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आजादी के बाद का 75 वर्षीय हिंदी सिनेमा: सिनेमा था, सिनेमा है और सिनेमा रहेगा

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समय ताम्रकर

, शनिवार, 13 अगस्त 2022 (12:27 IST)
भारत की आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। स्वतंत्र हुए 75 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। 75 वर्ष में भारत बहुत बदल गया। हर क्षेत्र में चेहरा नया हो गया है और हम दुनिया के उन चुनिंदा देशों के साथ दौड़ रहे हैं जिनका सम्पूर्ण विश्व पर प्रभाव है। परिवर्तन की इस लहर से भारतीय सिनेमा भी अछूता नहीं रहा। कंटेंट, तकनीक से लेकर तो दर्शकों की पसंद और फिल्म देखने के माध्यम में भी कई उतार-चढ़ाव आए। सिनेमा जब शुरू हुआ था तो टूरिंग थिएटर के जरिये फिल्में दिखाई जाती थीं। फिर सिनेमाघर आए। टीवी का आगमन हुआ और अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर फिल्में मोबाइल के जरिये जहां चाहे वहां देखी जा रही हैं। 75 वर्ष में फिल्म, तकनीक और माध्यम में क्या बदलाव आए इसकी चर्चा कल आज और कल में... 
 
कल यानी कि वर्ष 2000 के पहले का सिनेमा
भारत जब आजाद हुआ तब अभिनय की दुनिया पर दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर का स्टारडम उभर रहा था। वी शांताराम, गुरुदत्त, राज कपूर, बिमल रॉय, बीआर चोपड़ा जैसे फिल्मकार सामाजिक प्रतिबद्धता वाली फिल्में बना रहे थे। उस दौर में दर्शकों को जागरूक करने का सिनेमाघर बेहतरीन माध्यम था क्योंकि दूरदर्शन और रेडियो की इतनी पहुंच नहीं थी। सिनेमा के जादुई प्रभाव का दर्शकों पर गहरा असर होता था। पचास, साठ और सत्तर के दशक को हम हिंदी का स्वर्णिम दौर मान सकते हैं जब भले ही तकनीकी रूप से फिल्में कमजोर थीं, लेकिन कथ्य, अभिनय और गीत-संगीत का स्तर उच्चतम था। कई फिल्मकार अपनी फिल्मों के जरिये जनता-जनार्दन में मनोरंजन के साथ-साथ चेतना जगाने का काम कर रहे थे। श्री 420, कागज के फूल, मधुमति, मुगल-ए-आजम, मदर इंडिया, प्यासा, हकीकत, नीचा नगर, चलती का नाम गाड़ी जैसी कल्ट और क्लासिक फिल्मों का निर्माण इसी दौर में हुआ। श्वेत-श्याम की जगह सिनेमा रंगीन भी इसी दौर में हुआ। फिल्म व्यवसाय खूब फला-फूला। नए सिनेमाघरों का खूब निर्माण हुआ। 
 
सिनेमा मनोरंजन का सस्ता साधन था। एक ही फिल्म एक ही शहर में कई बार लगा करती थीं। कई मधुर गीतों का जन्म इसी कालखंड में हुआ। सत्तर के दशक के अंत और अस्सी के दशक के आरंभ से व्यावसायिक सिनेमा गुणवत्ता की दृष्टि से रसातल में पहुंच गया। इन 20-22 साल में बनी अधिकांश फिल्में घटिया थीं। कहानी और अभिनय के नाम पर मारधाड़ और उत्तेजक दृश्यों की भरमार होने लगी। वीसीआर सिनेमाघर के सामने चुनौती बन कर उभरा। धनाढ्य वर्ग घर बैठ कर वीसीआर पर सिनेमा देखना शान समझने लगा और गरीब तबका सिनेमाघर का दर्शक वर्ग था इसलिए उसकी पसंद के अनुरूप फिल्में बनने लगी। इस दौरान वीसीआर की आंधी में कई सिनेमाघर बंद हो गए। फिल्म वितरक डूब गए। 
 
