एक परिचिता से मिलना हुआ। उनका शहर में एक प्रतिष्ठित बुटिक है। उनके व्यवसाय में सकारात्मक और उत्साही रवैए से मैं प्रभावित होती थी। उस दिन उनसे इसका राज पूछ ही लिया तो उनका जवाब बहुत भिन्न था। अधिकांश लोग कहते हैं कि जीवन का प्रत्येक दिन इस तरह जीयो जैसे वह जीवन का आखिरी दिन हो, पर उन्होंने कहा कि वे बुटिक में प्रवेश करते समय स्वयं से एक वादा करती हैं कि वे उसी भावना से काम करेंगी, जैसा बुटिक के पहले दिन किया था।
इससे वे छोटी खरीददारी करने वाले ग्राहकों को भी वही मान देती हैं, जो अधिक खरीददारी करने वाले को। कोई ग्राहक निराश नहीं जाता। इससे उनकी बाजार में साख बढ़ती ही जा रही है, क्योंकि जो ग्राहक आज छोटी खरीददारी करता है वही कल अधिक भी करता है। हर दिन को पहला दिन समझने से उनमें अहंकार नहीं आता, काम टालने की आदत नहीं बनती और ऐसा ही प्रभाव कर्मचारियों पर भी पड़ता है।
आपने देखा होगा कि कामवाली बाई काम के पहले दिन घर का हर कोना साफ कर देती है, कपड़ों को बेदाग चमका देती है। यदि आप स्वयं नौकरीपेशा हैं तो आपको याद होगा कि नौकरी के शुरुआती दिनों में जो मेहनत आप करते थे, उसका कुछ प्रतिशत भी अब नहीं करते होंगे। समय बीतने के साथ-साथ कार्य के प्रति जोश और समर्पण भी घटता जाता है। वह जज्बा जो कार्य के प्रारंभ में था वह शनैः शनैः क्षीण होता जाता है।
हर दिन, पहला दिन यदि रोज सुबह हम यह निर्णय लें कि उसी उत्साह से कार्य करेंगे, जितना प्रारंभिक दिनों में करते थे तो कार्य की गुणवत्ता में अप्रत्याशित सुधार पाएँगे। हम यह सोचें कि हमें प्राप्त वेतन या सुख-सुविधाएँ यदि बढ़ रही हैं तो उसी अनुपात में हमारी कार्यक्षमता और समर्पण भी बढ़ना चाहिए। पहला दिन समझने से हममें अहंकार का भाव भी नहीं पनप पाएगा, वह अहंकार जो पुराने होने पर हमें हमारे पद या ओहदे के कारण आ जाता है।
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निरंतर प्रगति का लक्ष्य वेद हमारे पूजनीय ग्रंथ हैं। वेदों का एक उपदेश है-'उद्यानं वे पुरुष. नावयानम्।' अर्थात मनुष्य का जन्म इस दुनिया में इसलिए हुआ है कि वह निरंतर प्रगति करे, आगे बढ़ता रहे, कभी नीचे की तरफ नहीं जाए। जिस प्रकार यदि गेंद को ऊपर की ओर उछाला जाए तो एक हद तक वह ऊपर जाएगी, उसके बाद नीचे आने लगेगी। उसी प्रकार जिस दिन मनुष्य की उन्नति रुक गई, उस दिन उसकी अवनति प्रारंभ हो जाएगी। अतः हर सुबह की शुरुआत में हम यह सोचें कि जो भी कार्य हम कर रहे हैं उसे बेहतर कैसे करें?
एक वादा स्वयं से दुनिया की कोई कृति त्रुटिरहित नहीं, उसमें बेहतरी की संभावना होती है। हर दिन हमारी नीयत में यदि हम विनम्रता चाहते हैं तो ईश्वर से प्रार्थना करें कि वे कार्य के प्रथम दिन-सी ईमानदारी हमें हमारे कार्य में बख्शें, हर दिन उन्नति के नए शिखर पर पहुँच, हम स्वयं का परिवार का और समाज-राष्ट्र का नाम रोशन करें। एक वादा स्वयं से करें कि चाहे हम झाडू ही क्यों न लगाएँ, पर वह पिकासो की पेटिंग की तरह अद्वितीय हो।