कला आज महज प्रदर्शन या हुनर तक सीमित नहीं रह गई है। विश्व स्तर पर अब न केवल अच्छे कलाकारों की माँग है वरन उनकी कलाकृतियाँ खासे दाम चुकाकर भी खरीदी जाती हैं।
यहाँ कला से तात्पर्य दरअसल कला की एक शाखा से है जिसमें चित्रांकन, डिजाइनिंग और रंगों से जुड़ी बातें शामिल हैं। आइएँ जानें इसके बारे में कुछ और।
आज यह एक रोमांचक तथा लाभप्रद क्षेत्र बन चुका है उन युवाओं के लिए जिनमें प्रतिभा और लगन दोनों हैं। एक अच्छा कलाकार होने के साथ-साथ आज एक और चीज आवश्यक है और वह है व्यवसायिक समझ का होना। सफलता पाने के लिए इसका होना अति महत्वपूर्ण है।
आपको विभिन्न आर्ट गैलरीज, डीलर्स तथा आर्ट कलेक्टर्स (जो कि एक आर्टिस्ट के करियर को सँवारने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं) के बारे में सारी जानकारी रखना होगी और स्वयं को उनके खाके में पूरी तरह फिट करना होगा।
याद रखिए, आर्ट स्कूल में पढ़ लेने वाले हर छात्र में जाना-माना कलाकार बनने की कूवत नहीं होती। इसके लिए आप में व्यवसायिक समझ होना भी जरूरी है।
ढेर सारे क्षेत्र : फाइन आर्ट्स से स्नातक करने वालों के लिए करियर बनाने के ढेर सारे क्षेत्र होते हैं। इनमें इलस्ट्रेशन, ग्राफिक डिजाइन, एक्जीबिशन डिजाइन, बिल्डिंग आर्किटेक्चर, मॉडल मेकिंग, म्यूजियम एडमिनिस्ट्रेशन, गैलरी ऑपरेशन्स, इंटीरियर-एक्सटीरियल डिजाइन, विजुआलाइजर, आर्ट थेरेपी, आर्ट टीचिंग, रेस्टोरेशन तथा फोटोग्राफी जैसे क्षेत्र शामिल होते हैं।
वहीं कुछ लोग डिजाइन, सेरेमिक्स, ज्वेलरी, फाइबर्स और टेक्सटाइल आदि का रास्ता भी अपनाते हैं। इसके अलावा कुछ अन्य स्वयं के स्टूडियो स्थापित कर एक कलाकार या क्राफ्ट्समैन के बतौर भी सेवाएँ देते हैं। कुछ विद्यार्थी मल्टीमीडिया जैसे क्षेत्र भी चुनते हैं जिसके अंतर्गत वे एनीमेशन, आर्ट डायरेक्शन तथा आर्ट एडमिनिस्ट्रेशन में करियर बना सकते हैं।
आर्ट और बिजनेस एक अच्छा संयोजन है जिसका प्रयोग एक आर्ट गैलरी या डिजाइन स्टूडियो के प्रबंधन हेतु किया जा सकता है। वहीं आर्ट और एजुकेशन (आर्ट पढ़ाने में), आर्ट और कम्प्यूटर साइंस (कम्प्यूटर एनिमेशन), आर्ट और इंग्लिश (क्यूरेटर, रिसर्चर, आर्ट बुक एडिटर, पब्लिशर और रिव्यूवर) आदि रूपों में चुना जा सकता है।
प्रशिक्षण : अधिकांश अच्छे आर्ट स्कूलों में विद्यार्थियों को कल्पनाशीलता के प्रयोग के साथ-साथ अपने काम के प्रति जिम्मेदारी, व्यवसायिकता, अनुशासित कार्यपद्धति आदि के बारे में भी प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि उसे सही दिशा मिल सके और वह अपने-आप को एक अच्छे और सच्चे कलाकार के रूप में स्थापित कर सके।
हालाँकि आमतौर पर बैचलर इन फाइन आर्ट्स या मास्टर इन फाइन आर्ट्स की अवधि में प्रायोगिक ज्ञान बटोरने का समय कम ही दिया जाता है जिसे कि बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि विद्यार्थी और अधिक से अधिक सीख सकें।
फिर भी आज आर्ट्स के विद्यार्थियों हेतु जितने दरवाजे खुले हैं, वे पहले से कहीं ज्यादा हैं। चित्रांकन और मूर्तिकला से लेकर टी.वी., पत्र-पत्रिकाएँ, कम्प्यूटर और अन्य कई क्षेत्रों में अब फाइन आर्ट्स के विद्यार्थियों की माँग बढ़ती जा रही है।