआ है तो दूसरे चौराहे पर किसी शराब के ठेकेदार के साथ उनका फोटो लगा हुआ है। अब भी जो 270 शराब की दुकानों को सरकार ने बंद करने का निर्णय लिया है उनके नजदीक की शराब की दुकानों में जो शराब की खपत की अधिकतम सीमा होती है उसे बढ़ा दिया गया है।'

रवींद्र चौबे कहते हैं कि इस व्यवस्था से ठेकेदारों को ही फायदा पहुंच रहा है। कहा जाता है कि राजनीति में हमेशा से शराब का बड़ा प्रभाव रहा है।

शराब ने राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने और जीतने में खूब मदद की है। जहां छत्तीसगढ़ की सरकार राज्य में पूर्ण शराबबंदी लाना चाहती है, वहीं सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेता इससे इत्तेफाक नहीं रखते, खास तौर पर तब जबकि 2013 में विधान सभा के चुनाव होने वाले हों।

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