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ये नेचुरलि‍स्‍ट युवा हैं

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कैंपस बज
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आजकल युवा जबरदस्‍त पढ़ाई कर रहा है। करि‍यर को गंभीरता से ले रहा है खूब रुपए भी कमा रहा है। लेकि‍न इसके साथ-साथ क्‍या वो प्रकृति‍ माँ से जुड़े अपने कर्तव्‍यों को लेकर भी गंभीर है। आधुनिक युवा अपने तमाम गैजेट्स को प्यार करता है लेकिन पहाड़ों, जंगलों, नदियों और झरनों से भी उसे उतना ही प्रेम है।

वो चिड़ियों का चहचहाना सुनना पसंद करता है। वो वन्यजीवन को कैद करने के लिए महँगे कैमरे खरीदने से भी गुरेज नहीं कर रहा और वन्यजीवन को पास से देखने के लिए विदेशी दूरबीनें अपने पास रख रहा है।

वो रोजाना के अपने कामों को भी प्रकृति के हिसाब से व्यवस्थित कर रहा है। इसके लिए वो प्लास्टिक, पॉलीथीन आदि से दूरी बना रहा है। वो अपने लैपटॉप की खराब बैटरी और पुराने मोबाइल फोनों को रिसाइकल करने के लिए दे रहा है, बिजली की बचत भी कर रहा है। अपने इन कामों से युवा सिद्ध कर रहा है कि वो सिर्फ 'टेक्नोक्रेट' ही नहीं है बल्कि 'नेचुरलिस्ट' भी है।

अजय सिंगधनगर ई-लर्निंग पर जोर देते हैं और खुद भी कागज बचाते हैं। प्लास्टिक बैग्स इस्तेमाल नहीं करते। उन्होंने भी प्रकृति की सेवा करने के लिए प्रकृति संरक्षण क्षेत्र में समय देने का सोच रखा है।

कौस्तुभ ऋषि ने तो आजीवन प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में जाने का फैसला कर लिया है। वे बताते हैं कि बचपन में महू में रहते समय जब स्कूल जाने के लिए नदी पार किया करते थे तभी से उन्हें प्रकृति से प्रेम हो गया था। पिछले 7-8 साल से वे इस क्षेत्र में जबर्दस्त काम कर रहे हैं।

पहले उन्होंने वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी शुरू की, अब वे प्रकृति सआधुनिक युवा अपने तमाम गैजेट्स को प्यार करता है लेकिन पहाड़ों, जंगलों, नदियों और झरनों से भी उसे उतना ही प्रेम है। वो चिड़ियों का चहचहाना सुनना पसंद करता है। वो वन्यजीवन को कैद करने के लिए महँगे कैमरे खरीदने से भी गुरेज नहीं कर रहा और वन्यजीवन को पास से देखने के लिए विदेशी दूरबीनें अपने पास रख रहा है।

वो रोजाना के अपने कामों को भी प्रकृति के हिसाब से व्यवस्थित कर रहा है। इसके लिए वो प्लास्टिक, पॉलीथीन आदि से दूरी बना रहा है। वो अपने लैपटॉप की खराब बैटरी और पुराने मोबाइल फोनों को रिसाइकल करने के लिए दे रहा है, बिजली की बचत भी कर रहा है। अपने इन कामों से युवा सिद्ध कर रहा है कि वो सिर्फ 'टेक्नोक्रेट' ही नहीं है बल्कि 'नेचुरलिस्ट' भी है।

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अजय सिंगधनगर ई-लर्निंग पर जोर देते हैं और खुद भी कागज बचाते हैं। प्लास्टिक बैग्स इस्तेमाल नहीं करते। उन्होंने भी प्रकृति की सेवा करने के लिए प्रकृति संरक्षण क्षेत्र में समय देने का सोच रखा है।

महाराजा रणजीतसिंह कॉलेज से एमसीए कर रहे संदीप दवे को जब भी समय मिलता है, घर के आस-पास पौधे लगाते हैं। अपने दोस्तों को जन्मदिन पर पौधे लगाने की सलाह भी देते हैं। उन्हें बचपन से ही पक्षियों और वन्यजीवों को देखने का शौक रहा है इसलिए रोजाना के जीवन में वे जंगलों को बचाने के लिए कागज का दुरुपयोग करने से बचते हैं। साइकल चलाते हैं और प्रकृति को प्रदूषण से मुक्त रखते हैं।

एमएससी (आईटी) कर रहे प्रांजल राजपूत कहते हैं- एक बार कोई प्रकृति के नजदीक गया नहीं कि बस वह उसी का होकर रह जाता है। पृथ्वी माँ को सहारा देने के लिए वे अपने छोटे-छोटे प्रयास जारी रखे हुए हैं। वे अपनी बाइक को अप-टू-डेट रखते हैं ताकि कम प्रदूषण करे। वे कागज का भी कम से कम उपयोग करते हैं और बेवजह बिजली नहीं फूँकते। जाहिर है वे पर्यावरण के प्रति खासे सचेत हैं।

क्या आपको पता है?

अमेरिका में..

प्रत्येक 8 घंटे में यहाँ के हवाई अड्डों से 11 हजार व्यावसायिक उड़ानें भरी जाती हैं।

इन व्यावसायिक उड़ानों से हर 6 घंटे के भीतर 10 लाख प्लास्टिक कप कचरे के रूप में निकलते हैं।

यहाँ 1 लाख 70 हजार बैटरियाँ हर 15 मिनट में बनाई जाती हैं।

1 लाख 6 हजार एल्युमीनियम केन हर 30 सेकंड में कचरा बन जाते हैं।

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