मुंबई में एक जगह भिंडी बाजार कहलाती है और यही की कहानी को फिल्म में दिखाया गया है। भिंडी बाजार जेबकतरों, चोर-उचक्कों से भरा हुआ है। किसी भी व्यावसायिक संस्थान की तरह इनकी भी एक कंपनी है- भिंडी बाजार इनकॉर्पोरेशन। इसमें कई पदों पर कर्मचारी काम करते हैं। उन्हें भी फील्ड वर्क और एडमिनिस्ट्रेशन करना पड़ता है। तगड़ी प्रतिद्वंद्विता और खतरा उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं।
PR
इन लोकल माफियाओं का प्रमुख मामू है। वह जिस पोजीशन पर है वहाँ तक पहुँचने की कोई सोच भी नहीं सकता। मामू की जगह कौन लेगा ये कोई नहीं जान सकता। ठीक शतरंज की तरह जहाँ एक प्यादा चेसबोर्ड के आखिरी सिरे पर जाकर वजीर बन जाता है।
PR
भिंडी बाजार में कई ऐसे प्यादे हैं जिनमें वजीर बनने के लिए गलाकाट स्पर्धा है। जिंदगी की शतरंज पर यहाँ कई लोग मोहरे बने हुए हैं। षड्यंत्र, एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़, प्यार, वासना, नफरत, बदला जैसी कई भावनाएँ इस फिल्म में देखने को मिलती हैं।