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नूतन: लंबी और सशक्त पारी

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शुक्रवार, 4 जून 2021 (10:32 IST)
नूतन की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्हें कैसा भी रोल दे दिया जाए, अपने अभिनय से उसे असाधारण बनाने की क्षमता उनमें थीं। हल्के-फुल्के, चुलबुले अथवा धीर-गंभीर भूमिकाओं में नूतन ने साबित किया है कि बिना ग्लैमर के भी नंबर वन नायिका बना जा सकता है। सीमा, बंदिनी़, सरस्वतीचन्द्र और सुजाता फिल्में इसकी मिसाल हैं। नूतन ने पांच बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्म फेअर पुरस्कार प्राप्त किए। आत्मविश्वास के साथ कैमरे का सामना करना नूतन की निजी पूंजी थी।  
 
शोभना समर्थ की बड़ी बेटी नूतन का जन्म 4 जून 1936 को हुआ। वे अखिल भारतीय सौंदर्य प्रतियोगिता में प्रथम आईं परंतु उन दिनों यह प्रथा नहीं थी कि सौंदर्य प्रतियोगिता के विजेता को फिल्म में मौका दिया जाए। ज़ीनत अमान, सोनू वालिया, सुष्मिता सेन इत्यादि बहुत बाद की घटनाएं हैं। 
 
अत: शोभना समर्थ और उनके परम मित्र मोतीलाल ने 'हमारी बेटी' नामक फिल्म में नूतन को प्रस्तुत किया। फिल्म सफल रही और भारतीय सिनेमा में दूसरी पीढ़ी की प्रथम अभिनेत्री बनने का गौरव शोभना की पुत्री नूतन को मिला। 
 
नूतन ने 1955 में 'सीमा' में काम किया। इसके पहले उसने 'निर्मोही', 'मा‍लकिन', 'हंगामा', 'शबाब', 'नगीना' आदि कई फिल्मों में काम किया। परंतु 'सीमा' ही उनकी पहली सशक्त सफलता मानी जाएगी क्योंकि उन्हें इसी फिल्म से अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने का अवसर मिला। 
 
अमिय चक्रवर्ती की 'सीमा' (1955) में नूतन ने एक विद्रोहणी की भूमिका की थी। उस पर चोरी का झूठा आरोप है और सुधारगृह में उसकी टक्कर बलराज साहनी से है जो सुधारगृह के अधिकारी हैं। 
 
हिंसावादी विद्रोहणी और गांधीवादी अधिकारी की टक्कर देखने लायक थी। इस फिल्म में नूतन को फिल्म फेअर की अपनी पहली ट्रॉफी मिली और चौथी ट्रॉफी 1967 में 'मिलन' के लिए मिली। 
 
'हमलोग' में नूतन ने टी.बी. मरीज की लड़की की भूमिका को बहुत सशक्त ढंग से किया। शाहिद लतीफ की 'सोने की चिड़िया' में नूतन ने एक अभिनेत्री की भूमिका निबाही जिसे उसके रिश्तेदार अपने लोभ का शिकार बनाते हैं। 'सीमा' से 'सोने की चिड़िया' तक नूतन ने स्वयं को एक श्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में स्थापित कर लिया था। 
 
देवआनंद के साथ 'पेइंग गेस्ट', 'तेरे घर के सामने' में नूतन ने हल्के-फुल्के रोमांटिक रोल कर अपनी बहुआयामी प्रतिभा का परिचय दिया। 'मंजिल' और 'बारिश' के रोमांटिक दृश्य काफी बोल्ड थे और 'दिल्ली का ठग' में तो नूतन ने तैरने की पोशाक भी पहनकर उस समय के समाज को चौंका दिया था। 
 
शीघ्र ही बिमल रॉय की 'सुजाता' और 'बंदिनी' में अत्यंत मर्मस्पर्शी अभिनय करके नूतन ने फिर अपनी छबि को बदल डाला। इस समय तक मधुबाला, नरगिस काम बंद कर चुकी थीं। अत: श्रेष्ठ गंभीर भूमिकाओं के लिए नूतन के अतिरिक्त मैदान में कोई था ही नहीं। 'छलिया', 'अनाड़ी', 'सूरत और सीरत' में नूतन ने फिर अपनी प्रतिभा का सिक्का जमा दिया। 
 
1965 से 1969 तक नूतन ने मद्रास के निर्माताओं के लिए 'खानदान', 'मिलन', 'मेहरबान', 'गौरी', 'भाई बहन' जैसी सुपर‍ हिट फिल्मों में काम किया। 1968 में 'सरस्वतीचंद्र' को अपार सफलता ने नूतन को नंबर एक की नायिका सिद्ध कर दिया। 1973 में नूतन ने 'सौदागर' में अविस्मरणीय अभिनय किया। 
 
उस समय तक भारतीय फिल्मों में हिंसा का दौर आरंभ हो चुका था और नूतन भी अपने समवर्ती कलाकारों में अकेली ही बची थीं। नूतन की पारी भी 22 वर्ष पुरानी हो चुकी थी। इन 22 वर्षों में नूतन तीन बार थोड़े समय के लिए परदे से हट गई थीं और हर बार लौटकर उन्होंने अविस्मरणीय किया। 
 
'मेरी जंग' और 'कर्मा' में मां की सशक्त भूमिकाएं उन्होंने अदा की। कालीगंज की बहू के रूप में 'मुजरिम हाजिर' श्रृंखला में टेलीविजन पर नूतन ने एक यादगार भूमिका अदा की थी। इसके बाद वे गंभीर रूप से बीमार हो गईं। 
किसी भी प्रथम श्रेणी की नायिका के लिए नूतन ने एक बहुत लंबी और सशक्त पारी खेली है। 21 फरवरी 1991 को 54 वर्ष की आयु में नूतन का देहांत हुआ। 
 
प्रमुख फिल्में : हमारी बेटी (1950), हम लोग, नगीना (1951), लैला मजनू (1953), शबाब (1954), सीमा (1955), बारिश, पेइंग गेस्ट (1957), दिल्ली का ठग, सोने की चिड़िया (1958), अनाड़ी, कन्हैया, सुजाता (1959), छबीली छलिया (1960), सूरत और सीरत (1962), बंदिनी, तेरे घर के सामने (1963), खानदान (1965), दुल्हन एक रात की (1966), मिलन (1967), गौरी, सरस्वतीचंद्र (1968), यादगार (1970), सौदागर (1973), दुनियादारी (1977), मैं तुलसी तेरे आंगन की, साजन बिना सुहागन (1978), जीओ और जीने दो (1982) 
(पुस्तक : परदे की परियां से साभार) 
 
 
 

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