सत्तर और अस्सी के दौर में समानांतर सिनेमा ने एक नई पहचान बनाई। श्याम बेनेगल, मृणाल सेन, सत्यजीत रे, मणि कौल, गोविंद निहलानी, केतन मेहता, गौतम घोष जैसे फिल्मकारों ने कमर्शियल फिल्मों से इतर अलग तरह की फिल्में बना कर विश्व सिनेमा में भारत का नाम ऊंचा किया। सम्पूर्ण भारत में भले ही इनकी फिल्में रिलीज नहीं हो पाती हों, लेकिन फिल्म सोसायटी के माध्यम से दर्शकों तक ये फिल्में पहुंचती रहीं और दर्शकों में सिनेमा देखने को समझ को विकसित करती रहीं। यह प्रक्रिया भले ही धीमी रही, लेकिन आज इसका असर दिख रहा है। समानांतर फिल्मों में क्षेत्रीय फिल्मों का भी योगदान रहा। बंग्ला, मराठी, मलयालयम, असमी और अन्य भाषाओं के फिल्ममेकर्स ने भी यादगार फिल्में दी। अस्सी के दशक के खत्म होते-होते समानांतर फिल्मों के आंदोलन ने भी दम तोड़ दिया। लेकिन 1947 से 2000 तक भारतीय सिनेमा का झंडा ऊंचा होते चला गया। बेहतरीन निर्देशक, कलाकार, तकनीशियन इस दौर में आए और उन्होंने यादगार फिल्में दी। 
 
आज का सिनेमा
आज के सिनेमा को हम वर्ष 2000 के बाद से वर्तमान तक का सिनेमा मान सकते हैं। नई सदी जैसे ही आरंभ हुई रसातल में जा रहा हिंदी सिनेमा फिर उठ खड़ा हुआ। नई सदी को आरंभ हुए बाइस साल हो चुके हैं और इन 22 वर्षों में कई बदलाव हुए हैं। इंटरनेट ने दुनिया में क्रांति ला दी है और चीजों को आसान बनाने की कोशिशें जारी हैं। कुछ परंपराएं समय के साथ खत्म हो गई। तकनीकी परिवर्तन के कारण कई बातों का महत्व खो गया। लेकिन इन 22 सालों में सिनेमा और जवान हो गया। भारत में जब टीवी आया था तब सिनेमा को खत्म मान लिया गया था, लेकिन सिनेमा न केवल मजबूती से टिका रहा बल्कि आज टीवी के लिए मजबूत बैसाखी साबित हुआ। ओटीटी प्लेटफॉर्म असिस्तत्व में आए तो भी सिनेमा के सामने चुनौती खड़ी कर दी गई, लेकिन इस माध्यम को भी सिनेमा की आवश्यकता है। दरअसल सिनेमा, टीवी धारावाहिकों और वेबसीरिज में में ज्यादा भेद नहीं है। ये भी सिनेमा का ही एक माध्यम है, लांगर फॉर्मेट में। 
 
इंटरनेट ने दी ऊंचाई 
इंटरनेट ने सिनेमा को नई ऊंचाइयां दी। फिल्मों को आर्थिक रूप से मजबूती दी। आज यू-ट्यूब के जरिये 50 वर्ष पुरानी फिल्मों के जरिये भी पैसा कमाया जा रहा है। वर्षों पहले सिनेमा देखने का माध्यम सिनेमाघर ही था। टेलीविजन पर फिल्मों का इतना जोर नहीं था, लेकिन पिछले 22 वर्षों में सिनेमा देखने के अनेक माध्यम पैदा हो गए। मोबाइल ने तो गजब की क्रांति ला दी। इस साढ़े पांच इंच के हैंडसेट में पूरा सिनेमाघर समाया हुआ है। इंटरनेट ने सिनेमा को पर्सनल बना दिया है। टीवी पर आपको जो फिल्म दिखाई जा रही हो वही देखना पड़ती है, लेकिन इंटरनेट के कारण आप मर्जी के मालिक बन गए हैं। आप जो फिल्म देखना चाहते हैं अपनी मर्जी से देख सकते हैं। यही कारण है कि टीवी की लोकप्रियता कम हो रही है और इंटरनेट पर उपलब्ध प्लेटफॉर्म का मार्केट बढ़ता जा रहा है। इसी कारण वेबसीरिज का उदय हुआ है। यह भी सिनेमा का एक रूप है। सिनेमा को इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि निर्माता अपनी टारगेट ऑडियंस के मुताबिक फिल्में, टीवी धारावाहिक और वेबसीरिज बनाने लगे हैं। यही कारण है कि सिनेमा हमें विविध रूपों और रंगों में उपलब्ध है। 
 
