राहुल देव बर्मन के बारे में 30 रोचक जानकारियां

1) 27 जून 1939 को कोलकाता में जन्मे राहुल देव बर्मन के पिता सचिन देव बर्मन की गिनती बॉलीवुड के महान संगीतकारों में होती है। राहुल ने अपने पिता की परम्परा को आगे बढ़ाया। 
 
2) आरडी को पंचम नाम से फिल्म जगत में पुकारा जाता था। पंचम नाम के पीछे मजेदार किस्सा है। आरडी बचपन में जब भी गुनगुनाते थे, प शब्द का ही उपयोग करते थे। यह बात अभिनेता अशोक कुमार के ध्यान में आई। सा रे गा मा पा में ‘प’ का स्थान पाँचवाँ है। इसलिए उन्होंने राहुल देव को पंचम नाम से पुकारना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनका यही नाम लोकप्रिय हो गया।
 
3) बचपन से ही आरडी को संगीत का शौक था। जब नौ वर्ष के थे तब उन्होंने पहला गाना कम्पोज कर लिया था इस गाने 'ऐ मेरी टोपी पलट के आ' को उनके पिता ने 'फंटूश' (1956) में उपयोग किया था। 
 
4) गुरुदत्त की 'प्यासा' (1957) के गाने 'सर जो तेरा चकराए' की धुन भी आरडी ने बनाई थी। 
 
5) आरडी ने उस्ताद अली अकबर खान (सरोद) और सामता प्रसाद (तबला) से प्रशिक्षण लिया। वे संगीतकार सलिल चौधरी को भी अपना गुरु मानते थे। पिता के सहायक के रूप में भी उन्होंने काम किया है। 


 
6) राहुल देव बर्मन को सबसे पहले निरंजन नामक फिल्मकार ने 'राज' के लिए 1959 में साइन किया था। आरडी ने दो गाने रिकॉर्ड भी किए। पहला गाना आशा भोसले और गीता दत्त ने तथा दूसरा शमशाद बेगम ने गाया था। यह फिल्म बाद में बंद हो गई। 
 
7) आरडी को पहला अवसर मेहमूद ने दिया जिनसे आरडी की अच्छी दोस्ती थी। मेहमूद ने पंचम से वादा किया था कि वे स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उन्हें जरूर अवसर देंगे। ‘छोटे नवाब’(1961)के जरिये मेहमूद ने अपना वादा निभाया।
 
8) अपनी पहली फिल्म में ‘घर आजा घिर आए बदरा’ गीत आरडी,  लता मंगेशकर से गवाना चाहते थे और लता इसके लिए राजी हो गईं। आरडी चाहते थे कि लता उनके घर आकर रिहर्सल करें। लता धर्मसंकट में फँस गईं क्योंकि उस समय उनका कुछ कारणों से आरडी के पिता एसडी बर्मन से विवाद चल रहा था। लता उनके घर नहीं जाना चाहती थीं। लता ने आरडी के सामने शर्त रखी कि वे जरूर आएँगी, लेकिन घर के अंदर पैर नहीं रखेंगी। मजबूरन आरडी अपने घर के आगे की सीढि़यों पर हारमोनियम बजाते थे और लता गीत गाती थीं। पूरी रिहर्सल उन्होंने ऐसे ही की।
 
9) आरडी बर्मन को पहला बड़ा मौका विजय आनंद निर्देशित फिल्म 'तीसरी मंजिल' से मिला। फिल्म के हीरो शम्मी कपूर और निर्माता नासिर हुसैन नहीं चाहते थे कि आरडी संगीत दे। निर्देशक के जोर देने पर उन्होंने तीन-चार धुनें सुनीं और सहमति दे दी। फिल्म का संगीत सुपरहिट रहा और आरडी के पैर बॉलीवुड में जम गए। 
 
10) 'मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू' से राजेश खन्ना और किशोर कुमार सफलता की सीढ़ी चढ़ गए। 'आराधना' फिल्म के इस गीत की धुन बनाते समय सचिन देव बर्मन बीमार थे। कहा जाता है कि इसकी धुन राहुल देव बर्मन ने ही बनाई थी। 

11) 1970 में आरडी ने देवआनंद की फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' के लिए 'दम मारो दम' गीत बनाया जो आज भी उतने ही चाव से सुना जाता है। इस गाने ने बॉलीवुड में भूचाल ला दिया था और ऐसा रॉक नम्बर हिंदी फिल्मों में शायद ही पहले आया हो।
 
12) कहा जाता है कि 'दम मारो दम' की धुन सुन सचिन देव बर्मन इतने दु:खी हुए कि रिकॉर्डिंग स्टुडियो से उठकर चले गए। वे इस बात से खिन्न थे कि राहुल ने उनकी (सचिन देव बर्मन) शैली त्याग दी थी। 
 
13) राहुल देव बर्मन की पहली पत्नी का नाम रीता पटेल था। राहुल की रीता फैन थी। रीता ने अपने दोस्त से शर्त लगाई थी कि वह राहुल के साथ मूवी डेट पर जाएगी और ऐसा उसने कर दिखाया। 1966 में दोनों की शादी हुई और 1971 में तलाक हुआ। 
 
14) 1980 में आरडी ने आशा भोसले से शादी की। आशा ने अपने करियर के बेहतरीन गाने आरडी के साथ ही गाए और दोनों में अच्छी ट्यूनिंग हो गई थी।  
 
