एक बारह वर्षीय बालक अपने पिता के साथ बीजापुर के सुल्तान के दरबार में पहुँचा। पिता ने झुककर सुल्तान को तीन बार सलाम किया। इसके बाद पुत्र से भी ऐसा ही करने को कहा। पुत्र ने अपने कदम पीछे हटाए और तनकर बोला- पराए शासकों के आगे झुकना मेरे स्वाभिमान के विरुद्ध है। ऐसा कहकर वह सिंह जैसी चाल से दरबार से चला गया। पूरा दरबार उसके व्यवहार से स्तब्ध रह गया। दरबारियों के चेहरे गुस्से से तमतमा उठे, लेकिन पिता के चेहरे पर गर्व था। उन्हें विश्वास हो गया था कि एक न एक दिन उनका बेटा स्वराज स्थापित कर उनके सपने को जरूर पूरा करेगा। इस घटना के कई वर्षों बाद इतिहास ने अपने आपको दोहराया। दृश्य बदला परंतु घटना नहीं। इस बार मुगल बादशाह औरंगजेब के दरबार में पिता-पुत्र खड़े थे। अंतर केवल इतना था कि पहले वाला पुत्र इस बार पिता की भूमिका में था जो अपने पुत्र के साथ राजा जयसिंह की सलाह पर औरंगजेब से मिलने दिल्ली आया था। औरंगजेब ने जयसिंह को वचन दिया था कि वह पिता-पुत्र को सम्मान के साथ रखेगा, लेकिन उसने अपना वचन तोड़ कर पिता-पुत्र को पंचहजारी मनसबदारों के बीच खड़े होने का स्थान दिया। |
| एक बारह वर्षीय बालक अपने पिता के साथ बीजापुर के सुल्तान के दरबार में पहुँचा। पिता ने झुककर सुल्तान को तीन बार सलाम किया। इसके बाद पुत्र से भी ऐसा ही करने को कहा। |
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ऐसा करके वह उन्हें अपमानित करना चाहता था। लेकिन बचपन से ही जिस व्यक्ति ने स्वाभिमान को अपने प्राणों से ज्यादा माना हो, वह बड़ा होकर इतना बड़ा अपमान कैसे सहन कर लेता? वह औरंगजेब की हरकत का विरोध करते हुए उसी सिंह जैसी चाल से अपने बेटे का हाथ पकड़कर दरबार से निकल गया।
दोस्तो, आप पहचान ही गए होंगे इन पिता-पुत्र की जोड़ियों को। पहली जोड़ी थी बीजापुर के शासक के जागीरदार शहाजी और उनके पुत्र राष्ट्रनायक छत्रपति शिवाजी महाराज की। और दूसरी जोड़ी में शिवाजी के साथ थे उनके पुत्र संभाजी। शिवाजी महाराज ने इस बात की कभी चिंता नहीं की कि उनका सामना किससे है।
उन्होंने अपनी वीरता से बड़े-बड़े विरोधियों को धूल चटाई। वे हमेशा हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहते थे। जैसे कि एक बार अफजल खाँ द्वारा उन्हें कपटपूर्वक मारने की योजना का पता चलने पर अपने हाथ में पहन रखे बाघनख से उसका पेट चीर देना।
मुगल सेनापति शाहिस्ता खाँ द्वारा घेर लिए जाने पर योजनाबद्ध तरीके से उसके तंबू में घुसकर उसकी अँगुलियाँ काट देना। और औरंगजेब द्वारा अपमान किए जाने पर उसी के दरबार में उसका विरोध करना और बंदी बना लिए जाने के बाद फलों की टोकरियों में बैठकर बच निकलना।
इस तरह उन्होंने विकट स्थितियों में भी कभी धैर्य नहीं खोया और अपनी अनोखी युक्तियों से हमेशा उनसे मुक्ति पाई। वे आजाद पंछी थे। उन्हें अपनी स्वतंत्रता बहुत प्यारी थी। यह उनके व्यवहार की दृढ़ता ही थी कि सभी विरोधियों ने भी उनके शौर्य का लोहा माना और उन्हें 'छत्रपति' स्वीकार किया।
दूसरी ओर, उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा कि उनसे गलती से भी किसी का अपमान न हो जाए, किसी के स्वाभिमान को ठेस न पहुँचे। सच्चे वीर पुरुष की यही तो निशानी है। सही मायनों में वे एक 'संपूर्ण व्यक्तित्व' या 'कम्प्लीट पर्सनेलिटी' थे।
और अंत में, आज शिवाजी महाराज की जयंती पर उनके जीवन के इन प्रसंगों से हमें यह सीखना चाहिए कि हमें अपने स्वाभिमान की हमेशा रक्षा करना चाहिए। कहते हैं कि अमृत भी यदि अपमान से दिया जाए तो उसे मत पियो, क्योंकि अपमान के अमृत से सम्मान का विष श्रेष्ठ होता है। अतः हमें न तो किसी का अपमान करना चाहिए, न खुद का अपमान सहना चाहिए।
यदि कोई आपके सम्मान और स्वाभिमान को ठेस पहुँचा रहा है तो उसका खुलकर विरोध करें, क्योंकि परिस्थितिवश यदि आपने अपमान सहन कर लिया तो निश्चित ही वह आपको जिंदगीभर सालता रहेगा।
आप इसके तनाव को लेकर जीते रहेंगे, जिसका असर आपकी कार्यकुशलता पर भी पड़ेगा। निश्चित ही आप ऐसा नहीं चाहेंगे। साथ ही शिवाजी के व्यक्तित्व से प्रेरणा लेकर हमें भी अपने व्यक्तित्व को संपूर्णता प्रदान करने का प्रयास करना चाहिए। काश! शिवाजी आज होते।