फॉर्मूलों से आजादी 
आज से 22 साल पहले के सिनेमा पर नजर डाले तो सिनेमा फॉर्मूलों में जकड़ कर झटपटा रहा था। पांच फाइट सीन, पांच गाने, पांच कॉमेडी और पांच इमोशन सीन और फिल्म तैयार, लेकिन आज इस तरह की फिल्मों को देखने वाले बहुत कम लोग हैं। अब फॉर्मूला फिल्में भी बन रही हैं तो उसमें बहुत कुछ नया दर्शकों को देना पड़ता है। 22 सालों में यदि फिल्में बेहतर हुई हैं, विभिन्न विषयों पर बन रही हैं, विभिन्न रूपों में बन रही है तो इसका बड़ा कारण है इंटरनेट। इंटरनेट के कारण सिनेमा ज्यादा लोगों तक पहुंचा। इंटरनेट के कारण दर्शक दुनिया भर की फिल्मों से रूबरू हुए और समझदार हुए। उनके समझदार होते ही भारतीय फिल्में भी समझदार हो गई। मेरा मानना है कि पिछले 22  वर्षों में भारतीय सिनेमा ने यदि बेहतरी की राह पकड़ी है तो इसका कारण है दर्शकों का समझदार होना और इसमें इंटरनेट का महत्वपूर्ण रोल है। यदि आप देखें तो पैरेलल और कमर्शियल फिल्मों की लाइन ब्लर होने लगी है। समानांतर सिनेमा वर्षों पहले भी बनता था, लेकिन मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में इन फिल्मों के कुछ शो दिखाए जाते थे। इंदौर या भोपाल जैसे छोटे शहरों में फिल्म सोसायटी इनके शो आयोजित करती थी। लेकिन अब हर तरह की फिल्मों को सिनेमाघर मिलने लगे हैं क्योंकि इन फिल्मों को दर्शक उपलब्ध होने लगे हैं। यही कारण है कि कंटेंट ड्रिवन फिल्मों का मार्केट बढ़ता जा रहा है। स्टारडम अभी भी है, लेकिन सितारों की चमक फीकी होने लगी है। 
 
कौन है सुपरस्टार? 
आज के सुपरस्टार कौन हैं? आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख खान, अक्षय कुमार, अजय देवगन? इनको बॉलीवुड में आए 35 बरस से ज्यादा हो गए। रितिक रोशन को भी 20 से ज्यादा साल हो गए। पिछले 22 सालों में कितने सुपरस्टार सामने आए हैं? रणबीर कपूर और रणवीर सिंह। पर अभी इन्हें सुपरस्टार कहना जल्दबाजी है। 22 साल में यदि दो सितारे मिले है तो यह बात साफ-साफ दिखाई देती है कि लोग सितारे के बजाय कंटेंट को महत्व देने लगे हैं। यही कारण है कि सितारे भी कंटेंट वाली फिल्म करने लगे हैं। उन्हें भी पता चला गया है कि यदि वे कुछ नया नहीं देंगे तो दर्शक उनकी फिल्म भी देखने को नहीं आएंगे। आमिर खान दंगल, थ्री इडियट्स, पीके जैसी फिल्में करते हैं। सलमान खान बजरंगी भाईजान या सुल्तान करते हैं। अक्षय कुमार टॉयलेट एक प्रेम कथा और पैडमैन जैसी फिल्में करते हैं। आज से 22 साल पहले इन फिल्मों की पटकथा यदि इन स्टार्स तक लेकर कोई पहुंचता तो वे उसे तुरंत दरवाजा दिखा देते। तो नई सदी में सिनेमा में जो बड़े परिवर्तन देखने को मिले उसमें से एक बड़ा परिवर्तन यह रहा कि सितारों की फिल्मों में भी कहानी, स्क्रिप्ट और संदेशों को महत्वपूर्ण माना गया। स्टार्स ने भी यह बात ठीक से समझ ली कि यदि टिके रहना है तो दर्शकों को कुछ अलग और अनोखा देना होगा। इसी कारण कई उम्दा फिल्में देखने को मिली। इसी कारण राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना, इरफान खान, नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी सितारे बन गए। आर्टिकल 15, बाला, बधाई हो, अंधाधुन, स्त्री, शाहिद जैसी फिल्में सामने आईं। ये फिल्मों की सफलता से बॉलीवुड के तथाकथित पंडित भी चकित रह गए। 
 
