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दि‍ल में एक बच्‍चा रखि‍ए जी...

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एमएसन युवा
- अनुराग तागड़े

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हमारी बचपन की यादों में यह भी शामिल रहता है कि हम क्या बनना चाहते थे? पायलट से लेकर डॉक्टर-इंजीनियर बनने के सपने देखने वाला नन्हा बच्चा बड़ा होकर क्या वाकई वह बन पाता है, जो उसे बनना है। फिर ऐसा क्या हो जाता है कि वह अपने करियर का सपना देखना ही बंद कर देता है।

बचपन ही अच्छा होता है, यह बात बड़े होकर हमें समझ में आती है। कॉलेज और स्कूल के दिन जिंदगी का सबसे खूबसूरत दि‍न होते हैं, यह बात हमें बड़े होने के बाद ही समझ आती हैं। बचपन में घर पर कोई मेहमान आ जाए और काफी देर तक वह जाने का नाम नहीं लेता है तब घर का सबसे छोटा सदस्य यह कहने से भी बाज नहीं आता कि अंकल आप कब जाओगे? क्योंकि उसे शिष्टाचार की आदत नहीं, उसे समाज के आडंबरों से कोई मतलब नहीं।

इसके अलावा कोई इन नन्हों से पूछ लेता है कि बड़े होकर आप क्या बनोगे? तब बड़े ही मासूम से जवाब होते हैं। कोई फायटर पायलट बनना चाहेगा तो कोई डॉक्टर तो कोई इंजीनियर। उन्हें इस बात का कोई एहसास नहीं होता है कि ये बनने में उन्हें कितनी बाधाओं को पार करना पड़ेगा। उनका लक्ष्य तो बस जो मन में ठान लिया है वही बनना है।

कितना निःश्छल लक्ष्य है, जिसे पाने का पूर्ण आत्मविश्वास इन बच्चों में होता है। वे आपसे भी तरह-तरह के ऐसे प्रश्न करेंगे, जिनका जवाब आप नहीं दे सकते। हम आसमान क्यों नहीं छू सकते? आप जवाब नहीं देंगे तब वे स्पाइडरमैन या सुपरमैन को बुलाकर अपने प्रश्नों का उत्तर जरूर खोज लेंगे, पर आप जवाब नहीं दे सकते।

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बच्चों की कल्पनाएँ भी बड़ी ही अच्छी होती हैं। वे किसी का भी उत्तर संसार के किसी अन्य वस्तु से जोड़कर देख लेते हैं। उनके लिए उनके माता-पिता नायक-नायिका हैं और उन्हीं के बल पर वे संसार में किसी से भी लड़ भिड़ सकते हैं और अपने मुकाम पाने की ताकत रखते हैं।

हम बड़े हो जाते हैं तब बचपना कहीं खो जाता है यह बात निश्चित है, पर बचपन में हमारे सपने देखने का पैमाना कितना बड़ा था, हम किसी भी बाधा को न जानते हुए लक्ष्य की बातें करते थे। फिर ऐसा क्यों हो जाता है कि बड़े होने के बाद उन कल्पनाओं को ताले लग जाते हैं और हम लक्ष्य की बात न कर बाधाओं को लेकर बैठ जाते हैं और तमाम तरह की नकारात्मक बातें सोचने लग जाते हैं।

दोस्तों जिंदगी बहुत सरल और सहज होती है और इसमें लक्ष्य पाना भी बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं होता है, पर हम जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, अपनी अक्ल लगाते हैं और जिंदगी में आने वाली बाधाओं का विश्लेषण अपने मन से करने लगते हैं और इन विश्लेषणों के मकड़जाल में उलझकर असल लक्ष्य को भूल जाते हैं।

बचपन को जिंदा रखोगे तब न केवल जिंदगी में लक्ष्य पाना आसान होगा, बल्कि सपनों का कैनवास भी बड़ा होगा। यकीन नहीं होता तब थोड़ा समय बच्चों के साथ बिताएँ, उन्हें समझें और यह भी समझें कि वे दुनिया को किस नजरिए से देखते हैं। वे भी इसी माहौल में जी रहे हैं, पर उनका कोमल मन कहता है कि वे जरूर पायलट बनेंगे या जो भी जी में आए बन सकते हैं।

कभी अपने आपको बच्चा बनाकर भी देखो। फिर देखना समस्याएँ बौनी नजर आएँगी और अपने आपमें आत्मविश्वास आएगा कि बचपन में जो पायलट बनने का ख्वाब देखा करता था, आज वह जरा-सी नाकामी से हताश कैसे हो सकता है। मुश्कि‍लों से लडना है तो अपने दि‍ल में एक बच्‍चा जरूर रखि‍ए...

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