- भानु प्रतापसिंह
आईसीसी के जिस किसी भी पदाधिकारी ने सुनील गावसकर को तकनीकी समिति में लेने की वकालत की होगी, वह यकीनन इस समय बैठा अपना सिर धुन रहा होगा, क्योंकि तीन वर्षों में सुनील की खोपड़ी से जो नए आइडिए निकले हैं, उन्होंने वन डे क्रिकेट को गेंदबाजों का कत्लगाह बना दिया है।
और जैसे ये भी काफी नहीं था तो सुनील के उर्वरा मस्तिष्क ने एक और कारनामा कर दिखाया, वह ये कि यदि कोई गेंदबाज नो बॉल फेंकेगा तो उसकी अगली गेंद फ्री हिट के लिए होगी अर्थात भले ही वह गेंद (अगली) नो बॉल नहीं हो और उस पर बल्लेबाज बोल्ड, कैच या एलबीडब्ल्यू हो जाए उसे (गेंदबाज को) विकेट नहीं मिलेगा।
बल्लेबाज रन आउट हो जाए तो ठीक वरना वह जो चाहे सो कर सकता है, यह नियम मान्य भी हो गया है। श्रीलंका के आगामी ऑस्ट्रेलियाई दौरे से प्रभावशील भी हो जाएगा।
सुनील ने ही पहले सुपर सब का प्रयोग किया था जो नाकाम रहा। सवाल यह उठता है कि जिस वन डे क्रिकेट में गेंदबाजों की हालत वैसे ही खराब रहा करती थी, उसे और अधिक दयनीय बनाने की जरूरत क्या हैं? क्यों वन डे क्रिकेट जैसे सीधे-सादे खेल को इतना जटिल बनाया जा रहा है।
सुनील को चैपल के प्रयोगों से खीझ होती थी लेकिन अब वे स्वयं क्या कर रहे हैं? पहले 15 ओवरों के खेल तक दो खिलाड़ी 30 गज के दायरे से बाहर रहते थे, क्या बुराई थी? आज भी रहते हैं, लेकिन सुनील ने 'पॉवर प्ले' लाकर 15 ओवरों को तीन हिस्सों में तोड़ दिया (तकनीकी समिति में हैं ना) जिससे पारी की आक्रामक शुरुआत का प्रवाह थम गया।
अब क्षेत्ररक्षण कर रही टीम का कप्तान पाँच-पाँच ओवरों का पॉवर प्ले किस्तों में ले सकता है। वन डे क्रिकेट को जितना नुकसान डकवर्थ-लुईस पद्धति ने पहुँचाया है, उससे कहीं ज्यादा नुकसान यह नया फ्री हिट वाला नियम पहुँचाएगा। गेंदबाज अब नो बॉल फेंकने के बाद अगली गेंद फेंकने से पहले दस बार सोचेगा कि कहीं उसे चौका या छक्का न पड़ जाए अर्थात गेंदबाज हो गया मनोवैज्ञानिक रूप से त्रस्त और व्यस्त।
सोचिए यदि ऐसा किसी मैच के निर्णायक मौके पर हो गया तो क्या होगा? क्योंकि नियम फ्री हिट के चलते बल्लेबाज तो बेखौफ रहेगा कि वह तो आउट होगा नहीं, वह तो तीनों स्टंप छोड़कर गेंद पर टूट पड़ेगा। आखिर जो खेल पहले से ही बल्लेबाजों के लिए ही बनाया गया है, उसे और क्यों गेंदबाजों के लिए नर्क समान बनाया जा रहा है।
सुनील का स्पष्टीकरण है कि दर्शक वन डे क्रिकेट में चौके-छक्के देखने आते हैं, गेंदबाजों के कारनामे देखने नहीं। तो क्या देखने वालों को शोएब अख्तर, शेन बांड, ब्रेट ली की रफ्तार देखने में आनंद नहीं आता? उसे मुरली, विटोरी, ब्रैड हॉग, पीयूष चावला की फेंकी फिरकियों में मजा नहीं आता? तो अब हमें सुनील से यह पूछना पड़ेगा कि हमें मजा किसमें लेना है?
आज वन डे क्रिकेट में छक्के जिस आसानी से लगते हैं (मिसाल के लिए पिछला विश्व कप) उसने तो छक्कों का रोमांच, छक्कों का मजा खत्म कर दिया है। छोटी सीमा रेखा, छोटे मैदान और फिर यह जानलेवा नियम (फ्री हिट)- वन डे क्रिकेट को दर्शक कबाड़ने के फेर में जिस तरह बलि का बकरा बनाया जा रहा है उसके पीछे यकीनन बाजारवाद है, जो समय-समय पर अपनी काली छाया पहले से ही डालता रहा है। हो सकता है सुनील ने इसी बाजार संस्कृति से ही यह लेटेस्ट आइडिया उठाया हो!