दर्शक हुए डिमांडिंग 
इस समय सभी रोजाना फिल्म देखते हैं। चाहे वे टिकटॉक पर आने वाली 15 सेकंड की फिल्म ही क्यों न हो। शॉर्ट फिल्म, टीवी पर दिखाई जाने वाली फिल्में, ओटीटी पर फिल्में टीवी धारावाहिक, वेबसीरिज, सिनेमाघर में दिखाई जाने वाली फिल्में, यू-ट्यूब पर उपलब्ध फिल्में, विभिन्न कंपनियों की लाइब्रेरी में उपलब्ध फिल्में, हॉलीवुड मूवीज़, वर्ल्ड मूवीज़। इससे भी मन न भरे तो टिकटॉक जैसे एप जहां पर लोग ही वीडियो बना बना कर पोस्ट कर रहे हैं और कुछ तो बेहतरीन काम कर रहे हैं। कहने का मतलब ये कि चारों ओर फिल्में उपलब्ध है। इस वजह से दर्शक बेहद डिमांडिंग हो गए हैं। उन्हें हर चीज उच्चतम स्तर पर चाहिए। इसीलिए फिल्मों का स्तर भी ऊंचा उठा है। 
 
व्यावसायिक सिनेमा की बात की जाए पिछले 22 वर्षों में ऐसा सिनेमा बना है जो पहले कभी नहीं बना करता था। आनंद कुमार जैसे एक आम से दिखने वाले आदमी की बायोपिक बनने लगी है और खास बात यह है कि दशक का सबसे हैंडसम सितारा उनकी भूमिका को निभा रहा है। बीस साल पहले तो इस तरह के आम आदमी पर फिल्म बनाने की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। यह है नई सदी का सिनेमा। एक से बढ़ कर एक बायोपिक हमें देखने को मिली है। सरबजीत, नेताजी सुभाष चंद्र बोस : द फॉरगॉटन हीरो, पान सिंह तोमार, मांझी द माउंटनमैन, नीरजा, रंग रसिया, पैडमैन, अलीगढ़ आज के दौर की फिल्में हैं। आज के दौर में खेल और खिलाड़ी भी सिनेमा में आ गए और दर्शकों ने इन्हें हाथों हाथ लिया। मैरीकॉम, एमएस धोनी द अनटोल्ड स्टोरीज, बुधिया सिंह बोर्न टू रन, चक दे इंडिया, 83 जैसी खेलों पर आधारित फिल्मों ने दर्शकों का मन मोहा। 
 
ध्वस्त हुई मान्यताएं 
सन 2000 के पहले यह माना जाता था की नायिका प्रधान फिल्में नहीं चलती। यदि नायिका प्रधान फिल्में बनती भी तो वे बदला लेने वाली फिल्में होती थीं। 2000 के बाद यह स्थापित मान्यता ध्वस्त होने लगी। यह हवा के ताजे झोंके के समान था। तनु वेड्स मनु रिटर्न्स और राजी जैसी नायिका प्रधान फिल्में भी सौ करोड़ क्लब में शामिल होने लगी। इन फिल्मों को ज्यादा से ज्यादा लोग स्वीकारने लगे। कहानी, दीपिका पादुकोण, करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा, तापसी पन्नू आलिया भट्ट भी अपने बूते पर सफल फिल्में देने लगीं। नीरजा, कहानी, तुम्हारी सुलु, इश्किया, बेगम जान, नो वन किल्ड जेसिका, मर्दानी, वीरे दी वेडिंग, सात खून माफ, गंगू बाई काठियावाड़ी, बदला, पिंक जैसी फिल्में  जगमगाई। पिछले 22 सालों में राजकुमार हिरानी जैसे फिल्मकार ने सर्वाधिक कामयाब फिल्में दी हैं। मुन्नाभाई सीरिज की दो फिल्में, पीके और थ्री इडियट्स किसी भी एंगल से कमर्शियल फिल्में नहीं लगती हैं। ऋषिकेश मुखर्जी, गुलजार और बासु चटर्जी जो मध्यमार्गी सिनेमा के हिमायती थे और उसी लाइन को हिरानी ने आगे बढ़ाया और सफलता पाई। मनोरंजन की मीठी चाशनी में हिरानी ने कड़वी बात दर्शकों के गले उतारी। दर्शकों ने इसे स्वीकार कर दिखाया कि वे इस तरह की फिल्मों के लिए तैयार हैं। 
 
