Publish Date: Sat, 12 Jan 2008 (16:50 IST)
Updated Date: Wed, 24 Oct 2007 (14:27 IST)
- राजेश पांडेय
कुछ दर्शकों ने मौज-मजे के लिए ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी पर फिकरे कसे हों, पर उसके मूल में रंगभेद की भावना जोर मार रही होगी। भारतीयों के लिए नस्लभेद कोई अनहोनी बात नहीं है।
हजारों साल पुरानी जाति व्यवस्था से बड़ा भेदभाव कुछ और हो सकता है? हमारे यहाँ जातिवाद संस्थागत रूप ले चुका है। यह सामाजिक ताने-बाने में गहरी जड़ें जमा चुका है।
ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम के अश्वेत खिलाड़ी एंड्रयू साइमंड्स के खिलाफ मुंबई और वडोदरा में दर्शकों द्वारा कसी गई फब्तियाँ भारतीयों के एक वर्ग की बीमार मानसिकता का सबूत हैं। दर्शकों ने उन्हें बंदर की आवाज निकालकर चिढ़ाया था। मुंबई पुलिस ने आखिरी वनडे मैच के दौरान कुछ लोगों को गिरफ्तार किया था।
इन घटनाओं से बवाल मचना स्वाभाविक है। ऑस्ट्रेलियाई अखबारों ने साइमंड्स से किए गए दुर्व्यवहार को नस्लभेद की संज्ञा दी है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कॉन्फ्रेंस (आईसीसी) ने भी भारतीय दर्शकों के बर्ताव को गंभीरता से लिया है।
ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो साइमंड्स को चिढ़ाने की घटनाओं को नस्लभेद नहीं मानते हैं। लेकिन, भारतीय मानस का गहराई से विश्लेषण करें तो यह नस्लभेद का एक विकृत चेहरा है। भारतीयों का बहुत बड़ा वर्ग रंग, जाति और धर्म के आधार पर अपनी पसंद-नापसंद तय करता है।
वेस्ट इंडियन और अफ्रीकी मूल के साइमंड्स की कद-काठी लोगों का ध्यान खींचती है। गोरों (एंग्लो सेक्सन नस्ल) के प्रभुत्व के ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में उन्होंने अपने असाधारण खेल से जगह बनाई है। वे भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच सात वनडे मैचों की सीरिज के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रहे। वे शानदार फील्डर और उपयोगी गेंदबाज हैं। उनकी आक्रामक बैटिंग अच्छे-खासे गेंदबाजों के छक्के छुड़ाती है।
सवाल है कि केवल साइमंड्स ही भारतीय दर्शकों का निशाना क्यों बने थे। दर्शकों ने हैडन, पोंटिंग, गिलक्रिस्ट, माइकल क्लार्क वगैरह को क्यों नहीं चिढ़ाया था। क्या तेज गेंदबाज शांताकुमारन श्रीसंथ से उलझने के कारण दर्शकों ने साइमंड्स को आड़े हाथों लिया था।
संभव है कि कुछ दर्शकों ने मौज-मजे के लिए ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी पर फिकरे कसे हों। पर उसके मूल में रंगभेद की भावना जोर मार रही होगी। भारतीयों के लिए नस्लभेद कोई अनहोनी बात नहीं है। हजारों साल पुरानी जाति व्यवस्था से बड़ा भेदभाव कुछ और हो सकता है?
