जिंदगी में कई बार ऐसे मौके आते हैं, जब हम अपने आपसे प्रश्न करते हैं और उत्तर नहीं मिलता। कार्पोरेट या करियर संबंधी या कोई और समस्या हो, अगर कोई हमें अपनी समस्या को हल करने वाला नजर आता है तो वह माँ होती है। बचपन में स्कूल से घर पहुँचते ही अपनी माँ को स्कूल के हालचाल, टीचर ने क्या कहा, कौन से दोस्त के साथ मस्ती की आदि बातें हम माँ के साथ ही कर पाते हैं।
टेस्ट में कम नंबर आए हैं और पापा नाराज होंगे, तब हम माँ को लडियाते हुए मना लेते हैं और माँ पापा को मना ही लेती है। माँ को पता है बेटे की जरूरत मोबाइल, बाइक और अच्छी कोचिंग है, वह ख्याल रखती है कि लाडले को किसी भी बात की कमी न रहे। वह साइंस, मैथ्स के कठिन न्यूमेरिकल नहीं जानती, पर वह इस बात का दिलासा देना जानती है कि बेटा मेहनत करो, टीचर से मार्गदर्शन लो नहीं तो दोस्तों से पूछो, पर हार मत मानो।
वह दिलासा देती है कि बेटा तुम पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करोगे, बड़े आदमी बनोगे। बेटा पढ़-लिख कर बड़ा भी हो जाता है, उसे नौकरी की तलाश है। ऐसे में माँ ही तो आगे आकर मार्गदर्शन करती है और पिता को बेटे के लिए कुछ करने की बात कहती है।
माँ केवल खान-पान और स्वास्थ्य का ख्याल नहीं रखती, वह यह भी देखती है कि संस्कारों का बीजारोपण बचपन से सही तरीके से हुआ है कि नहीं? वह यह भी जानती है कि बेटे के दोस्तों में से कौन अच्छा है और किसे बुरी आदतें हैं।
वह जानती है कि बेटा कितनी ऊँची उड़ान भर सकता है। इस कारण इशारों में ही वह यह भी बता देती है कि बेटा तुम्हें यह करना चाहिए! हम भले ही कहे कि माँ जमाना कहाँ जा रहा है, पता है? पर हम यह भूल जाते हैं कि माँ अपने बेटे या बेटी के बारे में वह सब कुछ जानती है, जो हम स्वयं अपने बारे में नहीं जानते। माँ बेस्ट मैनेजर तो है ही, साथ में वह यह भी जानती है कि हम इतनी तेज गति से भी न दौड़ें कि गिर पड़ें।
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वह स्पीड़ब्रेकर का काम भी करती है और मोरल बूस्ट भी करती है। वह चपत भी लगाती है और दुलार भी करती है। वह शक्तिस्वरूपा का रूप धारण करना भी जानती है और वह अपने लाड़लों की आँखों के आँसू पीना जानती है और खुशियों से उन्हें भरना भी जानती है।
हम नौकरी में हैं और वहाँ कुछ समस्या है। एक बार माँ की राय लेकर देखें कैसे वह निःच्छलता व सहजता के साथ समय की कसौटी पर कस कर उसे हल करती है। वह यह भी जानती है कि बेटे के लिए बहू कैसे स्वभाव की चाहिए या मेरी बेटी कौन से घर में खुश रहेगी!
माँ तो सब जानती है और सही मायने में माँ से बेहतर मार्गदर्शक कोई नहीं हुआ है, न हो सकता है। क्या कार्पोरेट वर्ल्ड में या नौकरी करते समय या स्टूडेंट लाइफ में, कभी आपने सोचा है कि क्या हमारा नेचर भी माँ की तरह हो सकता है। दूसरों की गलतियों को अनदेखा कर उसकी अच्छाइयों को उभारना और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना।
अगर यह कला सभी में आ जाए तो इस दुनिया से निश्चित रूप से ईर्ष्या का नामोनिशान मिट जाए और प्रतिस्पर्धा को हम जीवन का एक आवश्यक अंग मानकर चलने लगेंगे और उससे न डरेंगे और न ही ईर्ष्या द्वेष का भाव पालेंगे। फिर न कोई प्रतिस्पर्धी होगा, न कोई दुश्मन और न किसी प्रकार तनाव। बस सभी 'आगे बढ़ें' की भावना के साथ यह दुनिया सुंदर और सुखद हो सकती है।