’फिराक’ फिल्म के जरिये अभिनेत्री नंदिता दास ने निर्देशन के मैदान में कदम रखा है। भारत में यह फिल्म प्रदर्शित नहीं हुई है, लेकिन टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, लंदन फिल्म फेस्टिवल जैसे कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में यह फिल्म सराही जा चुकी है।
फिल्म की कहानी में 24 घंटे की अवधि दिखाई गई है। ये 24 घंटे सन् 2002 में गुजरात में हुए दंगों के एक महीने के बाद के हैं। इस सांप्रदायिक हिंसा में 3000 से भी ज्यादा मुस्लिम मारे गए थे। हजारों की संख्या में बेघर हो गए थे। कई महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ था। ‘फिराक’ में इन सत्य घटनाओं को थोड़ा कल्पना का पुट देकर दिखाया गया है।
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फिल्म में आम आदमी की इन घटनाओं के बाद की भावनाओं को टटोलने की कोशिश की गई है। कुछ लोग इस हिंसा के शिकार थे, कुछ गुस्से से भरे थे तो कुछ ने चुप्पी साध ली थी। ‘फिराक’ में कई लोगों की कहानियाँ हैं, जो आपस में जुड़ी हुई भी हैं और नहीं भी।
एक मध्यमवर्गीय महिला ने हिंसा के शिकार हो रहे व्यक्ति को देख अपने घर के दरवाजे बंद कर लिए, जिसको लेकर वह बेहद शर्मिंदा है। दो दोस्तों की दोस्ती की परीक्षा संदेह और भय से भरे माहौल में होती है।
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युवाओं का एक समूह हिंसा का शिकार हुआ है। असहाय और गुस्से से भरे वे बदला लेने के लिए उतारू हैं। एक हिंदू-मुस्लिम जोड़ा है जो अपनी पहचान छिपाने और बताने के बीच संघर्ष कर रहा है। एक बेटा दंगों में अपना परिवार खो चुका है और अपने खोए हुए पिता की तलाश में है।
अलग-अलग किरदारों के जरिये उनकी भीतरी और बाहरी जिंदगी पर हिंसा का क्या असर हुआ है, ये फिल्म में टटोलने की कोशिश की गई है। हिंसा का कोई धर्म नहीं होता और इसका असर सभी पर होता है। इस दहशतभरे माहौल में भी कुछ लोग बेहतर समय के लिए आशा से भरे गीत गाना चाहते हैं।
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क्या कहती हैं नंदिता दास ‘फिराक’ में सांप्रदायिक हिंसा के एक महीने बाद की परिस्थिति को दिखाया गया है, इसलिए फिल्म में हिंसा नहीं है। मैंने इन भयावह घटनाओं के बाद मनुष्य की समस्या, रिश्तों पर असर और मानसिक स्थिति को दिखाने की कोशिश की है।‘