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भावनाओं का बंधन अटूट है

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करियर
- अनुराग तागड़े

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आज के इस भौतिकवादी कार्पोरेट वर्ल्ड में भावनाओं की बात करना आज के जमाने में शायद सही नहीं कहा जाएगा, पर अगर तमाम सफल भारतीय कंपनियों पर नजर डाली जाए तब सभी कंपनियों में मैनेजमेंट व कर्मचारियों के बीच गजब का भावनात्मक बंधन देखने में आता है।

कंपनियों में एचआर विभाग होते हैं, जो कर्मचारियों के सुख-दुख में कंपनी की पॉलिसी के अनुसार कार्य करते हैं, पर आज भी कई कंपनियों में स्वयं मैनजमेंट किसी भी कर्मचारी के सुख-दुख में पॉलिसी को दूर हटाकर उसके इतने नजदीक पहुँचने की कोशिश करते हैं कि कर्मचारी को सही मायने में लगता है कि उसके सिर पर किसी का हाथ जरूर है और उसे फिक्र करने की जरूरत नहीं।

दरअसल यह सबकुछ भावनाओं का खेल है और इसमें पैसा गौण तत्व है। ह्यूमन फैक्टर की बात जब कार्पोरेट वर्ल्ड में आती है तब प्रोफेशनलिज्म को अलग रखकर ही बातें की जाती हैं। बात सही भी है। हम पहले इंसान हैं और बाद में हम कार्पोरेट वर्ल्ड में कोई मैनेजर तो कोई बॉस है।

एक छोटी-सी प्रेम कहानी है, जो यह बताती है कि विश्वास और प्रेम की भावनाओं का बँधन कितना अटूट होता है। लड़का-लड़की आपस में अगाध प्रेम करते थे। दोनों के घरवालों को पता था कि ये दोनों एक दूसरों को जैसे जन्म जन्मांतर से जानते हो, पर लड़की के घर वालों को आपत्ति थी। वे नहीं चाहते थे कि लड़के से ही वह शादी करे, क्योंकि लड़का अभी पढ़ाई ही कर रहा था।

लड़की की जिद के आगे घरवाले मान गए और दोनों परिवारों के बीच सहमति बन गई। लड़के को आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाना पड़ा। दोनों ने लगातार संपर्क में रहने का वादा किया और लड़का चला गया पढ़ाई करने के लिए। काफी समय बीत गया, पर दोनों आपस में फोन से बात करते थे।

लड़की ने भी नौकरी करना आरंभ कर दिया। ऑफिस से लौटते समय लड़की का एक दिन एक्सीडेंट हो जाता है। अस्पताल में उसकी आँख खुलने पर वह अपने आस-पास अपने घरवालों को पाती है और उसकी माँ रोती रहती है, पर माँ की आवाज सुनाई नहीं देती। वह कुछ बोलने जाती है, पर आवाज नहीं निकल पाती। सिर पर चोट लगने के कारण वह बोल व सुन नहीं पा रही थी।

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अस्पताल से घर आने पर लड़की के घर पर लड़के का फोन आता है, पर वह कुछ बोल ही नहीं पाती है। अब उसके मन में ख्याल आता है कि वह लड़के को कह दे कि वह कहीं और शादी कर ले। वह उसे चिट्ठी लिखती है व साथ में एंगेजमैंट रिंग भी वापस कर देती है।

लड़के के कई फोन एवं घरवाले संपर्क करने के लिए आते हैं, पर लड़की किसी से नहीं मिलती और एक दिन लड़की के माता-पिता उसे लेकर दूसरे शहर में चले जाते हैं।

वह लड़की साइन लैंग्वेंज सीख लेती है और अपनी बात घरवालों तक पहुँचाती है कि वह नहीं चाहती कि उसके कारण लड़के की जिंदगी खराब हो जाए। एक दिन लड़की के पास एक मित्र आता है, जो उसे यह बताता है कि उसका प्रेमी लौट आया है, पर प्रेमी कभी भी उसके घर नहीं आता और इस बात को लेकर एक वर्ष हो जाता है। लड़की सोचती है कि प्रेमी ने भी परिस्थितियों के साथ समझौता कर लिया होगा।

फिर एक दिन वही मित्र लड़की के प्रेमी का शादी का कार्ड लेकर आता है। लड़की की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। वह कार्ड पर केवल हाथ भर घुमाती है और मन ही मन प्रेमी के लिए दुआएँ करने लगती हैं। कुछ समय बाद जब वह कार्ड खोल कर देखती है तब कार्ड में वर के स्थान पर प्रेमी का वधू के नाम पर उसका नाम रहता है।

वह यह देखकर आश्चर्य में पड़ जाती है और घर वालों को भी बताती है। उसके माता-पिता भी आश्चर्य में पड़ जाते हैं और दूसरे दिन सुबह प्रेमी घर आता है। दोनों एक-दूसरे को बस देखते ही रहते हैं और इतने में लड़का साइन लैंग्वेंज में कहता है कि मैं तुमसे उतना ही प्यार करता हूँ, जितना आज से कई वर्ष पहले करता था और अब हम शादी करने जा रहे हैं।

दरअसल लड़का एक वर्ष पहले आ गया था और जब उसे वस्तुस्थिति पता चलती है तब वह एक वर्ष में साइन लैंग्वेज सीखता है और फिर शादी के लिए तैयार होता है। दोस्तों प्रेम केवल लड़के व लड़की के प्रति नहीं होता, बल्कि एक कर्मचारी का अपनी कंपनी से प्रेम भी शुद्ध, सात्विक व भावनाओं के डोर से बँधा होता है, जिसमें एक-दूसरे पर विश्वास सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।

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