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संस्कार

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संस्कार
1. एक बाह्य चिह्न है।
2. ख्रीस्त के द्वारा स्थापित है।
3. कृपा प्रदान करने के लिए है।

संस्कार की आवश्यकता हम ईश्वर के पुत्र, येसु ख्रीस्त की सुस्पष्ट इच्छा से जानते हैं। निश्चय ही वह किसी अन्य तरीकों से भी मानवीय आत्मा पर कृपा और आशीष देने की युक्ति निकाल सकता था, लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि येसु ख्रीस्त को क्या करना चाहिए था... या वे क्या कर सकते थे... बल्कि उसने क्या किया?

सात संस्कार हैं जो निम्नलिखित हैं-
स्नान संस्कार- यह संस्कार मनुष्य को आदि पाप से मुक्त करता और पवित्र कारिणी कृपा में नवजीवन दिलाता है। 'येसु ने उत्तर दिया, मैं आप से सच कहता हूँ, जब तक कोई जल और पवित्र आत्मा से जन्म न ले, तब तक वह स्वर्ग राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।' (योहन 3:5)

दृढ़ीकरण संस्कार- यह हमारा व्यक्तिगत पेन्तेकोस्त है और हमारा आत्मिक बल बढ़ाता है।

'जब येरुसालेम में रहने वाले प्रेरितों ने यह सुना कि समारियों ने ईश्वर का वचन स्वीकार कर लिया, तो उन्होंने पेत्रुस और योहन को उनके पास भेजा। वे दोनों वहाँ गए और उन्होंने समारियों के लिए यह प्रार्थना की कि उन्हें पवित्रात्मा प्राप्त हो। पवित्रात्मा अब तक उनमें से किसी पर नहीं उतरा था, उन्हें केवल प्रभु येसु के नाम पर बपस्तिमा दिया गया था, इसलिए पेत्रुस और योहन ने उन पर हाथ रख दिए और उन्हें पवित्रात्मा प्राप्त हो गया।' (प्रेरितों के कार्यकलाप 8:14-17)

पाप-स्वीकार या मेल-मिलाप का संस्कार- स्नान संस्कार के पश्चात किए गए पापों की क्षमा देता है अथवा किसी एक व्यक्ति को ईश्वर और कलीसिया से मेल-मिलाप कराता है।

येसु ने उस पर फूँक कर कहा, 'पवित्रात्मा ग्रहण करो। तुम जिन लोगों के पाप क्षमा करोगे वे अपने पापों से बँधे रहेंगे।' (योहन 20:22-23)

पवित्र यूखारिस्त- यह हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त का परम पवित्र शरीर रोटी के रूप में और रक्त दाखरस के रूप में प्रदान करता है। यह हमारा आत्मिक भोजन है।

'मैं तुमसे सच कहता हूँ, यदि तुम मनुष्य के पुत्र का मांस नहीं खाते और उसका रक्त नहीं पीते तो तुम्हें जीवन प्राप्त नहीं होगा।' (योहन 6:45)

अंतमलन संस्कार- यह बीमार व्यक्तियों को आत्मिक और कभी-कभी शारीरिक रूप से भी ठीक कर देता है।

'कोई अवस्था हो, तो कलीसिया के स्थविरों (पुरोहितों) को बुलावे और वे प्रभु के नाम पर उस पर तेल का विलेपन करने के बाद उसके लिए प्रार्थना करें। यह विश्वासपूर्ण प्रार्थना रोगी को बचाएगी और प्रभु उसे स्वास्थ्य लाभ प्रदान करेगा। यदि उसने पाप किया है, तो उसे क्षमा मिलेगी।' (याकूब 5.14-15)

विवाह संस्कार- एक भले ख्रीस्तीय विवाहित जीवन जीने की कृपा देता है 'इस कारण मनुष्य अपने पिता और माता को छोड़ देगा, पर अपनी पत्नी से संयुक्त रहेगा और वे दोनों एक तन होंगे।' यह एक महान रहस्य है... यहाँ मेरा संकेत ख्रीस्त और गिरजा की ओर है।' (एफेसियों 5:31-32)

पुरोहिताई- यह संस्कार मनुष्य को ईश्वर का पुरोहित बनाता है। संत पौलुस तिमोथी को लिखते हुए कहते हैं, 'अपने में स्थित उस कृपादान से असावधान मत होइए, जो स्थविर वर्ग के हाथ रखते समय आगमवाणी द्वारा आपको मिला था।' (1 तिमोथी 4:14)

धर्म मंडली (कलीसिया) सात संस्कारों को प्रारंभ से ही महत्व देती आ रही है एवं नकारा नहीं है। कलीसिया के वे हृदय स्थल रहे हैं। 1500 वर्ष बाद ही इसे नकारने की बात आई।

यह असोचनीय बात है कि ख्रीस्त अपने अनुयायियों से इतनी महत्वपूर्ण बात में पीढ़ियों तक धोखे में रखने के लिए आज्ञा देते।

जबकि कृपा हमारी आत्माओं के लिए दिव्य जीवन है- हमारे शरीर की समस्त क्रियाओं में सातों संस्कारों की तुलना करके हम अच्छी तरह से समझ सकते हैं-

स्नान संस्कार का मतलब है- नए जीवन में जन्म।
दृढ़ीकरण (युवावस्था में बढ़ना) विश्वास में दृढ़ होने की शक्ति प्रदान करता है।
पवित्र परमप्रसाद (आहार की आवश्यकता) आत्मिक भोजन है।
पाप-स्वीकार (जब बीमार या घायल को दवाई की जरूरत होती कि वह ठीक हो जाए) उसी तरह पाप स्वीकार संस्कार आत्मा को पाप से चंगा करता है।
अन्तमलन (अंतिम विलेपन) संस्कार (यह स्वास्थ्य लाभ के समान है) आत्मा को चंगा करने के साथ-साथ, कभी-कभी शरीर भी स्वस्थ हो जाता है।
विवाह संस्कार- रहस्यात्मक शरीर (कलीसिया) के लिए नए सदस्य देता है।
पुरोहिताई- रहस्यात्मक शरीर (कलीसिया) के लिए शिक्षा देने, शासन करने और पवित्र करने के लिए सदस्य देता है।

आशीर्वाद शब्दों और क्रिया में निहित होता है (पवित्र पानी का छिड़काव) जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति या वस्तु ईश्वर की सुरक्षा में सौंपा जाता है।
संस्कारीय- आशीषी वस्तुएँ होती हैं, जैसे मेडल, रोजरी आदि जिन्हें ईश्वर की सुरक्षा में आशीष देकर रखा जाता है।
मेडल और दूसरी पवित्र वस्तुओं को तंत्र-मंत्र जैसे मानना पाप है।

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