निर्माता : प्रकाश झा निर्देशक : सुधीर मिश्रा संगीत : शांतनु मोइत्रा कलाकार : शाइनी आहूजा, सोहा अली खान, सोनिया, रजत कपूर, विनय पाठक, दीपान्निता शर्मा, सुष्मिता मुखर्जी
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1950 और 60 के दशक को भारतीय फिल्म उद्योग का स्वर्णिम काल कहा जाता है। उस दौर में कई प्रतिभाशाली कलाकारों ने मिलकर अभिनय, संगीत और निर्देशन के जरिए कई यादगार फिल्मों का निर्माण किया था। 50 से 60 वर्ष पूर्व बनाई गई फिल्में आज भी देखी जाती हैं।
निर्देशक सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘खोया-खोया चाँद’ भारतीय फिल्म उद्योग के उस स्वर्णिम दौर को श्रद्धांजलि है। ‘ओम शांति ओम’ में बॉलीवुड के 70 के दशक को पेश किया गया था। ‘खोया-खोया चाँद’ में 50 और 60 का दशक दिखाया गया है।
ज़फर अली (शाइनी आहूजा) लखनऊ के नवाब परिवार से है। एक लेखक और निर्देशक के रूप में जफर मुंबई आकर फिल्मी दुनिया का हिस्सा बन जाता है। निखत बानो (सोहा अली खान) ने फिल्मों में अपनी शुरूआत एक्स्ट्रा कलाकार के रूप में की थी। जल्दी ही उसकी गिनती नामी नायिकाओं में होने लगी।
निखत और ज़फर के बीच मुलाकात होती है क्योंकि उनके बीच प्यार होना था। उनका प्यार ऐसा था कि वे दोनों साथ में भी नहीं रह पाते हैं और एक-दूसरे के बिना भी उन्हें चैन नहीं मिलता।
उनकी राह में कई बाधाएँ आती हैं और उन्हें अक्सर दिल तोड़ने वाले निर्णय करना पड़ते हैं। फिल्मी दुनिया की चकाचौंध सिर्फ बाहर से दिखाई देती है। अंदर से सच कुछ और होता है। इस दुनिया में महत्वाकाँक्षा का बोलबाला रहता है और प्यार की कोई कीमत नहीं होती।
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ज़फर और निखत के प्रेम के जरिए सुधीर मिश्रा ने चकाचौंध से भरी जिंदगी की कड़वी हकीकत को प्रस्तुत करने की कोशिश की है। कहा जा रहा है कि ज़फर और निखत की प्रेरणा गुरुदत्त और वहीदा रहमान से ली गई है।
यह फिल्म सोहा अली के लिए बहुत अहम् है। एक अभिनेत्री के रूप में उन्हें इस फिल्म में भरपूर अवसर मिले हैं। पहले सोहा की जगह विद्या बालन के नाम पर विचार किया गया था, लेकिन उम्र और चेहरे की मासूमियत के कारण सोहा ने बाजी मार ली।