Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia
Advertiesment

नवाजुद्दीन सिद्दीकी : खाना बनाने का काम भी किया, लेकिन उम्मीद का साथ नहीं छोड़ा

webdunia
मंगलवार, 19 मई 2020 (06:30 IST)
नवाजुद्दीन सिद्दीकी की गिनती आज बॉलीवुड के बेहतरीन अभिनेताओं में होती है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने यहां तक पहुंचने के लिए कड़ा संघर्ष किया है। 
 
आर्थिक परेशानियों का सामना किया है। काम पाने के लिए खूब चक्कर लगाए हैं। भूखे रहे हैं। यह कड़ा संघर्ष, भूख से सामना और धूप-बारिश के थपेड़े सहने के निशान आज उनके चेहरे पर नजर आते हैं। वे तपे हुए लगते हैं और यही बात उनके अभिनय में भी देखने को मिलती है। 
 
उत्तर प्रदेश के एक गांव के रहने वाले नवाजुद्दीन के परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। नवाजुद्दीन सहित आठ भाई-बहन है। 
 
स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद नवाजुद्दीन हरिद्वार के गुरुकुल कांगरी विश्वविद्यालय से बी.एससी. (केमिस्ट्री) करने पहुंच गए। एक्टर बनने की बाद दिमाग में नहीं थी। पढ़ाई कर नौकरी करना चाहते थे। 
 
पढ़ाई पूरी करने के बाद बड़ौदा में उन्होंने एक साल केमिस्ट का जॉब भी किया। इसके बाद नई नौकरी की तलाश में महानगर दिल्ली जा पहुंचे। 
 
दिल्ली में उन्हें एक नाटक देखने को मिला और उनके दिल में अभिनय करने की तमन्ना जाग गई। उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में एडमिशन लेना चाहा पर एक नियम आड़े आ गया। दस नाटकों में अभिनय करना जरूरी था। नवाजुद्दीन ने अपने दोस्त की मदद से यह नियम पूरा किया। 
 
एनएसडी में पढ़ाई पूरी करने के बाद 1999 में वे मुंबई आ पहुंचे और यही से संघर्ष शुरू हुआ। नवाजुद्दीन को समझ आ गया कि फिल्मों की दुनिया में जगह बनाना आसान नहीं है। बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। शक्ल-सूरत से भी अति साधारण थे, लेकिन ओमपुरी और नसीरुद्दीन शाह जैसे खुरदरे चेहरे वालों को फिल्म में देखते थे इसलिए उम्मीद की लौ को कभी बुझने नहीं दिया। 
 
आमिर खान की फिल्म 'सरफरोश' में छोटा सा रोल मिला। रामगोपाल वर्मा ने भी शूल (1999) और जंगल (2000) में उन्हें संक्षिप्त भूमिकाएं दी। पर इनसे पेट नहीं भरा जा सकता था। मुंबई में रहना कितना भारी पड़ता है ये सभी लोग जानते हैं। सिर के ऊपर छत और पेट भरने के लिए खाना जुटाना आसान नहीं था पर नवाजुद्दीन लगे रहे। 
 
राजकुमार हिरानी की फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस (2003) में भी नवाजुद्दीन नजर आए। वे जेबकतरे बने थे। किसी ने सलाह दी कि फिल्म के अलावा टीवी भी कर सकते हो। नवाजुद्दीन ने छोटे परदे पर भी हाथ-पैर मारे पर खास कामयाबी हाथ नहीं लगी। हां, इरफान खान के साथ 'द बायपास' (2003) फिल्म जरूर की, लेकिन ये फिल्म खास नोटिस नहीं की गई। 
 
2002 से 2005 तक का वक्त नवाजुद्दीन ने बड़ी मुश्किल से काटा। काम नहीं था और खाने-पीने रहने का मीटर चालू था। 
 
