कुछ सालों पहले तक यह ट्रेंड मेट्रो शहरों में आया...जब कॉलेज के कैम्पस इंटरव्यू में चयन होने के बाद भी कुछ युवाओं ने नौकरी न कर खुद कुछ करने की ठानी और लाखों के पैकेज को ठुकरा दिया। ये युवा अपने दम पर कुछ करना चाहते थे और इस कुछ में उनके ढेर सारे सपने थे जिन सपनों में पैसा सेकंडरी था और कुछ नया करने की जद्दोजहद ज्यादा थी।
कुछ सालों में आईआईएम और आईआईटी जैसे इंस्टिट्यूट्स से अच्छे नंबरों से पास हुए स्टूडेंट्स ने अपनी इंडस्ट्री डाली और दूसरों को नौकरी देकर अन्य युवाओं के सामने एक एक्जाम्पल रखा। इन युवाओं का मानना है कि नौकरी करना जरूरी नहीं बल्कि अब इतनी महँगी एजुकेशन लेने के बाद दूसरों को नौकरी देने की कोशिश होना चाहिए।
सोशलवर्क में ज्यादा जाते हैं युवा
कुछ अलग करने की चाह इन युवाओं को सीधे सोशलवर्क के सेक्टर में ले आती है। कई युवाओं ने आपस में मिलकर एनजीओ का गठन किया और सोशलवर्क की फील्ड में ऐसा काम करने की दृढ़ प्रतिज्ञा की जिसमें पैसा सेकेंडरी था और सेवा का जज्बा पहले था। कई युवाओं ने ठेठ गाँवों में जाकर आईटी के जरिए गाँव में रहने वाले युवाओं को जोड़कर बिजनेस को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
हेल्प और गायडेंस की जरूरत
युवा केवल जोश में आकर ऐसे कदम न उठा लें इसलिए उन्हें सही गायडेंस व हेल्प की जरूरत है। मेट्रो शहरों में स्थित कई बिजनेस स्कूल्स व इंजीनियरिंग कॉलेजों द्वारा खुद का बिजनेस करने वाले युवाओं के लिए स्पेशल गायडेंस की सुविधा भी उपलब्ध करवाई जाती है।
मुंबई में लगभग सात वर्ष पहले एनईएन (नेशनल इंटरप्रीनियोरशिप नेटवर्क) की स्थापना की गई थी। इसे स्थापित करने के लिए आईआईटी मुंबई, आईआईएम अहमदाबाद, बिट्स पिलानी, एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च मुंबई, इंस्टीट्यूट ऑफ बायोइनफार्मेटिक्स एंड अप्लाइड बायोटेक्नोलॉजी बेंगलुरू ने अपना सहयोग दिया है। इसके अब तक 70 हजार से ज्यादा सदस्य 30 से ज्यादा शहरों में हैं।
एनईएन सीधे रूप से युवाओं को सहयोग नहीं करता बल्कि वह संस्थानों को उनके कैम्पस में किस प्रकार से युवा विद्यार्थियों को स्वयं का उद्योग लगाने में मदद की जा सकती है, इस संबंध में मार्गदर्शन देता है। अब तक संस्थान के सहयोग से 326 उद्योग लगाए गए और 3000 से ज्यादा भविष्य के इंटरप्रीनियोर को गढ़ा गया।