बुधिया सिंह- बोर्न टू रन : फिल्म समीक्षा

बमुश्किल पांच वर्ष का होगा बुधिया सिंह। पुरी से भुवनेश्वर के बीच वह दौड़ता है। दूरी 65 किलोमीटर। तापमान 47 डिग्री। सात घंटे और दो मिनट में वह यह दूरी तय करता है, लगातार दौड़ते हुए। फिल्म में जब उसकी यह दौड़ दिखाई जाती है तो आप असहज हो जाते हैं। पसीने में लथपथ दौड़ते हुए बुधिया की सांस की आवाज दर्शकों को विचलित कर देती है। बुधिया का कोच बिरंची जो अब तक फिल्म में भला आदमी  लगता है अचानक दर्शकों की नजरों में विलेन बन जाता है। बुधिया पानी मांगता है तो वह पानी नहीं देता। ऐसा महसूस होता है कि वह एक छोटे बच्चे पर जुल्म कर रहा है। दिमाग में प्रश्न उठने लगते हैं कि क्या बिरंची सही है या फिर चिल्ड्रन वेलफेअर वाले जो बुधिया से ऐसी दौड़ लगवाने के खिलाफ हैं।  फिल्म का यह सीक्वेंस उलट-पुलट कर रख देता है।
 
ऐसे ही कुछ बेहतरीन दृश्य 'बुधिया सिंह: बोर्न टू रन' नामक फिल्म में देखने को मिलते हैं जो बुधिया नामक उस धावक की कहानी है जिसे कभी उड़ीसा का वंडर बॉय कहा गया था। यह बात लगभग दस वर्ष पुरानी है। बुधिया के नाम 'वर्ल्डस यंगेस्ट मैराथन रनर' के नाम का रिकॉर्ड है। 
 
उड़ीसा की गरीबी भी फिल्म में नजर आती है। बुधिया इतने गरीब परिवार में वह पैदा हुआ था कि उसकी मां महज आठ सौ रुपये में उसे बेच देती है। जब बिरंची नामक जूडो कोच को यह बात पता चलती है तो वह बुधिया को अपने पास रख लेता है। 22 अनाथ बच्चों को अपने घर में पनाह देकर बिरंची उन्हें जूडो सिखाता है। बुधिया में बिरंची को एक धावक दिखता है और उसके बाद बुधिया की लोकप्रियता दुनिया में हो जाती है।
 
बिरंची का सपना है कि 2016 के ओलिम्पिक में बुधिया भारत की ओर से दौड़े और पदक लाए, लेकिन सपनों को हकीकत में बदलना इतना आसान कहां है। बुधिया की लोकप्रियता बढ़ते ही अचानक सरकार और संगठन सक्रिय हो जाते हैं। बुधिया को जन्म देने वाली मां उसे अपने पास इस आस से ले जाती है कि शायद बुधिया के बहाने उसकी गरीबी दूर हो जाए, लेकिन उसकी छत से पानी का टपकना फिर भी बंद नहीं होता। मां से बुधिया को सरकार छिन लेती है। बुधिया और बिरंची में दूरियां पैदा कर दी जाती है।
 
बुधिया को तब यह कह कर दौड़ने से रोक दिया था कि उसकी उम्र मैराथन दौड़ने के लायक नहीं है। अब वह 16 वर्ष का है, लेकिन उस पर लगा प्रतिबंध अब तक हटा नहीं है। 2016 के ओलिम्पिक शुरू होने वाले है और बुधिया का नाम उसमें नहीं है। फिल्म पुरजोर तरीके से बुधिया के पक्ष में आवाज उठाकर लोगों से अपील करती है कि बुधिया से अब तो प्रतिबंध हटाया जाना चाहिए।   
निर्देशक सोमेन्द्र पाढ़ी ने बुधिया की कहानी बेहद खूबसूरती के साथ परदे पर उतारी है। बुधिया को उन्होंने चमत्कारी बालक के रूप में पेश न करते हुए दिखाया है कि कड़े अभ्यास और इच्छाशक्ति के बल पर बुधिया ने यह सफलता हासिल की है। बुधिया के साथ-साथ बिरंची के किरदार को भी बखूबी उभारा है। आश्चर्य होता है कि बिरंची जैसे लोग भी हैं जिनकी कमाई ज्यादा नहीं है लेकिन 22 अनाथ बच्चों को वह पालता है। प्रशिक्षण देता है।
 
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बुधिया और बिरंची की खूबसूरत दुनिया में तब खलल पड़ता है जब नेता, अफसर और समाज दखल देते हैं। राजनीति की अमर बेल किस तरह से बुधिया नामक छोटे पौधे को लील जाती है इस बात को फिल्म में अच्छी तरह से उभारा है। आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि किस तरह से हमारा देश पहले तो उभरते सितारे को पूजता है और फिर उसका करियर खत्म करने में भी देर नहीं लगाता। 
 
फिल्म को थोड़ा और बेहतर बनाया जा सकता था, लेकिन संभवत: सोमेन्द्र के आगे बजट आड़े आ गया होगा। बुधिया के साथ पिछले दस वर्ष में क्या हुआ, यह जानने की उत्सुकता रहती है, लेकिन फिल्म में इस बारे में ज्यादा बात नहीं की गई है। 
 
सोमेन्द्र का निर्देशन उम्दा है। उन्होंने बुधिया की कहानी जस की तस प्रस्तुत कर सवाल दर्शकों के सामने छोड़ दिए हैं। क्या बुधिया की प्रतिभा को पहचाना नहीं गया? क्या खिलाड़ियों की प्रतिभाओं का गला इसी तरह हमारे देश में घोंटा जाता है और इसी कारण हम खेलों में फिसड्डी है? वंडर बॉय के बारे में पीटी उषा, नारायण मूर्ति ने भी बात की है और उनके ओरिजनल फुटेज का इस्तेमाल फिल्म को धार देता है।  
 
कलाकारों के अभिनय ने फिल्म को विश्वसनीयता प्रदान की है। इस वर्ष 'अलीगढ' में अपने अभिनय से दिल जीतने वाले मनोज बाजपेयी का 'बुधिया सिंह' में भी अभिनय देखने लायक है। जमीन से जुड़े एक सकारात्मक कोच की भूमिका को उन्होंने बखूबी जिया है। उनके किरदार ने फिल्म को गहराई दी है। मयूर पाटोले तो बिलकुल 5 वर्षीय बुधिया ही लगा है। एक ऐसा बच्चा जो खुद नहीं जानता कि वह क्या कारनामे कर रहा है और किस तरह उसका करियर लोगों ने चौपट कर दिया है। तिलोत्तमा शोम, छाया कदम, श्रुति मराठे का अभिनय भी देखने लायक है। 
 
बुधिया सिंह: बोर्न टू रन दर्शकों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल है, दु:ख तो इस बात का है कि दर्शक ऐसी फिल्मों से दूरी बना लेते हैं। बुधिया सिंह की कहानी को जिस शो में मैंने देखा उसका एकमात्र दर्शक मैं ही था। 
 
बैनर : वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स, कोड रेड फिल्म प्रोडक्शन्स 
निर्माता : सुब्रत रे, गजराज राव, सुभामित्रा सेन
निर्देशक: सोमेन्द्र पाढ़ी
संगीत : सिद्धांत माथुर
कलाकार : मनोज बाजपेयी, मयूर पाटोले, तिलोत्तमा शोम, छाया कदम, श्रुति मराठे 
सेंसर सर्टिफिकेट : यू  * 1 घंटा 51 मिनट 22 सेकंड
रेटिंग : 3.5/5 

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