ऐसे वक्त दोस्त बड़े काम आते हैं। चार दोस्त मिल कर एक फ्लेट में रहते थे। नवाजुद्दीन अपने हिस्से का पैसा बमुश्किल दे पाते थे। कभी छोटा-मोटा काम तो कभी एक्टिंग वर्कशॉप, किसी तरह वक्त कट रहा था। साथ ही फिल्म में पहचान नहीं बना पाने की टीस ज्यादा परेशान कर रही थी। 
 
2004 में तो यह हालत हो गई कि किराया देने के पैसे नहीं रहे। नवाजुद्दीन को फ्लेट छोड़ना पड़ा। आखिर कड़के दोस्त भी कितनी मदद करते? 
 
तभी उन्हें अपना एनएसडी का एक सीनियर मिला। उसने अपने साथ नवाजुद्दीन को रहने की इजाजत दे दी, लेकिन शर्त रख दी कि दोनों समय खाना बनाना पड़ेगा। मरता क्या न करता, नवाजुद्दीन ने शर्त कबूल ली। 
 
आर्थिक तंगी, खाना बनाना और बचे समय में काम पाने की जुगाड़ करना। यह सब इतना आसान नहीं था, लेकिन नवाजुद्दीन डटे रहे। मुकाबला करते रहे। उन्हें अपने पर विश्वास था। निराशा होती थी, लेकिन उसे हावी नहीं होने दिया। 
 
2007 में ब्लैक फ्राइडे फिल्म मिली, लेकिन यह फिल्म रिलीज ही नहीं हो पाई। इसे अनुराग कश्यप ने निर्देशित किया था। शायद अनुराग को नवाजुद्दीन में 'बात' नजर आई। उन्हें शायद महसूस हुआ हो कि नवाजुद्दीन में अभिनय क्षमता है। आखिर वे निर्देशक हैं और काबिल निर्देशक पारखी जौहरी से कम नहीं होता।  
 
देव डी नामक फिल्म अनुराग ने बनाई और उसमें नवाजुद्दीन को 'इमोशनल अत्याचार' नामक गाने में रोल दे दिया। यह गाना बहुत फेमस हुआ। 
 
नवाजुद्दीन को मुंबई आए लगभग 11 साल हो गए थे, लेकिन अभी भी वे जहां के तहां ही खड़े थे। 2010 में एक फिल्म आई, पीपली लाइव। यह बहुत चर्चित फिल्म थी। इसमें नवाजुद्दीन ने एक पत्रकार का रोल निभाया था। इस रोल में उन्हें नोटिस किया गया। 
 
2012 में विद्या बालन की फिल्म 'कहानी' रिलीज हुई जो बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही। इसमें नवाज ने एक कड़क ऑफिसर का रोल निभा कर सभी का ध्यान खींचा। 
 
पीपली लाइव और कहानी ने नवाजुद्दीन की पहचान बना दी। इन दोनों दमदार रोल में नवाजुद्दीन ने दिखा दिया कि उनमें अपार क्षमता है और यह फिल्ममेकर्स पर निर्भर है कि वे उनकी प्रतिभा का उपयोग कैसे करते हैं। 
 
गैंग्स ऑफ वासेपुर ने नवाजुद्दीन को सीधे आगे ला खड़ा किया। अब नवाजुद्दीन जाना-पहचाना नाम हो गए। उन्हें पहचान मिली। तारीफ मिली। फिल्में मिली। पैसा मिला। इसी की तलाश में तो वे यहां आए थे। लेकिन लगभग 15 साल उन्हें संघर्ष करना पड़ा। पसीना बहाना पड़ा। लेकिन उन्होंने उम्मीद का दामन और खुद पर विश्वास करना नहीं छोड़ा। 
 
19 मई 1974 को जन्मे नवाजुद्दीन सिद्दीकी अब एक लोकप्रिय नाम है। उनका संघर्ष उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो अभी इस रास्ते पर हैं। 
 

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

कोरोना काल के बाद कैसे शूट होंगे इंटीमेट सीन्स, मेकर्स ने कही ये बात...