'ईश्वर द्वारा एक व्यक्ति को विशेष प्रकार के जीवन के लिए बुलाना ही बुलाहट है।'
धर्मप्रांतीय पुरोहित...
धर्मसंघीय पुरोहित...
संघीय धर्मबंधु...
संघीय धर्म बहनें...
धर्मग्रंध कहता है, 'यदि तुम ईश्वर के लिए कोई मनौती करो तो उसे पूरा करने में विलंब मत करो, क्योंकि ऐसी मूर्खता उसे अच्छी नहीं लगती। अपनी मनौती चढ़ा ही डालो। यह अच्छा है कि तुम मनौती ही न मानो, इसकी अपेक्षा कि तुम मनौती मानो और फिर उसे पूरा न करो।' (उपदेश ग्रंथ 5:3-5)
व्रत किसी के लिए ईश्वर से की गई प्रतिज्ञा है, जो कि संभव, नैतिकता से अच्छा और प्रतिपक्ष से बेहतर हो।
बहुत से लोग पूछते हैं, 'पुरोहित शादी क्यों नहीं करते?' धर्म भाई शादी क्यों नहीं करते? और 'धर्म बहनें शादी क्यों नहीं करतीं?' वे ख्रीस्त और उसकी कलीसिया की और भी अच्छी तरह से सेवा कर सकेंगे।'
हाँ, वे क्यों शादी नहीं करते? सबसे सरल उत्तर यह है कि वे ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं- इस तरह स्वतंत्रता से विवाह त्यागते हैं, क्योंकि वे पूर्ण रूपेण ख्रीस्त के होना चाहते हैं।
शायद तुम समझ नहीं पाओगे कि कोई व्यक्ति क्यों शादी को क्यों त्यागता है, परन्तु इसे तुम्हें ये अच्छी तरह से जान लेना चाहिए कि व्यक्ति कई तरह से भिन्न होते हैं और कुछ पुरुष और स्त्रियाँ ऐसे होते हैं, जो ईश्वर को अपार प्यार प्रकट करने के लिए अलग मार्ग की खोज लेते हैं।
धर्म संघीय व्रत वे हैं, जिसे वे चाहते हैं और जिनके लिए धर्मसंघीय जीवन का अस्तित्व है।
आर्च बिशप फुलटन शीन धर्मसंघीय व्रतों को बड़े ही अनूठे ढंग से व्यक्त करते हैं। वे इन्हें आदान-प्रदान के तौर पर लेते हैं त्यागने जैसा नहीं।
समस्त आदान-प्रदान में कुछ न कुछ निर्णय निहित रहता है कि कैसी चीजों के बिना मैं कर सकता हूँ और कौन सी वस्तु के बिना नहीं कर सकता।
कुछ व्यक्ति हैं, जो बिना धन संपत्ति के भी रह सकते हैं... परन्तु दिल की शांति ईश्वर को अपनाए बिना नहीं प्राप्त कर सकते। इस तरह वे निर्धनता के व्रत द्वारा एक चीज को दूसरी से बदल लेते हैं।
दूसरे पाते हैं कि वे अपनी स्वयं की स्वतंत्र इच्छा के बिना रह सकते हैं, परन्तु वे ईश्वर की इच्छा जाने बिना रह नहीं सकते... और यह आज्ञाकारिता का व्रत लेकर पूरा होता है।
तब भी कुछ पाते हैं कि वे शारीरिक रोमांस के बिना भी रह सकते हैं, परन्तु आत्मा के हर्षोन्माद के बिना नहीं... और वे ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं।
संत पौलुस इसको सुंदर शब्दों में पेश करते हैं, 'मैं चाहता हूँ कि आप निश्चिंत रहें। अविवाहित व्यक्ति प्रभु की बातों की चिंता में रहता है कि वह प्रभु को कैसे प्रसन्न करे। पर विवाहित व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं की चिंता करता है कि वह अपनी पत्नी को कैसे प्रसन्न करे और इस भाँति बँटा रहता है।
अविवाहित स्त्री तथा कुँवारी, दोनों ही प्रभु की बातों की चिंता में रहते हैं कि तन और मन दोनों से पवित्र रहें, परन्तु विवाहित सांसारिक बातों की चिंता करती है कि वह अपने पति को कैसे प्रसन्न करे।' (1 कुरिंथ 7:32-34)
- धर्मप्रांतीय या अधर्मसंघीय पुरोहित वर्ग से हम समझते हैं कि वे पुरोहित जो ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं, विवाह नहीं करना।
आज्ञाकारिता का व्रत- उस धर्माध्यक्ष से जहाँ वे काम करते हैं। उन्हें व्यक्तिगत संपत्ति रखने का अधिकार है।
- धर्मसंघीय पुरोहित वर्ग से हमारा तात्पर्य है- वे पुरोहित जो धर्मसंघ या समाज के होते हैं, जो कलीसिया में, प्रत्येक अपनी विशेष कार्य प्रणाली के द्वारा भिन्न होते हैं।
वे तीन व्रत लेते हैं-
ब्रह्मचर्य- विवाह नहीं करना।
निर्धनता- कोई व्यक्तिगत संपत्ति नहीं रखना।
आज्ञाकारिता- अपने संग के सब अधिकारियों के अधीन रहना।
- धर्मसंघीय धर्म भाई और धर्म बहनें- वे स्त्री और पुरुष हैं, जिन्होंने तीन व्रतों द्वारा अपने धर्म समाज में रहकर अपना जीवन ईश्वर को समर्पित कर दिया है।
वे प्रार्थनामय जीवन, अच्छे उदाहरणों, त्याग के जीवन और अपने अधिकारियों द्वारा सौंपे गए विभिन्न कामों को अपने व्यक्तिगत प्रयत्नों के योगदान से पवित्र माँ कलीसिया की सहायता करते हैं।