हमारे यहाँ जातिवाद संस्थागत रूप ले चुका है। यह सामाजिक ताने-बाने में गहरी जड़ें जमा चुका है। सवर्णों को श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति हर कहीं दिखाई पड़ती है। दलितों, आदिवासियों को हेय माना जाता है। अधिकतर सवर्णों ने अपने-आपको एक ऊँचे सिंहासन पर आसीन कर रखा है। वे राज करना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। वे दलितों को समृद्धि और अवसरों में भागीदार नहीं बनाना चाहते हैं।
आरक्षण के जरिए उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पाने वाले छात्र अपनी जाति के कारण मानसिक प्रताड़ना और उपेक्षा झेलते हैं। कोटा के दरवाजे से नौकरी पाने वाले प्रतिभाशाली लोग भी वांछित सम्मान व प्रतिष्ठा हासिल नहीं कर पाते हैं। इधर, जातिवाद की जंजीरें थोड़ी ढीली पड़ी हैं। आरक्षण की सुविधा ने दलितों, आदिवासियों को समाज की मुख्यधारा से काफी हद तक जोड़ा है।
सत्ता में इन वर्गों की भागीदारी बढ़ी है। दक्षिण भारत में पहले ही द्रविड़ मुनेत्र कड़घम के आंदोलन ने वंचित वर्गों को सत्ता के गलियारों में जगह दिलाई है। बीते पंद्रह-बीस सालों से उत्तर भारत में भी तस्वीर बदली है। लालू यादव, मुलायमसिंह यादव और मायावती जैसे नेता दलितों, पिछड़ों की आकांक्षाओं के प्रतीक बनकर उभरे हैं।
फिर भी, समाज के बहुत बड़े हिस्से में जातिवादी भावनाओं की अंतरधारा महसूस की जा सकती है। इस भावना की प्रतिध्वनि हमारे रोजमर्रा के व्यवहार में सुनाई देती है। हमारे यहाँ लोगों को धर्म के आधार पर अच्छा-बुरा मानने वालों की कमी नहीं है।
एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों को अपने से हीन समझते हैं। उनमें अलग किस्म की श्रेष्ठता का भाव है। भारत आने वाले अफ्रीकियों की हम खिल्ली उड़ाते हैं। उनके स्याह रंग, घुँघराले बालों और अलग किस्म के नयन-नक्शों का मजाक बनाया जाता है।
भारत में पढ़ने वाले अफ्रीकी छात्र रंगभेद की शिकायत करते हैं। हम अपने बीच रहने वाले काले लोगों को देखकर नाक-भौंह सिकोड़ते हैं। उत्तर और मध्यभारत में दक्षिण भारतीयों का उपहास किया जाता है।
केवल रंग और भाषा अलग होने की वजह से उन्हें पक्षपात का शिकार होना पड़ता है। तो एंड्रयू साइमंड्स को कुछ दर्शकों ने इसलिए चिढ़ाया कि रंग और नस्ल की बुनियाद पर मनुष्यों से भेदभाव की भावना से हम अछूते नहीं हैं।
साइमंड्स को चिढ़ाने की घटनाओं से कुछ अन्य पहलू भी जुड़े हैं। इसके कुछ आयाम चिंताजनक हैं। भारत के क्रिकेट मैदानों में दर्शकों की हुड़दंग बढ़ती जा रही है। क्रिकेट अब पहले जैसा राजसी रफ्तार से चलने वाला खेल नहीं रहा है।
वनडे क्रिकेट ने इस खेल का स्वभाव और चरित्र बदल दिया है। बीस-बीस ओवरों के क्रिकेट ने कार्निवाल समान स्थिति बना दी है। पाँच दिन, एक दिन के बजाय तीन-चार घंटे के भीतर नतीजा आता है।
चौकों-छक्कों की बरसात का स्वागत पश्चिमी नृत्य की धुन पर थिरकने वाले पेशेवर युवक-युवतियों की टोली करती है। जाहिर है, माहौल उत्तेजनापूर्ण रहता है। इन हालात में दर्शकों के आपा खोने की आशंका बनी रहती है। योरप में फुटबॉल मैचों के दौरान दर्शकों द्वारा अशोभनीय व्यवहार करने की घटनाएँ अक्सर होती हैं।