15) राहुल देव बर्मन ने गीतकार गुलजार के साथ अपने करियर के बेहतरीन गीत दिए। गुलजार के लिखे कठिन गीतों को उन्होंने अपनी धुनों से इतना सुरीला बना दिया कि खुद गुलजार चकित रह जाते थे। 
 
16) फिल्म 'इजाजत' के लिए गुलजार ने 'मेरा कुछ सामान' लिखा। आरडी के सामने जब यह गीत लाया गया है तो उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है कि अखबार की खबर मेरे सामने रख दी हो और इस पर धुन बनाने को कहा जा रहा हो। आरडी ने ऐसी बेहतरीन धुन बनाई कि गायिका आशा भोसले को कई पुरस्कार इस गीत के लिए मिले। 
 
17) राहुल देव बर्मन प्रयोग करने के सदैव हिमायती रहे और यह उनके संगीत में नजर भी आता है। उन्होंने वेस्टर्न, लेटिन, अरबिक और भारतीय संगीत को मिलाकर नई धुनें बनाईं।
 
18) राहुल ने कई बार कंघी, कप-प्लेट्स, बोतल आदि से निकली आवाजों को अपने गीतों में शामिल किया। 
 
19) युवाओं को हमेशा राहुल का संगीत पसंद आया। उनका संगीत सदैव जवान रहा और आज भी पसंद किया जाता है। सबसे ज्यादा उन्हीं के गीत रिमिक्स किए गए।  
 
20) संगीत निर्देशन के अलावा पंचम दा ने कई फिल्मों के लिए अपनी आवाज भी दी है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी बर्मन ने संगीत निर्देशन और गायन के अलावा भूत बंगला (1965) और प्यार का मौसम (1969) जैसी फिल्म में अभिनय भी किया। । 

21) आरडी बर्मन माउथ ऑर्गन बहुत अच्छा बजाते थे।  
 
22) राहुल देव बर्मन पर धुनों को कॉपी करने के आरोप भी लगे, हालांकि कई बार उन्होंने फिल्ममेकर्स के दबाव में आकर ऐसा किया। कई बार उन्होंने प्रेरणा भी ली। मेहबूबा मेहबूबा, मिल गया हमको साथी मिल गया, तुमसे मिलके, जिंदगी मिलके बिताएंगे, दिलबर मेरे जैसे गानों की धुन उन्होंने प्रेरित होकर बनाई। 
 
23) आरडी बर्मन 1970 से 1980 के बीच अपने करियर के शिखर पर रहे। उनके बनाए गीत बेहद लोकप्रिय हुए। 
 
24) 1985 के बाद आरडी का करियर ग्राफ नीचे की ओर आने लगा। उनकी संगीतबद्ध की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं। फिल्मों की असफलता के लिए आरडी के संगीत को भी दोषी ठहराया जाने लगा इससे उन्हें काफी धक्का लगा। 
 
25) सुभाष घई ने राहुल देव बर्मन को 'राम लखन' के लिए साइन किया। उस समय आरडी को बड़ा अवसर चाहिए था। बाद में अचानक आरडी को हटा कर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को ले लिया गया। घई के इस निर्णय से आरडी बहुत दु:खी हुए। 
 
26) 1988 में आरडी को दिल का दौरा पड़ा था। लंदन स्थित अस्पताल में उनका इलाज चला। उस दौरान आरडी ने कई धुनें बनाईं।
 
27) राहुल देव बर्मन द्वारा संगीतबद्ध आखिरी फिल्म थी '1942 : ए लव स्टोरी'। इसके गाने बहुत हिट हुए। अफसोस की बात रही कि गानों के हिट होने के पहले ही राहुलदेव बर्मन दुनिया से बिदा हो गए। आरडी द्वारा आखिरी साइन की गई फिल्म थी 'थेन्माविन कोम्बाथ' (मलयालम), जिसे प्रियदर्शन बना रहे थे, लेकिन इसके लिए कोई गीत बनाने के पहले ही उनका निधन हो गया। 
 
28) लता मंगेशकर ने आरडी के निधन पर कहा था कि वे कम उम्र में और नाखुशी के साथ इस दुनिया से बिदा हुए। 
 
29) बतौर संगीतकार राहुल देव बर्मन फिल्मफेअर अवॉर्ड्स के लिए 17 बार नॉमिनेट हुए, लेकिन उन्हें तीन बार, सनम तेरी कसम (1983), मासूम (1984) और 1942 : ए लव स्टोरी (1995), ही यह अवॉर्ड मिला। आरडी बर्मन ने 331 फिल्मों में संगीत दिया, जिनमें से 292 हिंदी में हैं। 
 
30) आरडी बर्मन के बारे में कहा जाता है कि वे समय से आगे के संगीतकार थे। अपने अंतिम समय में उन्होंने ‘1942 ए लव स्टोरी’ में यादगार संगीत देकर यह साबित किया था कि उनकी प्रतिभा का सही दोहन फिल्म जगत नहीं कर पाया। 4 जनवरी 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन दुनिया को गुनगुनाने लायक ढेर सारे गीत वे दे गए।

वेबदुनिया पर पढ़ें

अगला लेख हरामखोर के निर्माता को मिल रही है धमकी