अभी पिछले दिनों जितनी हिन्दी फिल्में साउथ इंडिया की फिल्मों पर बनी हैं, उनमें सबसे ज्यादा आशा जगाने वाली फिल्म है "फोर्स"। इस आशा की सबसे बड़ी वजह है फिल्म के डायरेक्टर निशिकांत कामत। निशिकांत कामत बहुत ही बढ़िया डायरेक्टर हैं। मराठी फीचर फिल्म "डोंबिवली फास्ट" के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड भी मिला था। मराठी में तो वे फिल्में बनाते ही हैं, तमिल में भी बना चुके हैं। इसके अलावा जो हिन्दी फिल्में उन्होंने बनाई हैं, वे आर्थिक तौर पर ज्यादा सफल भले ही नहीं रही हों, उन्होंने समीक्षकों का ध्यान खींचा है और सराहना पाई है। उनकी हिन्दी फिल्मों में हैं - "मुंबई मेरी जान", "404 एरर नॉट फाउंड" और एक फिल्म सात साल पहले बनाई थी।
"404..." एकदम नए ढंग की हॉरर फिल्म थी। "मुंबई मेरी जान" सांप्रदायिक सोच के खिलाफ बहुत ही ताकतवर संदेश थी। यह फिल्म पुरस्कृत होनी थी, धर्मनिरपेक्ष सरकारों वाले प्रदेशों में टैक्स फ्री होनी थी। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हाँ... निशिकांत खुद एक्टर भी हैं। "404" में उन्होंने प्रोफेसर का रोल किया था और लीड कैरेक्टर से बढ़िया एक्टिंग उनकी थी।
"फोर्स" उनकी पहली हार्डकोर कमर्शियल फिल्म है। विपुल शाह इसमें पैसा लगा रहे हैं और जाहिर है इस बार आदमी पहचानने में उन्होंने भूल नहीं की है। दक्षिण भारतीय फिल्मों के रिमेक से "सुपर हीरो" का दौर फिर लौटा है। हास्य फिल्मों का समय अब खत्म हो चुका है। "तीसमार खाँ" और "चाँदनी चौक टू चाइना" जैसी फिल्मों का फ्लॉप होना यही बताता है कि थोपा हुआ हास्य अब कुछ बरस तक नहीं चलने वाला। इस हिसाब से "फोर्स" सही समय पर रिलीज हो रही है।
इस समय साउथ की फिल्मों को दर्शकों द्वारा हाथोहाथ लिया जा रहा है। मगर इसके साथ ही निशिकांत कामत के सामने एक चुनौती भी है। इस कमर्शियल फिल्म में वे अपनी कला को कैसे बचाए रखेंगे? यही सवाल उनके प्रशंसकों के सामने भी है।
निशिकांत को यह भी साबित करना है कि वे कोरे आर्ट फिल्म के शख्स नहीं हैं, उनमें कमर्शियली कामयाब होने की भी संभावना है। इस फिल्म में जॉन अब्राहम और जेनेलिया डिसूजा तो खैर हैं ही, एक नया खलनायक भी है। इतनी बड़ी फिल्म में खलनायक का रोल मिल रहा है विद्युत जामवाल को। ये फिल्म उनके लिए भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि निशिकांत कामत एक विशुद्ध खलनायक इंडस्ट्री को दे देते हैं तो ये उनका अहसान ही होगा। खलनायकों का भी इस वक्त काल ही पड़ा हुआ है।
फिल्म के प्रोमो बता रहे हैं कि फिल्म बढ़िया है और उसमें बहुत कुछ चौंकाने वाला है। मगर एक किस्म का डर भी लग रहा है। ये डर उस किस्म का है जैसे फुटबॉल मैच में पेनल्टी शूटआउट के ज़रिए फैसला हो रहा हो और अपनी टीम के हर खिलाड़ी का शॉट गोल में तब्दील हो रहा हो। हर बार जब पेनल्टी शूट के ज़रिए गोल होता है, ये आशंका बढ़ जाती है कि अब एक न एक शॉट तो जरूर चूकेगा। अभी तक "दबंग", "सिंघम", "रेडी", "बॉडीगॉर्ड..." जैसे सभी शॉट गोल में तब्दील हुए हैं। "फोर्स" पाँचवाँ शॉट है।