बदला कहानी कहने का अंदाज 
नई सदी की फिल्मों के प्रस्तुतिकरण में भी बहुत बदलाव देखने को मिला। कहानी कहने का तरीका बदल गया है। जब हम अनुराग कश्यप की देव डी, अनुराग बसु की बर्फी, नीरज पांडे की स्पेशल 26, श्रीराम राघवन की अंधाधुन देखते हैं तो पाते हैं कि अपनी तकनीकी कौशल के बूते पर वे कहानी को बहुत ही अलग तरीके से पेश करते हैं। रंगों का संयोजन, सिनेमाटोग्राफी, संपादन, साउंड डिजाइनिंग का तरीका बहुत बदल गया है। हालांकि अभी भी तकनीक पर कंटेंट भारी है और यह हमेशा रहना भी चाहिए क्योंकि कांटेंट के बिना फिल्म की आत्मा ही मर जाती है। 
 
कम हुई दूरियां 
हिंदी और क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा की दूरियां भी कम हुई हैं। आज प्रभाष, अल्लू अर्जुन, यश, रामचरण तेजा, जूनियर एनटीआर जैसे दक्षिण भारतीय सितारे की फिल्में बाहुबली, केजीएफ, आरआरआर, पुष्पा  के रूप में अखिल भारतीय सफलता पाती है। इन फिल्मों की रिलीज हिंदी फिल्मों की तरह होती है। इसमें मल्टीप्लेक्स का भी अहम योगदान है। मल्टीप्लेक्स के कई स्क्रीन होने के कारण दूसरी भाषाओं की उल्लेखनीय फिल्मों का प्रदर्शन भी अब हिंदी भाषी क्षेत्रों में होने लगा है और इस वजह से अच्‍छी फिल्मों की तलाश में भटक रहे दर्शकों की कुछ हद तक प्यास बुझ जाती है। 
 
अनोखे विषय पर फिल्में 
आज के दौर की फिल्मों में यह परिवर्तन भी देखने को मिलता है कि फिल्में वास्तविकता के ज्यादा नजदीक हो गई हैं। दर्शक अब इम्पर्फेक्ट किरदारों को ज्यादा पसंद करने लगे हैं। खुलापन बढ़ा है। राजनेताओं को लेकर भी फिल्म बनने लगी हैं। फिल्म परंपरागत दर्शकों और नए दर्शकों को संतुलित कर के बन रही हैं। टीवी परंपरागत दर्शकों के लिए कार्यक्रम बना रहा है और वेबसीरिज नए दर्शकों को लुभा रही है। कलाकारों और तकनीशियनों के लिए मौके बढ़ गए हैं। नए लेखकों को भी अवसर मिल रहे हैं। सिनेमा भी नयापन लिए हुए है। अस्सी और नब्बे के दशक हिंदी फिल्मों के लिहाज से सबसे खराब माने जाते हैं। उस दौर से आज को मुक्ति मिल गई है। विकी डोनर, मद्रास कैफ, आई एम, इंग्लिन विंग्लिश, पान सिंह तोमर, गैंग ऑफ वासेपुर, अलीगढ़, बर्फी, लंच बॉक्स, क्वीन, हैदर, पीकू, पिंक, मसान, एनएच 10, उड़ान, नील बटे सन्नाटा, न्यूटन, मुक्ति भवन, आंखों देखी जैसी बेहतरीन फिल्में हमें देखने को मिली। इनके विषय इतने अनोखे थे जिन पर फिल्म बनाने की 20 वर्ष पहले कोई सोच भी नहीं सकता था। बड़े बजट की फिल्में भी देखने को मिली। निर्माता अब 300 करोड़ या 500 करोड़ की फिल्में भी बनाने लगे हैं क्योंकि विभिन्न राइट्स से रकम वसूल हो जाती है। चीन सहित कई देशों में भारतीय फिल्म अच्छा व्यवसाय करने लगी हैं। 
 
