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हर हफ्ते हार... बार-बार... लगातार

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ब्लू
फिल्म का दर्शक जुआरी नहीं सटोरिया होता है। सट्टे में बहुत से नंबर होते हैं और लगाए हुए नंबर पर जीत की संभावना बहुत कम होती है, मगर फिर भी सटोरिया सट्टा खेलता है। हर बार हार का उसके पास कोई बहाना होता है और अगली बार के खेल में जीत का कोई नया फॉर्मूला। एक जीत सौ बार की हार को धो देती है। इस एक जीत से उसे इतना आत्मविश्वास मिलता है कि घर के बर्तन तक बेचकर वो सट्टा लगा सकता है।

फिल्म का दर्शक भी ऐसा ही सटोरिया होता है। दस-बीस-पच्चीस में से कोई एक फिल्म ऐसी निकलती है कि पैसा वसूल हो जाए, मगर दर्शक फिल्म देखता ही है। जिस तरह सटोरियों को कुछ अंक प्रिय होते हैं उसी तरह दर्शकों को भी कुछ नामों से लगाव होता है। ये नाम भी बस जीत के फॉर्मूले जैसे होते हैं।

इस हफ्ते दर्शकों ने सोचा कि अमिताभ वाली फिल्म जरूर अच्छी होगी। मगर क्या हुआ? इस बड़े नाम ने भी धोखा दिया और जिस तरह सटोरिए का माल "बॉटल" होता है, उसी तरह दर्शकों के टिकट के पैसे "फुल बॉटल" हो गए। फिल्म खरीदने वाली कंपनी इरोज भी घाटे में गई है। बताते हैं कि पैंतीस करोड़ में यह फिल्म खरीदी गई थी और बमुश्किल दस करोड़ रुपए निकल पाएँगे।

दूसरी फिल्म "लंदन ड्रीम्स" से उम्मीदें थीं, मगर उसकी पटकथा में जो दोष है, उसने दर्शकों की हार करवा दी। शुरुआती दिनों में जो टिकट बिके वही कुल कमाई का बड़ा हिस्सा हैं। जानकार कह रहे हैं कि दो हफ्तों में फिल्म का खेल खत्म हो जाएगा। विपुल शाह जैसा मसाला निर्देशक भावनाओं का ठीक से दोहन नहीं कर सका। अमिताभ के लिए टिकट खरीदने वाले भी नुकसान में रहे और सलमान, अजय देवगन, असिन वगैरह के नाम पर टिकट खरीदने वाले भी। कोई नाम ऐसा नहीं है कि पैसा वसूली की गारंटी हो। बड़े-बड़े निर्माता धराशायी हुए हैं।

किस्सा मुख्तसर यह कि इस हफ्ते भी दर्शक सट्टे के इस खेल में हार गया। हर हफ्ते एक-दो फिल्में आती हैं। जिस तरह सट्टे के अड्डे पर पैसा लगाने के लिए उकसाया जाता है, उसी तरह दर्शकों को नई फिल्म देखने के लिए फुसलाया जाता है। आकर्षक प्रोमो बनाए जाते हैं, गॉसिप गढ़ी जाती हैं, तरह-तरह के कौतुक किए जाते हैं।

"ब्लू" का प्रोमो पूरी फिल्म पर भारी था। पूरी फिल्म में वह प्रभाव ही पैदा नहीं हो पाया, जो आधे मिनट के प्रोमो में है। इसी तरह कुछ दिन पहले "दिल बोले हड़िप्पा" की नाकामी से यशराज खेमे में आस्था रखने वाले दर्शक आहत हुए थे। पर दर्शक को हर बार पुरानी हार भुलवा दी जाती है।

हर हफ्ते प्रचार माध्यमों की मदद से ऐसा माहौल पैदा कर दिया जाता है कि अमुक फिल्म नहीं देखी तो जिंदगी में कुछ नहीं देखा। दर्शक हर हफ्ते नई आशा के साथ सट्टा खेलता है और हार जाता है। सटोरिए से भोला और सटोरिए से ज्यादा आशावादी शायद और कोई नहीं होता।

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