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गो कैरोलिंग डे

क्रिसमस का उल्लास दिखाई देगा कैरल गीतों में...

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गो कैरोलिंग दिवस
प्रभु यीशु मसीह के जन्मदिन क्रिसमस से ठीक पहले उनके संदेशों को भजनों (कैरल) के माध्यम से घर-घर तक पहुंचाने की प्रथा को विश्व के विभिन्न हिस्सों में ‘गो कैरोलिंग दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

दुनिया को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले प्रभु यीशु के क्रिसमस से ठीक पहले कैरोलिंग दिवस के दिन ईसाई धर्मावलंबी रंगबिरंगे कपड़े पहनकर एक-दूसरे के घर जाते हैं और भजनों के माध्यम से प्रभु के संदेश का प्रचार-प्रसार करते हैं।

‘ईसाई मान्यता के अनुसार कैरल गाने की शुरुआत यीशु मसीह के जन्म के समय से हुई। प्रभु का जन्म जैसे ही एक गौशाला में हुआ वैसे ही स्वर्ग से आए दूतों ने उनके सम्मान में कैरल गाना शुरू कर दिया और तभी से ईसाई धर्मावलंबी क्रिसमस के पहले ही कैरल गाना शुरू कर देते हैं।’

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‘प्रभु की भक्ति में डूबे श्रद्धालुओं के समूह में भजन गायन का यह सिलसिला क्रिसमस के बाद भी कई दिनों तक जारी रहता है। कैरल एक तरह का भजन होता है जिसके बोल क्रिसमस या शीत ऋतु पर आधारित होते हैं। ये कैरल क्रिसमस से पहले गाए जाते हैं।’

गो कैरोलिंग दिवस एक ऐसा मौका होता है जब लोग बड़े धूमधाम से प्रभु यीशु की महिमा, उनके जन्म की परिस्थितियों, उनके संदेशों, मां मरियम द्वारा सहे गए कष्टों के बारे में भजन गाते हैं।

ईसाई धर्म के अनुसार प्रभु यीशु मसीह का जन्म बहुत कष्टमय परिस्थितियों में हुआ। उनकी मां मरियम और उनके पालक पिता जोसफ जनगणना में नाम दर्ज कराने के लिए जा रहे थे। इसी दौरान मां मरियम को प्रसव पीड़ा हुई लेकिन किसी ने उन्हें रूकने के लिए अपने मकान में जगह नहीं दी। अंतत: एक दंपति ने उन्हें अपनी गौशाला में शरण दी जहां प्रभु यीशु मसीह का जन्म हुआ।

नागालैंड, मिजोरम, मणिपुर समेत समूचे पूर्वोत्तर भारत में लोग विशेषकर युवा बेहद उत्साह के साथ टोलियों में निकलते हैं और रात भर घर-घर जाकर कैरल गाते हैं। कैरल गाने के बाद लोग गर्मागर्म चॉकलेट और मीठे बिस्किट खाते हैं। खास तौर पर भारत में भी यह दिन बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है।

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