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सुर के अस्सी साल

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लता मंगेशकर
-प्रतीक्षा घिल्डियाल, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
'कमबख्त कभी बेसुरी होती ही नहीं,' जाने-माने शास्त्रीय गायक बड़े गुलाम अली खाँ ने लता मंगेशकर के लिए कहा था।

BBC
आज के युवा फिल्मकार इम्तियाज अली कहते हैं कि वो जब एक सुर से दूसरे सुर में जाती हैं तो पता ही नहीं लगता कि इसमें उन्होंने कोई मेहनत भी की है। बड़े गुलाम अली खाँ और इम्तियाज अली के बीच कितने दशक गुजर गए हैं, लेकिन सुर से भटकने का सवाल कहाँ है।

गायिका शुभा मुद्‍गल कहती हैं कि रियाज करके गायक अपनी गायिकी को तो सुधार सकता है लेकिन जो भाव लता की गायिकी में है वो आसानी से नहीं आता।

प्यार से 'दीदी' कही जाने वाली लता ने अपनी फिल्मों फिल्मों में गायिकी का सफर 1942 में 13 साल की उम्र से ही शुरु कर दिया था। लेकिन असली पहचान मिली 1949 में आई हिंदी फिल्म महल के गाने 'आएगा आने वाला' से।

महल का 'आएगा आने वाला' तब था और रंग दे बसंती का 'लुका छुपी' अब है। लता के लिए गाना गाना ऐसा है जैसे साँस लेना हो।

अभिनेत्री वैजयंतीमाला कहती हैं कि उनके गानों में लता की आवाज होती थी तो नाचने का मजा ही कुछ और होता था। मुझे शास्त्रीय नृत्य में बहुत दिलचस्पी थी और जब लता उस तरह के गाने गाती थीं तो ये संगम अद्‍भुत रहता था जैसे कि मधुमती फिल्म का 'बिछुआ' गाना।

शर्मीला टैगोर का कहना है कि लताजी की आवाज उनकी अपनी है। कई गायक गाते हुए कोई और बनने की कोशिश करते हैं तभी सदाबहार नहीं रह पाते। लता की बात ही अलग है।

वैसे इसमें भी कोई दो राय नहीं कि लता को अपने जमाने के बढ़िया से बढ़िया संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिला और इससे उनकी प्रतिभा में और निखार आया।

संगीतकार रवि कहते हैं कि मेरी फिल्म घूँघट में लता ने 'लागे न मोरा जिया' गाना गाया था। उसमें एक ताल ऐसी थी जो आज भी अच्छे-अच्छे गायक नहीं निभा सकते। लता ही ऐसी हैं जो इस ताल को निभा गईं।"

इसे कुदरत का करिश्मा ही कहेंगे कि 60 साल से ज्यादा से गाती आ रही हैं लता। साठ और सत्तर के दशक में तनूजा जैसी अभिनेत्री के लिए गाने गाए तो आज उनकी बेटी काजोल भी लता के गानों पर होठ हिलाती नजर आ जाती हैं। जहाँ बबीता के लिए गाने गाए वहीं आज करीना कपूर के लिए भी गा रही हैं।

रानी मुखर्जी कहती हैं कि मैं कितनी खुशकिस्मत हूँ कि मेरे लिए भी लताजी ने गाना गाया है। फिल्मकार श्याम बेनेगल कहते हैं कि उनके जैसा कोई और हुआ ही नहीं हैं। एक मिस्र की उम कलसूम थीं और एक लता हैं। पंडित हरि प्रसाद चौरसिया की राय है कि कभी-कभार गलती से ऐसा कलाकार पैदा हो जाता है।

लता को सिर्फ सुर पर ही नहीं, बोल पर भी कमाल हासिल है। तभी तो गजल हो या भजन, फिल्मी गाना या शास्त्रीय संगीत, सभी धुनों पर लता की आवाज खूब सजती है। हाँ, कुछ हद तक तो ये उनकी मेहनत है, लेकिन ऊपर वाला भी कम मेहरबान नहीं रहा है।

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BBC
संगीतकार प्रीतम कहते हैं कि उनका गाया गाना 'अल्लाह तेरो नाम' मेरे मन को बड़ी शांति देता है। मैं जब जिंदगी के एक मुश्किल दौर से गुजर रहा था तो ये गाना रोज सुनता था और मुझमें नई उम्मीद जगती थी। संगीत के जानकार कहते हैं कि एक ही गाने में लता तरह-तरह के भावों का एहसास दिला देती हैं और सुर से भी नहीं भटकतीं।

ऊषा उथ्थुप के मुताबिक उनका गाना 'अजीब दास्ताँ है ये' कितना खूबसूरत है। लताजी ने सचमुच ऐसा गाया है जैसे वो जलन से मर रही हों। फिल्म में भी हीरोइन ये गाना तब गाती है जब उसका प्रेमी किसी और से शादी कर लेता है। गाने में एक लाइन है 'मुबारकें तुम्हें कि तुम किसी के नूर हो गए', इसे लता जी ने ऐसे गाया कि बस पूछिए मत। वे कहती हैं कि लता दीदी की दी हुई मिश्री उन्होंने अब भी संभाल के रखी हुई है।

आज के युवा संगीतकार भी लता की कस्में खाते हैं। उनके साथ काम करने के अवसर को ही वो उनका आशीर्वाद समझते हैं। मैं जब भी उनका गाना मेरा साया सुनता हूँ मेरी आँखों में आँसू आ जाते हैं, कहते हैं गायक मोहित चौहान।

सिर्फ मोहित ही नहीं सुनिधि चौहान भी लता का एक गाना सुनकर रो पड़ती हैं। गाना है फिल्म हँसते जख्म का 'आज सोचा तो आँसू भर आए'। और बाबुल सु्प्रियो के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है जब वो सुनते हैं फिल्म मिली का 'मैंने कहा फूलों से'।

जितने तरह के लोग उतने तरह के भाव जगा सकती हैं लता। शोखी, शरारत, गम, प्यार, जलन, भक्ति - उनकी आवाज सब समेटे हुए है। कहने वाले कहते हैं कि हजार साल में लता जैसा एक कलाकार पैदा होता है।

ऐसा कलाकार फिर पैदा होगा या नहीं, ये तो कहना मुश्किल है। लेकिन ये जरूर है कि आप जिंदगी के किसी भी मोड़ पर हों, किसी भी मूड में हों, लता का गाया कोई न कोई गाना होगा जो याद आएगा और आपको लगेगा - ये तो मेरे ही दिल की आवाज है।

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