कल का सिनेमा 
जब टीवी का प्रभाव बढ़ा तो कहा जाने लगा कि सिनेमा मर जाएगा। कोरोना काल में ओटीटी प्लेटफॉर्म का प्रभाव बढ़ा तो फिर यही बात दोहराई जाने लगी कि सिनेमा मर जाएगा, लेकिन सिनेमा अमर है, कभी नहीं मर सकता। दरअसल चाहे टीवी हो या ओटीटी प्लेटफॉर्म, सिनेमा इनकी जरूरत है, तो फिर सिनेमा कैसे मर सकता है? एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री जिस तरह से आगे बढ़ रही है उसको देख तो आगे बढ़ने की ही उम्मीद नजर आती है। सिनेमा को देखने के माध्यम जरूर बदल सकते हैं। सिनेमाघर, टीवी, लैपटॉप, कम्प्यूटर और मोबाइल पर सिनेमा देखा जा रहा है, इससे सिनेमाघर के सामने जरूर चुनौती खड़ी हो गई है। सिनेमाघर के अस्तित्व पर संकट के बादल नजर आ रहे हैं। सिनेमाघर 3डी, 4डी, 6डी, जैसे तरीकों से दर्शकों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हकीकत ये है कि महंगी टिकट दरों के कारण दर्शकों ने सिनेमाघर जाना कम कर‍ दिया है। वर्ष दर वर्ष संख्या में गिरावट आ रही है। सिंगलस्क्रीन सिनेमाघर में टिकट दर कम है, लेकिन सुविधा के अभाव में दर्शक वहां जाना नापसंद करते हैं। 
 
व्यवसाय को लेकर बदलना होगा नजरिया 
भारत में सिनेमाघर को लेकर फिल्म इंडस्ट्री और सरकार को अपना नजरिया बदलना होगा। चीन जैसे देश में लाखों की संख्या में सिनेमाघर हैं और सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। इसी तरह के मॉडल भारत में भी अपनाना होंगे। सिर्फ 100 या 500 करोड़ की सफलता से खुश होकर संतुष्ट होना पर्याप्त नहीं है, भविष्य को भी देखना होगा क्योंकि मोटी कमाई सिनेमाघरों से ही आती है। ओटीटी सहित सारे प्लेटफॉर्म्स सिनेमा की कमाई में इजाफा ही करते हैं, इसलिए इन्हें दुश्मन की बजाय दोस्त मानना सही होगा। जहां तक सिनेमा की मेकिंग का सवाल है तो इसमें बदलाव भविष्य के अनुसार आते रहेंगे। तकनीक जिस रफ्तार से अपना रंग बदल रही है उससे सिनेमा और बेहतर होता जाएगा। जरूरत है कंटेंट पर ध्यान देने की। केवल भव्यता या तकनीक से ही दर्शक चमत्कृत हो जाते तो 'शमशेरा' सुपरहिट हो जाती। 
 
भविष्य में हो सकता है पाइरेसी का खात्मा 
पाइरेसी की रोकथाम यदि भविष्य में होती है तो सिनेमा का व्यवसाय दस गुना बढ़ जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे चलकर कोई ऐसी तकनीक प्रचलन में आ जाए जिससे यह बुराई दूर हो सके। हिंदी सिनेमा के सामने विश्व सिनेमा चुनौती बन कर उभर रहा है, लेकिन इन चुनौती से घबराने की बजाय मुकाबला करने की जरूरत है। अभी हिंदी सिनेमा पर हॉलीवुड और क्षेत्रीय सिनेमा भारी पड़ रहा है, लेकिन यह एक दौर से ज्यादा कुछ और नहीं है। दस या बीस साल बाद सिनेमा और देखे जाने वाले माध्यम में क्या परिवर्तन होगा यह कहना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन ये कहा जा सकता है कि सिनेमा था, सिनेमा है और सिनेमा रहेगा। 

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