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प्रभु ईसा मसीह

नवम भाव के शनि ने ईसा को महान त्यागी बना दिया

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प्रभु ईसा मसीह
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प्रभु ईसा मसीह का जन्म 25 दिसंबर को संवत् 45 जुलियन शुक्रवार को कृतिका नक्षत्र में रात्रि बारह बजे हुआ था। जितने भी महान पुरुष हुए लगभग उनका जन्म समय रात्रि या बारह बजे का संबंध अवश्‍य रहा। इनका जन्म तुला लग्न में हुआ उस समय की ग्रह स्थिति इस प्रकार थी। गुरु लग्न में, सूर्य राहु में, बुध पराक्रम में, शुक्र चतुर्थ भाव में, मंगल षष्ट में, चंद्र अष्टम में उच्च का शनि व केतु नवम भाव में थे।

उन्हें गुरु, शुक्र, मंगल, शनि ने महान यशस्वी बनाया। शनि नवम भाव में बैठकर जातक को धर्मावलंबी बना देता है, वहीं भाग्येश व द्वादेश बुध पराक्रम में शत्रु राशि धनु पर बैठा है। उनकी सप्तम दृष्‍टि भाग्य भाव पर स्वदृष्टि पड़ रही है।

अत: भाग्य ने सदैव साथ दिया, वहीं वरन में गुरु षष्‍ट भाव व पराक्रम भाव का स्वामी शत्रु राशि तुला में बैठा है। अत: इन्हें धर्म के मामलों में सदैव शत्रुओं से पीड़ा रह‍ी या यूँ कहे ‍इन्हें सबसे अधिक कष्‍ट शत्रुओं से रहा।
  प्रभु ईसा मसीह का जन्म 25 दिसंबर को संवत् 45 जुलियन शुक्रवार को कृतिका नक्षत्र में रात्रि बारह बजे हुआ था। जितने भी महान पुरुष हुए लगभग उनका जन्म समय रात्रि या बारह बजे का संबंध अवश्‍य रहा। इनका जन्म तुला लग्न में हुआ।      


गुरु लग्न में होने से इन्हें धार्मिक उपदेशक, सत्यनिष्‍ठ बनाया, वहीं कष्टों को सहन करने की अपार शक्ति भी मिली। दृढ़ इच्छा को भी गुरु ने बल दिया। राज्य भाव का स्वामी उच्च का होकर अष्‍टम भाव में बैठा है। अत: राज्य से सदैव अपमानित रहे व कष्‍ट मिला वहीं लग्नेश सुख भाव में अपनी मित्र राशि का होकर चतुर्थ भाव में जो सुख व जन‍ता का भाव है, उसमें बैठा है, अत: इनकी ख्याति आम जनता में अत्यधिक होने से प्रसिद्ध भी हुए और शनि के नवम भाव में होने से महान त्यागी भी बना दिया।

नवम भाव का मित्र राशि का शनि जातक को साधु- सं‍त प्रवृत्ति का बना देता है, वहीं गुरु की नवम दृष्‍टि भाग्य भाव में पड़ रही है, जो शनि को देख रही है। गुरु जिस भी ग्रह पर दृष्‍टि डालता है, उसको अपना गुरुत्व प्रभाव अवश्‍य दे देता है। यहाँ पर राहु की स्थिति नीच है, लेकिन गुरु के केंद्र में होने से नीच भंग भी हुआ।

चूँकि ‍भावेश भाव की दृष्टि से देखा जाए तो गुरु ने नीचत्व प्रभाव भी प्राप्त किया है, जो शत्रु भाव का है, अत: लाख परोपकारी हो या महान उपदेशक, लेकिन शत्रुओं से हमेशा पीडि़त ही रहत‍ा है, जो उनके व्यक्तित्व में देखने को मिलता है। इन्हें यहूदियों ने सूली पर लोहे की कीलों से ठोंक दिया फिर भी ऐसे महान तपस्वी ने यही कहा कि 'हे प्रभु, इन्हें माफ कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते कि हम क्या कर रहे हैं।'

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