देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के अंत में जैसे ही धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश लिए प्रकट हुए, देवताओं से छल का विचार कर चुके असुरों ने तुरंत उस कलश को छीनकर अपने कब्जे में कर लिया। लेकिन वे पहले अमृत पीने के लिए आपस में ही झगड़ने लगे। इस बीच निराश देवताओं की गुहार पर विष्णु मोहिनी रूप में प्रकट होकर असुरों के समीप पहुँच गए। उन्हें देख असुर झगड़ना भूलकर उन पर मोहित हो गए। तब मोहिनी वहाँ से बिना कुछ कहे चल दी तो असुर उसका पीछा करने लगे। एक असुर बोला- इस रूपवती स्त्री के हाथों से अमृत पीने का आनंद ही अलग आएगा। उन्होंने मोहिनी से ऐसा करने को कहा लेकिन मोहिनी नखरे दिखाने लगी। इससे असुरों का विश्वास उस पर बढ़ा और उन्होंने पीछे पड़कर उसे मना लिया। मोहिनी इस शर्त पर मानी कि गलत लगने पर भी कोई उसके निर्णय का विरोध नहीं करेगा। इसके बाद मोहिनी ने देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बिठाकर देवताओं को अमृत पिलाना शुरू कर दिया। देवता अमृत पी-पीकर अमर होते जा रहे थे। |
| देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के अंत में जैसे ही धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश लिए प्रकट हुए, देवताओं से छल का विचार कर चुके असुरों ने तुरंत उस कलश को छीनकर अपने कब्जे में कर लिया। लेकिन वे पहले अमृत पीने के लिए आपस में ही झगड़ने लगे। |
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असुरों को यह सब रास नहीं आ रहा था, लेकिन मोहिनी की मुस्कराहट देख वे सब कुछ भूल जाते। इस बीच राहु को शंका हुई। वह रूप बदलकर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया। जब उसे अमृत पिलाने लगी, तो सूर्य व चंद्र ने उसे पहचान लिया। तब तक अमृत राहु के गले तक पहुँच चुका था, लेकिन नीचे उतरने से पहले ही विष्णु ने अपने असली रूप में आकर सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया।
यह देख असुर समझ गए कि उनके साथ छल हुआ है, लेकिन तब तक सारे देवताओं ने अमृत पात्र खाली कर दिया था। इसके बाद देवासुर संग्राम छिड़ गया, जिसमें देवता विजयी रहे।
दोस्तो, अकसर व्यक्ति दूसरों को धोखा देते समय जितना धोखा खाता है, उतना कभी नहीं। क्योंकि जब वह यह सोचकर मन ही मन खुश होता रहता है कि सामने वाला उसके धोखे में आ रहा है, तब उसका ध्यान इस ओर जाता ही नहीं कि धोखा सामने वाला नहीं, वह खुद खा रहा है, क्योंकि सामने वाले को उसकी नीयत का अहसास हो गया था और उसने तुरंत समझदारी से काम लेकर उसे उसके ही जाल में उलझा दिया, जैसा कि मोहिनी ने असुरों के साथ किया।
जैसे काँटा काँटे से निकलता है, वैसे ही छलावे से तो छल ही बचा सकता है। इसमें गलत कुछ भी नहीं बशर्ते आप सीमा का उल्लंघन न करें। वैसे भी दुनिया में हर तरफ धोखा, फरेब, छल-कपट है। ऐसे में चीट करने वाले को उसी के अंदाज में ट्रीट करना गलत नहीं। लेकिन आप छल का मुकाबला तभी कर सकते हैं, जब आपके मन में कोई पाप न हो, क्योंकि उससे अंततः नुकसान आपका ही होता है।
दूसरी ओर, व्यक्ति जितना स्वयं के द्वारा छला जाता है, उतना दूसरों के द्वारा नहीं, क्योंकि वह अपने को लेकर गलतफहमियाँ जो पाले रहता है कि मेरे से बड़े वाला कोई नहीं है। मैं बहुत चतुर हूँ। मेरे आगे सब बच्चे हैं, मूर्ख हैं। ऐसे मुगालते पालकर आप दूसरों को नहीं, खुद को ही तो धोखा देते हैं।
यदि आप भी ऐसी खुशफहमियों के शिकार हैं, तो खुद को धोखे में रखना बंद करें। ऐसे धोखे से आप अपने आपको एक खोखे में बंद कर लेते हैं। तब आपको अपने अलावा कुछ नहीं सूझता और आप दूसरों के लपेटे में आ जाते हैं।
ऐसे में अगर आप दूसरों को दोष दें कि उसने आपको उल्लू बनाया तो यह ठीक नहीं। जब आप स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं तो दूसरे क्यों नहीं उसका फायदा उठाएँगे। इसलिए खोखे से बाहर आएँ, फिर कोई आपको धोखा नहीं दे पाएगा। इसके साथ ही यदि कोई विपरीत सोच वाला व्यक्ति परिस्थितिवश या अपने फायदे के लिए आपका साथ देने को तैयार हो गया है तो यह देख लें कि कहीं काम निकलने के बाद वह आपको धोखा तो नहीं दे देगा। बेहतर तो यही है कि ऐसे लोगों का साथ न लें और यदि लेना भी पड़े तो सतर्क रहें ताकि धोखा न खाएँ।
और अंत में, आज मोहिनी एकादशी है। कहते हैं मोह से ग्रस्त व्यक्ति को अपना भला-बुरा नहीं सूझता और अकसर वह गलत फैसले ही करता है। इसलिए मोह को किसी खोह में दबा दें। छल से बचने का यही हल है। अरे भई, आज फिर मोहिनी रूप। लगता है जेब कटेगी।