Bollywood Article %e0%a4%b2%e0%a4%b5 %e0%a4%95%e0%a4%b2 %e0%a4%86%e0%a4%9c %e0%a4%94%e0%a4%b0 %e0%a4%95%e0%a4%b2 109092300084_1.htm

Hanuman Chalisa

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

लव ...कल आज और कल

Advertiesment
इम्तियाज अली
PR
एक जमाना था कि जब लड़के और लड़कियों को मिलने नहीं दिया जाता था। लड़कियों को तो घर से निकलने की ही मनाही थी। उस ज़माने में भी लव होता था और लव मैरेज भी। पर चुनाव की ज्यादा गुंजाइशें नहीं थीं। लड़की ज़रा सी देर के लिए घर से निकली और जो भी लड़का पहले सामने आया उसी से मोहब्बत कर डाली। लड़कों को भी लड़कियाँ देखने को नसीब नहीं होती थीं, लिहाजा जो भी लड़की पहले मुस्कुराकर देख ले बंदा उसी पर फ्लैट...।

हरिशंकर परसाई ने अपने एक व्यंग्य "प्रेमियों की वापसी" में इसका ़जिक्र किया है। इसमें प्रेमी-प्रेमिका आत्महत्या करके स्वर्ग जाते हैं। वहाँ प्रेमिका किसी और से मेल-जोल बढ़ाने लगती है। प्रेमी ऐतराज़ करता है तो प्रेमिका कहती है कि मैं तो किसी और को चाहती थी, मगर मेरे घर आने-जाने की छूट केवल तुम्हें थी, इसलिए मैं तुमसे ही प्यार करने लगी। प्रेमी का भी हाल कमोबेश यही है। स्वर्ग में वो भी किसी और के चक्कर में है।

तो पहले हालत यही थी। चुनाव का अवसर नहीं था। जो पहले दिख जाए, उसी से प्रेम और शादी की जिद...। पहले की फिल्मों में अगर हम देखें तो हीरो-हीरोइन शादी करना चाहते हैं। मगर ज़ालिम ज़माना अर्थात उनके माता-पिता और रिश्तेदार वगैरह इसके खिलाफ हैं। यही बहुत क्रांतिकारी बात है कि दोनों अपनी मर्जी से और माँ-बाप की रज़ामंदी के खिलाफ शादी कर रहे हैं। दोनों शादी कर लेते हैं। आख़िर में सब राज़ी हो जाते हैं। लड़का-लड़की को शादी से पहले अगर एक-दूसरे से मिलवा दिया जाए, दोनों की रज़ामंदी ले ली जाए, तो यह बड़ी प्रगतिशील बात समझी जाती थी। आज भी समझी जाती है।

कई घरों में अब लव मैरेज को भी मान्यता मिल गई है बशर्ते "लव" समझदारी से किया गया हो। बराबरी वालों में, अच्छे भविष्य की आस जगाने वाली लव मैरेज भी अब मान्यता पा गई हैं। मगर युवा वर्ग और फिल्में समाज से थोड़ा आगे रहते आए हैं। अभी इम्तियाज़ अली की तीन फिल्में ऐसी आई हैं कि जब हीरो-हीरोइन प्यार करते हैं। समाज यानी उनके माता-पिता को भी इसमें समस्या नहीं है, मगर हीरो-हीरोइन खुद कन्फ्यूज्ड हैं।

"सोचा न था" बेहद खूबसूरत फिल्म है। इसमें भी माता-पिता को कोई समस्या नहीं है। हीरो-हीरोइन को मिलाया ही इसलिए जाता है कि वे एक-दूसरे को पसंद करके शादी कर लें। मगर उस वक्त हीरो मना कर देता है और बाद में उसी लड़की से जब उसे प्यार होता है, तो माता-पिता खिलाफ हो जाते हैं।

"जब वी मेट" में भी लड़की का चक्कर किसी और से है। उसके परिवार वाले उसी से शादी के लिए राज़ी भी हो जाते हैं मगर...। "लव आज कल" में तो माता-पिता हैं ही नहीं। ये आज का युवा है। माता-पिता ने बंदिशें हटा ली हैं, जिसे भी वह चाहें जीवनसाथी बना सकते हैं, मगर वे खुद कुछ तय नहीं कर पा रहे हैं। उनके जीवन में चुनाव के ज्यादा मौके हैं। विपरीत लिंगी से उनके संबंध ज्यादा सहज हैं। अब किसी को साथ में घूमते देखकर घरवाले तक कूदकर इस नतीजे पर नहीं पहुँचते कि दोनों शादी करने वाले हैं।

इम्तियाज़ अली की फिल्में इसलिए सफल हुईं कि उन्होंने युवाओं को समझा है। वे खुद अड़तीस साल के हैं, पर इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। सफल फिल्मों के लिए यह ज़रूरी है कि अपने वक्त की समझ निर्देशक में हो। जैसी प्रेम कहानियाँ इम्तियाज़ अली ने फिल्माई हैं, वो इसी धड़कते समय की हैं। देखना है अपनी अगली फिल्म में वे क्या नया सुनाते हैं।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi