'हे प्रभु, तूने हमें अपने लिए बनाया है और हमारे हृदय उस समय तक बेचैन रहेंगे, जब तक वे तुझ में विश्राम नहीं पाते।' (संत अगुस्तीन)
हम क्यों सदा बेचैन रहते हैं? हम इस दुनिया की चीजों से संतुष्ट क्यों नहीं होते? इसका कारण यह है कि हम इस संसार के लिए नहीं बनाए गए हैं। हम ईश्वर के लिए बनाए गए हैं। क्या हम यह नहीं जानते कि ईश्वर ने हमें इस दुनिया में इसलिए बनाया है कि उसे जानें, उसे प्यार करें, उसकी सेवा करें और मरने के बाद स्वर्ग में अनंत सुख के भागीदार बनें? हम उस समय तक तृप्त नहीं होंगे, तब तक हम ईश्वर से संयुक्त नहीं हो जाते हैं।
(संत अगुस्तीन ने इस संसार के समस्त सुखों का उपभोग किया और अधिक जानने के लिए वह प्रत्येक पाप में गिरा और अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि, 'हे प्रभु, तूने हमें अपने लिए बनाया है, और हमारे हृदय उस समय तक बेचैन रहेंगे, जब तक वे तुझमें विश्राम नहीं पाते।')
स्वर्ग पूर्ण एक खुशी का स्थान है। यह खुशी उस एक के साथ पूर्ण संयुक्तता से आती है और वह ईश्वर है। स्वर्ग में हम ईश्वर के जीवन और प्रेम में पूर्णतया भाग लेते हैं।
हम जीवन में परिवर्तन के साथ खुशी को जोड़ते हैं। हम छुट्टियाँ व्यतीत करने जाते हैं, क्योंकि हमें परिवर्तन की जरूरत है, परन्तु ऐसा इसलिए होता है कि जो कुछ बनाया गया है, वह हमारी इच्छाओं एवं अभिलाषाओं को पूर्ण नहीं कर सकता। प्रत्येक खुशी की अपनी सीमा और अपूर्णता होती है। हमारे मन भी हमेशा बदलते रहते हैं, पुराने से बढ़कर नवीनता तलाशते रहते हैं।
परन्तु स्वर्ग में, ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन है और कोई भी अपूर्णता नहीं है। वह असीम सिद्धता है और आत्मा की सभी इच्छाओं को भर देता है। एक बार जब उसके स्वरूप को देखते हैं, तो हम उसके प्रेम और ज्ञान से परिपूर्ण हो जाएँगे।
(फिर भी हम यह नहीं समझ सकते हैं कि स्वर्ग की खुशी क्या है, जिस तरह माता के गर्भ में पड़ा शिशु इस संसार के आश्चर्यों और इसकी सुन्दरता के हमारे वर्णन को समझ नहीं सकता है, जैसे-सूर्योदय और सूर्यास्त का सुन्दर दृश्य, भोजन, संगीत आदि उसके लिए इन सबके वर्णन से क्या लाभ होगा जिसका अस्तित्व और ज्ञान ही सीमित है और इस दुनिया के महिमामय आश्चर्यों का अनुभव ही नहीं किया है।
और तुम्हारे वर्णन के बाद भी, क्या वह शिशु इस नए साहसिक सफर के लिए अपने सुरक्षित वर्तमान वातावरण को छोड़ देगा? शायद ही, लेकिन सौभाग्य से इसके सिवा और कोई विकल्प ही नहीं है और शिशु इस वर्तमान संसार पर आ जाता है। (कभी-कभी विरोध करता है।)
एक बात हम जानते हैं कि स्वर्ग हमारी आशा से बिल्कुल भिन्न होगा।
संत पौलुस इसका बड़े ही सुन्दर शब्दों में वर्णन करते हैं, जिन्हें आँखों ने नहीं देखा और कानों ने नहीं सुना, जो मनुष्य की कल्पना से परे है अर्थात् ऐसे वरदान, जिन्हें ईश्वर ने उनके लिए तैयार किया है जो उसको प्यार करते हैं'। (कुरिंथियों 2:9)
नरक
हमारे प्रभु इसे पूर्णतः स्पष्ट करते हैं कि नरक की सजा सभी दुर्भाग्यों में सबसे बड़ी है। 'उस व्यक्ति के लिए बेहतर होता' उसने कहा, ' यदि वह पैदा ही न होता।' (रोमियों 2:6)
इन दिनों नरक का अनन्त दण्ड बहुत ही अप्रिय है, परन्तु इसके अस्तित्व को अस्वीकार करना सबसे बड़ी मूर्खता है। ईश्वर ने कहा है कि इसका अस्तित्व है और इसे कभी न भूल जाना हमारे लिए अच्छा है। यदि नरक ही न होता तो हमें किससे बचाया जाता, ख्रीस्त हमारे लिए क्रूस पर क्यों मर जाता? यदि इसकी सच्ची वास्तविकता न होती तो वह अपनी शिक्षा में बारम्बार इसका उल्लेख क्यों करता?
उसकी आज्ञा मानने से अस्वीकार करके, इस तरह की गम्भीर चेतावनियों से लापरवाह होकर, हम आस्तव में ईश्वर की सजा के योग्य बनते हैं। इस वास्तविकता को स्मरण करना बेहतर है कि ईश्वर ने हमें स्वर्ग के लिए बनाया। उसने अपने इकलौते पुत्र को हमें बचाने के लिए भेजा।
हमारे लिए उसकी कलीसिया, मिस्सा-बलिदान, संस्कार और प्रार्थनाएँ मुक्ति के साधन की तरह हैं। इसके उपरांत भी यदि मनुष्य जान-बूझकर या गंभीरतापूर्वक अवज्ञा करता है और कभी पश्चाताप नहीं करता है तो क्या वह नरक के योग्य नहीं है? कुछ लोग पूछते हैं कि क्या अनन्त नरक का विचार ईश्वर के न्याय और दयालुता के विरुद्ध नहीं है?
हमें स्मरण रखना चाहिए कि ईश्वर ने मनुष्य को अपने प्रतिरूप और समानता में बनाया। जिसका अर्थ है कि मनुष्य समस्त संसार को सिर्फ वही सृष्टि विवेक (तर्क करने के लिए) और स्वतंत्र इच्छा (चुनाव करने के लिए) से विभूषित किया गया है, इसलिए नरक का विचार उसके न्याय और दयालुता का विरोधी नहीं है।
ईश्वर किसी को भी नरक नहीं भेजता है। वे अपनी स्वतंत्र इच्छा से ईश्वर की आज्ञाओं का पालन नहीं करने और कभी पश्चाताप नहीं करने का स्वतंत्र चुनाव कर जाते हैं।
ईश्वर ने हमें वहाँ जाने से रोकने के लिए बहुत कुछ किया है और हर चीज यथा संभव निरंतर करता है। क्या वह हमारे लिए नहीं मर गया? क्या उसने अपनी अलीसिया अपनी छत्रछाया में हमें नहीं दिया? क्या उसने हमें मिस्सा बलिदान संस्कार और आशीर्वाद एवं कृपा का अविरल स्रोत हमें नहीं दिया?
और उसने यह सब कुछ एक ही उद्देश्य से दिया कि हर आत्मा नरक जाने से बच सके और हमारी स्वतंत्र इच्छा से हमें वंचित किए बिना वह इसके आगे जा नहीं सका। इसके अतिरिक्त, ईश्वर हमारी इस दुनिया के थोड़े से अच्छे कार्यों के लिए हमें स्वर्ग के अनन्त सुख का पुरस्कार प्रदान करता है। उसने प्रतिज्ञा की है और वह हर एक को बचाने के लिए पर्याप्त कृपा देगा।
खो जाने का अर्थ है इन कृपाओं के बावजूद नहीं बचने का चुनाव करना। वे जो नरक जाते हैं, वे इसलिए जाते हैं, क्योंकि उन्होंने सचमुच जान-बूझकर गम्भीर (आत्मामारू)पापों को किया है और जिनके लिए वे क्षमा याचना करने से इनकार करते हैं।
इस दुनिया में हमारा जीवन एक परीक्षा है। मृत्युपरांत कोई दूसरा अवसर नहीं है। यदि हम लोग ईश्वर के प्रेम और अपने पापों के लिए पश्चाताप करके मरते हैं तो उनके लिए स्वर्ग निश्चित है।
यदि हम अपने पापों के लिए बहुत घमंड करके माफी न माँगते हुए ही मरते हैं तो अनन्तकाल के लिए नरक हमारे पापों की क्षमा का स्थान ले लेगी।
नरक में दंडित आत्मा के लिए अपने सृष्टिकर्ता से अलग हो जाएगी। वह हमेशा उससे संयुक्त होने की अतृप्त भूख से तड़पती रहेगी जो कभी तृप्त नहीं हो सकती है। एक ऐसा खालीपन आ जाएगा जो कभी भरा नहीं जा सकता है।
सबसे बड़ी कमी इस संसार में एक व्यक्ति अनुभव करता है वह अपने प्रियजन के बिछ़ुडने की कमी है। उस खालीपन के अनुभव पर गौर करो, बिछुड़न के एकाकीपन का, जब तुम अपने प्रियजन को कब्र में डाले जाते हुए देखते हो।
परन्तु ईश्वर, समस्त प्यार के उद्गम और सृष्टा से बिछुड़न की तुलना में यह नगण्य है। यदि तुम बिना पश्चाताप किए आत्मामारू पाप में मर जाते हो। अपने प्रियजन की मृत्यु के वक्त उसके बिछुड़न का जो दुःख तुम अनुभव करते हो उसे तो समय और यह विचार भर देता है कि तुम अपने प्रियजन से अगले जीवन में फिर मिलोगे, लेकिन ईश्वर से अलग होने का दुःख कभी भी हल्का नहीं हो सकता है।
न्याय के दिन ख्रीस्त उन पश्चातापी पापियों से कहेंगे-' शापितों ! मुझसे दूर हट जाओ। उस अनन्त आग में जाओ जो शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गई है।' (मत्ती 25:41)