केदारनाथ : फिल्म समीक्षा

फिल्म केदारनाथ (2018) से सैफ अली खान और अमृता सिंह जैसे सितारों की बेटी सारा अली खान ने अपना करियर शुरू किया है। 35 वर्ष पहले अमृता सिंह ने फिल्म 'बेताब' (1983) से शुरुआत की थी। 'बेताब' के जरिये धर्मेन्द्र के बेटे सनी देओल को लांच किया गया था। तब स्टार के बेटे-बेटियों को लांच करने वाली फिल्मों की कहानी एक सी ही होती थी। अमीर लड़की गरीब लड़का या फिर लड़के-लड़की की जाति या धर्म का अलग होना उनकी प्रेम कहानी में 'विलेन' होता था। 'केदारनाथ' देख महसूस होता है कि 2018 में भी 1983 वाली कहानी को ही दोहराया जा रहा है। 
 
'केदारनाथ' में लड़का मुस्लिम है, लड़की हिंदू। दोनों की आर्थिक स्थिति में भी अंतर है। दोनों को मोहब्बत हो जाती है और ये बातें दोनों को साथ नहीं होने देती। इसके साथ कहानी में कुछ और बातें भी जोड़ी गई हैं, जैसे केदारनाथ में दो-सितारा, तीन-सितारा होटल खोलने को लेकर तकरार, दो बहनों में एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या का भाव क्योंकि बड़ी बहन से शादी करने वाला लड़का छोटी बहन को पसंद कर उसका मंगेतर बन जाता है। ये सारे सब-प्लॉट्स मूल प्लॉट को धार देने के लिए जोड़े गए हैं, लेकिन ये कोशिश कामयाब नहीं होती। 
 
फिल्म के निर्देशक अभिषेक कपूर ने कनिका ढिल्लन के साथ मिलकर कहानी लिखी है। कहानी तथा फिल्म को अलग लुक और फील देने के लिए केदारनाथ में पांच वर्ष पहले हुई बाढ़ त्रासदी की घटना को इस प्रेम कहानी को जोड़ा है। उस बाढ़ में 4300 से ज्यादा लोग मारे गए थे, हजारों लोग लापता हो गए थे और आर्थिक रूप से करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ था। इस त्रासदी को कहानी से जोड़ने के बावजूद फिल्म पर कोई असर नहीं होता है। निर्देशक ने एक वास्तविक घटना से जोड़ कर फिल्म को सिर्फ 'रियल' बनाने की कोशिश की है, लेकिन बात नहीं बन पाई। 
 
फिल्म की बुनियाद (कहानी) ही कमजोर है। कुछ भी नयापन नहीं है। आगे क्या होने वाला है सभी को पता रहता है। मंदाकिनी (सारा अली खान) और मंसूर (सुशांत सिंह राजपूत) में प्यरा क्यों और कैसे हो जाता है, यह दर्शकों समझ नहीं आता। फिर ब्रेक-अप क्यों होता है इसके लिए भी कोई ठोस वजह सामने नहीं आती। कहानी को किसी तरह खत्म करना था तो केदारनाथ की बाढ़ से जोड़ दिया गया। ऐसा लगता है जैसे लेखकों ने पहले सोचा कि केदारनाथ में हुई त्रासदी पर कुछ लिखना चाहिए और फिर घिसी-पिटी कहानी को इस घटना से जोड़ दिया गया। 
 
निर्देशक के रूप में अभिषेक कपूर ने 'रॉक ऑन' (2008) और 'काई पो चे' (2013) जैसी दो बेहतरीन फिल्में बनाई हैं। 'फितूर' (2016) में वे रंग में नजर नहीं आए और 'केदारनाथ' में उनका ग्राफ और नीचे आ गया। कहानी की कमजोरी उनके प्रस्तुतिकरण पर भारी पड़ी। मंसूर और मंदाकिनी के प्रेम को वे इस तरह से पेश नहीं कर पाए कि दर्शक कुछ महसूस करें। प्रेमियों के मिलने की न खुशी होती है और न बिछड़ने का गम। स्क्रीन पर दिखाया जा रहा घटनाक्रम नकली और सतही लगता है। अभिषेक फिल्म को मनोरंजक भी नहीं बना पाए और ज्यादातर समय बोरियत ही होती है। उन्होंने जहां-जहां कहानी को गाने के सहारे आगे बढ़ाया है, वहीं पर फिल्म थोड़ी अपील करती है। 
 
सारा अली खान के कारण फिल्म लंबे समय से चर्चा में हैं। सारा आत्मविश्वास से भरपूर हैं। सुशांत की नाक के नीचे से उन्होंने सीन चुराए हैं। अभिनय भी उनका अच्छा है, लेकिन एक फिल्म के आधार पर उनके बारे में ठोस राय नहीं बनाई जा सकती। एक बहुत अच्छे और खामोश रहने वाले इंसान के रूप में सुशांत सिंह का काम ठीक-ठाक है। 
 
केदारनाथ के बाढ़ के प्रभाव को स्क्रीन पर अच्छे से पेश किया गया है। हालांकि बहुत कम लाइट्स का प्रयोग कर कमजोरियों को छिपाया गया है। अमित त्रिवेदी ने एक-दो गीतों की धुन अच्छी बनाई है।  
 
कुल मिलाकर 'केदारनाथ' एक औसत से भी नीचे की फिल्म है जिसमें कुछ भी 'एक्साइटिंग' नहीं है। 
 
बैनर : गाय इन द स्काय पिक्चर्स, आरएसवीपी
निर्माता : रॉनी स्क्रूवाला, प्रज्ञा यादव
निर्देशक : अभिषेक कपूर
संगीत : अमित त्रिवेदी
कलाकार : सुशांत सिंह राजपूत, सारा अली खान, नितिश भारद्वाज, पूजा गौर
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * दो घंटे 31 सेकंड
रेटिंग : 1.5/5 

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