एक व्यक्ति ने गुलाब का पौधा घर में लगाया। वह रोजाना उसे पानी देता था और यह उम्मीद कर रहा था कि पौधे में जल्द से जल्द एक गुलाब लगे। वह रोज इस बात का इंतजार करता रहता कि आज गुलाब आ ही जाएगा, पर नहीं आता।
कुछ समय बाद पौधा बड़ा होता है और उसमें नुकीले काँटे नजर आना आरंभ होते हैं। व्यक्ति यह देखकर परेशान हो जाता है और यह सोचने लगता है कि इन नुकीले काँटों के बीच से गुलाब कैसे निकल पाएगा। इसके बावजूद वह पानी देना आरंभ रखता है, पर गुलाब नहीं आता।
वह एक दिन काफी गुस्से में आ जाता है और पौधे को पानी देना बंद कर देता है। यह वहीं समय होता है, जब पौधे से गुलाब की कली आना आरंभ होने ही वाली रहती है। पानी देना बंद करने के कारण पौधे का विकास रुक जाता है और पौधा मर जाता है।
दोस्तों हम सभी के अंदर भगवान ने स्वयं के जैसे गुणों का बीजारोपण किया है, पर हम अपनी गलतियों और बुराइयों की ओर ज्यादा देखते हैं। हम अपने आपको भीतर से देखते ही नहीं हैं और अपनी अच्छाइयों को स्वयं ही छुपाते रहते हैं और उन्हें समय-समय पर पानी नहीं डालते हैं, जिसके कारण अच्छाइयाँ मर जाती हैं।
ऐसा ही हम दूसरों के साथ भी करते हैं। हम दूसरों की बुराइयों पर जल्द नजर डालते हैं और उसकी अच्छाइयों की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता। दरअसल हम जब स्वयं की अच्छाइयों पर भी नजर नहीं डालते, साथ ही दूसरों की बुराइयों की ओर जल्द ध्यान देते हैं। इससे हम स्वयं का विकास भी नहीं कर पाते और दूसरों का विकास हमें अच्छा नहीं लगता।
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अगर हम स्वयं अपने गुणों की ओर सकारात्मकता के साथ देखें तो उसका नतीजा काफी अलग होगा। हमें सबसे पहले अपने गुणों को पहचानना सीखना होगा कि आखिर ऐसे कौन से गुण हैं, जिनके कारण हमारा व्यक्तित्व बन रहा है। कई बार व्यक्ति में जलन, ईर्षा, कपट आदि का भाव रहता है और यह स्वभावगत रहता है।
इस कारण व्यक्ति जाने-अनजाने में ऐसा व्यवहार कर जाता है, जो कि उसके आस-पास के लोगों को अच्छा नहीं लगता, पर किन्हीं कारणों से वे कह नहीं पाते हैं। जब व्यक्ति अपने गुण-अवगुण पहचानने की क्षमता विकसित कर लेता है तब निश्चित रूप से वह अपने आपको सही तरीके से पहचान लेता है और इसके बाद गुणों को सींचना आरंभ करना चाहिए।
गुणों को सींचना यानी अपने आपको समझाने जैसा है, क्योंकि हम स्वयं के साथ संवाद स्थापित करने में भी स्वार्थ बीच में ले आते हैं। स्वार्थ को अलग कर स्वयं के नकारात्मक पहलुओं को दूर कर सकारात्मक गुणों को सींच कर उन्हें व्यक्तित्व में ढालना अपने आपमें काफी बड़ी प्रक्रिया है। जो इस प्रक्रिया से एक बार गुजर जाता है, निश्चित रूप से गुणों की खान बन जाता है।