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कांजी मेहता की एक दुकान है जिसमें वे भगवान की मूर्तियां, लॉकेट, फोटो आदि बेचते हैं। पुरानी मूर्ति सस्ते दामों में खरीदते हैं और उन्हें वर्षों पुरानी बताकर एक का माल दस गुना में बेचते हैं। भगवान के अंधभक्त झांसे में आ जाते हैं। मजेदार बात तो ये है कि कांजी मेहता नास्तिक हैं। भगवान को वे मानते ही नहीं।
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एक दिन भूकंप आता है और पूरे शहर में सिर्फ कांजी की दुकान तबाह होती है। इसको लेकर लोग काफी आश्चर्य व्यक्त करते हैं। कांजी भाई ने बीमा करवाया हुआ है, जब वे क्लेम लेने जाते हैं तो ‘एक्ट ऑफ गॉड’ के तहत बीमा कंपनी उनका दावा ठुकरा देती है। कंपनी के मुताबिक भूकंप मनुष्य द्वारा नहीं बल्कि भगवान द्वारा आया है।
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गुस्साया कांजी भगवान के खिलाफ अदालत में जाता है और अपना हर्जाना मांगता है। कांजी विभिन्न धर्मों के प्रमुखों को कानूनी नोटिस भेजता है जिससे लोग उसके खिलाफ हो जाते हैं। अदालत कांजी की भगवान के खिलाफ मुकदमा चलाने की बात मान लेती है। कांजी अपनी पैरवी खुद करता है।
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अदालत से जैसे ही कांजी बाहर निकलता है वैसे ही लोग उसे मारने के लिए दौड़ते हैं। कांजी भागता है, लेकिन भीड़ उसके नजदीक पहुंच जाती है। अचानक एक व्यक्ति चमत्कारी तरीके से बाइक पर आता है और कांजी को बैठाकर सुरक्षित जगह ले जाता है। वह अपने आपको भगवान बताते हुए अपना नाम कृष्णा वासुदेव यादव बताता है। कांजी को उसकी बात पर विश्वास नहीं होता।
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दूसरी सुनवाई में कांजी शानदार जिरह करता है, लेकिन वह तब फंस जाता है जब उसे ये साबित करने के लिए कहा जाता है कि भगवान का अस्तित्व है। आखिर कोई ये कैसे साबित कर सकता है? कांजी केस जीतता है या उसकी हार होती है, जानने के लिए देखना होगी ‘ओह माय गॉड’।