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वेलकम चेंज...

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करियर
-अनुराग तागड़े
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तेज गति‍ से बदलते कॉर्पोरेट कल्‍चर में कंपनि‍याँ सफलता प्राप्त करने के तरीके बदल रही हैं। इन तरीकों के साथ वो खुद को भी बदल रहीं हैं। परंपरागत मैनेजमेंट तकनीक के माध्‍यम से सफलता प्राप्त कंपनि‍याँ भी अब पुराने ढर्रे पर ज्‍यादा दि‍नों तक नहीं चल सकती। क्‍योंकि‍ कॉर्पोरेट कल्‍चर में इस तरह का जो बदलाव आ रहा है वह अपने साथ आप आप और हम सभी को बहाकर ले जा रहा है।

ग्‍लोबलाइजेशन के इस दौर में हर क्षेत्र रोज नए एक्‍सपेरिंमेंट हो रहे हैं। कॉर्पोरेट जगत की कॉम्‍पीटि‍श में बने रहने के लि‍ए कुछ नया करने और बदलने की होड़ लगी रहती है। परंपरागत मैनेजमेंट तकनीक व आधुनि‍क कॉर्पोरेट कल्‍चर के बीच का द्वंद है। यह ऐसा बदलाव है जो तेज गति‍ से हो रहा है जि‍से न तो रोका जा सकता है न ही मोड़ा जा सकता है। ।

क्या हैं फायदे:
परंपरागत तरीका तब बहुत ज्यादा कारगर था जब कंपनियों को ज्यादा कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ता था। प्रतिस्पर्धा कम होने की वजह से कंपनियाँ सभी स्तरों पर नियंत्रण अपने हाथ में व केंद्रीयकृत करके रखती थी। इससे सभी स्तरों पर बैठे कर्मचारियों को निर्णय लेने के लिए अपने ऊपर के अधिकारी की अनुमति लेना पड़ती थी।

यहाँ किसी भी निर्णय को लेने के लिए काफी समय लगता था। समय के साथ प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी और विदेशी कंपनियाँ भी भारत आई जो अपने साथ मैनेजमेंट की नई तकनीक भी लाई। अमेरिका स्थित कंपनियाँ भारत में अच्छा बिजनेस कर रही हैं। इसके अलावा अन्य कई देशों की कंपनियाँ भी भारत में जोर-शोर से अपना कामकाज कर रही हैं और उसे आगे बढ़ा रही हैं।

कंपनियों के इतनी तेज गति से फायदा कमाने का कारण ही यह था कि उन्होंने भारत में उनके कर्मचारियों को निर्णय लेने के अधिकार दिए। वे विकेंद्रीकृत निर्णय लेने की प्रणाली पर कार्य करती हैं। इसका असर उनके मैनेजर स्तर के कर्मचारी के काम पर भी पड़ा। उसने संबंध बनाने व कर्मचारियों को प्रेरित करने का कार्य किया और उन्हें निर्णय लेने की शक्तियाँ भी सौंप दीं।

इसी का परिणाम यह है कि ट्रेडि‍शनल मैनेजमेंट के तरीके से काम करने वाली कंपनियाँ पिछड़ने लगीं और उन्हें भी आधुनिक कार्पोरेट कल्चर में अपने आप को ढालना पड़ा और अनमने ढंग से ही सही इस चेंज को वेलकम करना ही पड़ा।

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क्या बदलाव आया:
ध्यान से देखें तब आज से 15 साल पहले के किसी कंपनी मैनेजर और आज के मैनेजर की कार्यप्रणाली में काफी अंतर आया है। वैसे हमारे देश में आज भी कई कंपनियाँ परंपरागत मैनेजमेंट तकनीक को अपना रही हैं और सफल भी हैं। बावजूद इसके उनकी तुलना में नई कंपनियाँ बड़ी तेजी से प्रगति कर रही हैं और उनके मैनेजमेंट का तरीका भी काफी अलग है। यानी कि आज के परिवेश के मुताबिक एकदम नया।

वर्क स्‍टाइल में आया बदलाव:

ट्रेडि‍शनल मैनेजर : योजना बनाता तथा इसके बाद कंपनी में अलग-अलग स्तरों के कर्मचारियों को काम सौंपता है व उनके कामकाज को नियंत्रित करता था।

वर्तमान के मैनेजर : नई दृष्टि विकसित करता है तथा सभी स्तरों के कर्मचारियों को उनके काम और उनकी क्षमता के अनुरूप निर्णय लेने की शक्तियाँ प्रदान करता है। इसके अलावा वह संबंधों के जाल को और भी बड़ा बनाता है। कंपनी के भीतर व बाहर दोनों जगहों पर कर्मचारियों को प्रेरित करता है तथा मार्गदर्शन देता है।

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