दर्शकों के उपद्रवों के दौरान कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। भारत में ऐसी स्थिति नहीं आई है। लेकिन, दर्शकों के अमर्यादित बर्ताव और हंगामा मचाने की घटनाओं को देखते हुए भारत में भी गंभीर स्थितियाँ पैदा हो सकती हैं। साइमंड्स को चिढ़ाने की घटनाएँ एक अन्य स्तर पर देश की छवि को प्रभावित करती हैं।
इस समय भारत की आर्थिक तरक्की पर पूरी दुनिया की निगाह है। तमाम पश्चिमी देश भारत से मजबूत संबंध बनाने के लिए जी-तोड़ कोशिश में जुटे हैं। उन्हें, इस महादेश का महाशक्ति के रूप में आकार लेना रास नहीं आ रहा है। लिहाजा, इस तरह की घटनाएँ ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका सरीखे देशों में उन लोगों को भारत पर निशाना साधने का मौका देती है, जो खुद रंगभेद और नस्लभेद के हिमायती हैं।
ऑस्ट्रेलियाई अखबारों ने साइमंड्स के मामले को जोर-शोर से उठाया है। वैसे, खुद ऑस्ट्रेलिया में एशियाई, अफ्रीकी मूल के लोगों को भेदभाव से जूझना पड़ता है। भारत, श्रीलंका, वेस्टइंडीज, पाकिस्तान क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों पर वहाँ दर्शक जमकर छींटाकशी करते हैं।
टेस्ट मैचों में सर्वाधिक विकेट लेने का रिकॉर्ड बनाने की दहलीज पर खड़े श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन ने एक बार दर्शकों के उग्र व्यवहार से नाराज होकर ऑस्ट्रेलिया नहीं जाने की घोषणा कर दी थी। मुरलीधरन ऑस्ट्रेलियाई शेन वार्न के 708 टेस्ट विकेटों के शिखर से केवल सात-आठ विकेट दूर हैं।
मुमकिन है कि इस साल के अंत में ऑस्ट्रेलिया जाने वाली भारतीय क्रिकेट टीम को दर्शकों के आक्रामक व्यवहार का सामना करना पड़े। यों भी ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने वनडे सीरिज में श्रीसंथ, हरभजनसिंह के उग्र रवैए की तीखी आलोचना की है।
श्रीसंथ का बर्ताव वाकई आपत्तिजनक रहा है। वे प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी से गाली-गलौज और आँखें दिखाने के मामले में ऑस्ट्रेलियाई, पाकिस्तानी खिलाड़ियों से होड़ करने की कोशिश में जुटे हैं।
यहाँ याद रखना चाहिए कि अति आक्रामकता और उग्र तौर-तरीके ऑस्ट्रेलियाई खेल जीवन का हिस्सा हैं। वहाँ प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों को गाली बकने और व्यंग्य बाण छोड़ने की घटनाएँ आम हैं। प्रतिद्वंद्वी को मानसिक रूप से विचलित करने के लिए इस तरह से हथकंडे अपनाए जाते हैं।
भारतीय परंपरा और संस्कृति में ऑस्ट्रेलियाइयों या योरपियन लोगों जैसी अति आक्रामकता का कोई स्थान नहीं है। शिष्टता, सौम्यता और मान-सम्मान हमारी समृद्ध परंपरा के अंग हैं। व्यवहार में उग्रता, आक्रामकता और असभ्यता दिखाने की बजाय हमें शानदार व आक्रामक खेल से प्रतिद्वंद्वी को निस्तेज करना चाहिए।
तेज रफ्तार से आगे बढ़ते देश को आक्रामक तो होना चाहिए पर वह अपने संस्कारों को कैसे भूल सकता है। हाँ, हम अपने जाति-धर्म के आधार पर भेदभाव के कुसंस्कारों से जरूर पीछा छुड़ाएँ। एंड्रयू साइमंड्स जैसे खिलाड़ियों की सिर्फ इस कारण खिल्ली नहीं उड़ाई जानी चाहिए कि वे अश्वेत हैं, यह वसुधैव कुटुंबकम की भावना के विपरीत है।