Publish Date: Fri, 09 Jan 2015 (14:41 IST)
Updated Date: Fri, 09 Jan 2015 (15:18 IST)
विज्ञापन जगत से फीचर फिल्मों की दुनिया में आए निर्देशक अमित शर्मा की पहली फिल्म 'तेवर' तेलुगु फिल्म 'ओक्काडू' का हिंदी रिमेक है। इसके तमिल, कन्नड़ और बंगाली भाषाओं में भी रिमेक बन चुके हैं। आम दर्शक जिस तरह की कहानी को पसंद करता है उस तरह की यह कहानी है जिसे खूब उतार-चढ़ाव और मेलोड्रामा के साथ पेश किया गया है।
विज्ञापन में चंद सेकंड्स में अपनी बात कहना होती है और फीचर फिल्म में खूब वक्त मिलता है। अमित ने इतनी तसल्ली से काम किया है कि धैर्य आपकी परीक्षा लेने लगता है। उन्होंने फिल्म को बहुत ही ज्यादा लंबा रखा है जिससे दर्शक बोर होने लगते हैं। ऐसा लगता है कि फिल्म खत्म हो गई तभी विलेन फिर उठ खड़ा होता है और फिल्म अपने अंत तक पहुंचने में काफी वक्त लेती है। फिल्म को आधे घंटे कम आसानी से किया जा सकता था और यदि ऐसा होता तो यह मसाला फिल्म ज्यादा प्रभावी होती।
तेवर फिल्म का हीरो घनश्याम शुक्ला उर्फ पिंटू (अर्जुन कपूर) कबड्डी प्लेयर है। फाइटिंग के दौरान भी वह कबड्डी खेलने लगता है और गुंडों से पूछता है 'कबड्डी कबड्डी कबड्डी, किसकी मोड़ू गर्दन, किसकी तोड़ू हड्डी।' वह सुपरमैन की तरह छलांग लगाता है और सलमान खान की तरह दर्जनों गुंडों को धूल चटा सकता है।
फिल्म का विलेन गजेंदर (मनोज बाजपेयी) बाहुबलि है। हीरोइन राधा (सोनाक्षी सिन्हा) को देखता है तो उसका दिल आ जाता है। छैल-छबीला बन कॉलेज में जाकर राधा को अपने दिल की तरफ इशारा कर कहता है कि यहां पीतल नहीं है, रोज़ (गुलाब) का गार्डन भी है। शादी कर लो। राधा ठुकरा देती है और बाहुबलि से डर देश छोड़ने की तैयारी कर लेती है। राधा को घर से गायब देख बाहुबलि का खून खौल जाता है। वह पूरे शहर वालों को धमकी देता है कि यदि राधा नहीं मिली तो वह पूरे शहर का दामाद बन जाएगा और जहां इच्छा हुई वहीं खटिया बिछा लेगा।
गजेंदर से भागती राधा अचानक पिंटू से टकरा जाती है और पिंटू उसकी मदद जान पर खेल कर करता है। पिंटू से राधा पूछती है कि वह उसकी मदद क्यों कर रहा है तो वह कहता है कि वह सुपरमैन है। मदद करना उसका काम है। हीरो-हीरोइन भागते फिरते हैं और गजेंदर उनका पीछा करता है। इस भागमभाग में गाने, फाइटिंग, डांस और रोमांस देखने को मिलता है।
फिल्म की कहानी बेहद रूटीन है और सारा मामला प्रस्तुतिकरण पर टिक जाता है। निर्देशक ने फिल्म को आम दर्शक की पसंद के अनुरूप बनाने के लिए तमाम वो बातें डाली हैं जो इस वर्ग को पसंद है, लेकिन मसाले होने के बावजूद फिल्म जायकेदार नहीं लगती।
हीरो-हीरोइन और उनके पीछे भागता विलेन को लेकर जो थ्रिल होना था, वो फिल्म में नदारद है। रोमांस की भी फिल्म में कमी महसूस होती है। हीरोइन का हीरो के प्रति आकर्षित होने वाला प्रसंग फिल्म में बहुत देर से आता है। फिल्म का शुरुआती हिस्सा बोरियत से भरा है। हीरो-हीरोइन की पहली मुलाकात के बाद फिल्म में गरमाहट आती है।
फिल्म के पात्र उत्तर भारत से हैं लिहाजा वहां का माहौल उम्दा तरीके से दिखाया गया है। रियल लोकेशन होने के कारण फिल्म वास्तविकता के नजदीक लगती है। फिल्म के प्रमुख पात्रों ने भी अपने उम्दा अभिनय के कारण फिल्म में दर्शकों की रूचि बनाए रखी।
उत्तर भारतीय लड़के की भूमिका अर्जुन कपूर को सूट करती है और उनका रफ-टफ व्यक्तित्व इस तरह की भूमिका के लिए सूट भी करता है। इस बहाने वे अपने अभिनय की कमजोरियां भी छिपा ले जाते हैं। उन्हें सलमान की तरह पेश करने की कोशिश की गई है, लेकिन वे इतने बड़े स्टार नहीं बने हैं कि इतना वजनी भार उठा सके। कुछ हरकतें करते सिर्फ सलमान ही अच्छे लगते हैं।
सोनाक्षी सिन्हा के हिस्से कम काम था, लेकिन जितना था उन्होंने अच्छे से किया। मनोज बाजपेयी ने अपने किरदार को लाउड बनाने के लिए ओवर एक्टिंग की है। वे इतने अच्छे एक्टर हैं कि उनकी ओवर एक्टिंग भी अच्छी लगती है। कायदे से उनका जो पात्र है उसके लिए कम उम्र का कलाकार चाहिए था, लेकिन इस बात को मनोज अपने उम्दा अभिनय से दबा देते हैं।
फिल्म का संगीत मधुर है। 'सुपरमैन' और 'राधा नाचेगी' हिट हो चुके हैं, लेकिन 'जोगनिया' और 'मैं नहीं जाना परदेस' ज्यादा अच्छे हैं। इन दोनों गीतों का फिल्मांकन बेहतरीन है क्योंकि ये कहानी में फिट है।
कुल मिलाकर फिल्म की लंबाई ने तेवर के तीखेपन कम कर दिया है।
बैनर : संजय कपूर एंटरटेनमेंट
निर्माता : संजय कपूर, नरेश अग्रवाल
निर्देशक : अमित रवीन्द्रनाथ शर्मा
संगीत : साजिद-वाजिद, शफकत अमानत अली, इमरान खान
कलाकार : अर्जुन कपूर, सोनाक्षी सिन्हा, मनोज बाजपेयी, श्रुति हासन, राजेश शर्मा
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 39 मिनट
रेटिंग : 2/5
About Writer
समय ताम्रकर
समय ताम्रकर फिल्म समीक्षक हैं, जो फिल्म, कलाकार, निर्देशक, बॉक्स ऑफिस और फिल्मों से जुड़े पहलुओं पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं।....
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