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संविधान दिवस विशेष : संविधान दिवस पर राजनैतिक नेतृत्व सुनिश्चित करें बच्चों का अधिकार

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रोहित श्रीवास्तव

भारत सांस्कृतिक विविधताओं वाला देश है। अनेक सभ्यताओं का साक्षी रहा यह देश विभिन्न धर्मों, पंथों और भाषाओं के लोगों को संजोए हुए है। आखिर ऐसी कौनसी शक्ति है जो भारतवासियों को एक सूत्र में बांधे रखती है। वो शक्ति है भारत के राष्ट्रीय ग्रंथरूपी संविधान की जो भारत के प्रत्येक नागरिक को समान धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता और सुरक्षा प्रदान करता है। किसी भी लोकतांत्रिक देश की व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए संविधान की जरूरत होती है। आज देश उसी संविधान के अस्तित्व में आने के अंतिम पड़ाव को संविधान दिवस के रूप में मना रहा है, 26 नवंबर 1949 के दिन ही देश के संविधान मसौदे को स्वीकृति मिली जिसे 26 जनवरी 1950 को अधिकृत रूप से लागू कर दिया गया था। 
 
देश के संविधान को प्रभावी रूप से अस्तित्व में आए 71 साल हो गए हैं लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सामूहिक रूप से देश उन मूल उद्देश्यों और लक्ष्यों को पाने में सफल रहा है जिसकी प्रत्याशा और परिकल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने की थी? संभवत: नहीं। आज भी देश संविधान की मूल भावना को पूर्ण रूप से धरातल पर साकार करने में अभी भी पीछे है। यह तब ही संभव है जब देश का हर नागरिक संविधान से मिले अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो। 
 
विशेष रूप से बात करें हमारे बच्चों की तो आज भी उनका एक बड़ा वर्ग शोषित और वंचित है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15(3) में राज्य को बच्चों के सशक्तिकरण का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21(ए) 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य मुफ्त शिक्षा सुनिश्चित करता है। ऐसे ही बाल श्रम और पोक्सो जैसे कई कानून हैं जो बच्चों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। वास्तविकता यह है कि ऐसे ही बच्चे हाशिए पर हैं जो संविधान में उल्लेखित अपने अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा कानूनों से अपरिचित हैं और अज्ञानता एवं जागरूकता न होने की वजह से बाल श्रम, बाल विवाह एवं बाल यौन शोषण के कुचक्र में लगातार फंस रहे हैं। 
 
अगर देश को विकास की रफ्तार पकड़नी है तो इन शोषित एवं शिक्षा से दूर बच्चों को सामाजिक न्याय और सुरक्षा के घेरे में लाना ही होगा। इसके लिए जरूरी है कि देश सामूहिक रूप से आत्ममंथन करे कि आखिर ऐसी कौनसी गलतियां हैं जिससे बच्चे मौजूदा सामाजिक ढांचे में अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित रह रहे हैं। इस प्रक्रिया का पहला कदम बच्चों को शिक्षा और अधिकार जागरूकता अभियान से जोड़ने से किया जा सकता है।  
 
गौरतलब है कि इसी उद्देश्य और लक्ष्य के साथ नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी की संस्था कैलाश सत्यार्थी चिल्‍ड्रेन्‍स फाउंडेशन (केएससीएफ) देशभर के 20 राज्‍यों के 410 से अधिक जिलों में सरकार और प्रशासन के साथ मिलकर बच्‍चों के साथ संविधान दिवस मना रही है। केएससीएफ द्वारा बच्चों के संविधान पाठ के इस कार्यक्रम का आयोजन देश की राजधानी दिल्ली से लेकर राज्य के मुख्यालय और जिला स्तर पर आयोजित किया जा रहा है। 
 
जिसमें निजी और सरकारी स्कूल, आंगनबाड़ी और चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशन, तेजस्विनी क्‍लब, विधिक सेवा प्राधिकरण समेत बाल मित्र ग्राम, बाल मित्र मंडल सहित अन्य कई संस्थानों के बच्चे हिस्सा ले रहे हैं। इसमें बड़े पैमाने पर दूरदराज के अति पिछड़े इलाके में रहने वाले बच्चों से लेकर आदिवासी, वंचित और हाशिए के बच्चे भी शामिल होंगे। संस्था द्वारा यह कार्यक्रम पंजाब, हरियाणा, राजस्‍थान, उत्‍तराखंड, बिहार, झारखंड, असम, मध्‍यप्रदेश, महाराष्‍ट्र, हरियाणा, चंडीगढ़, गुजरात, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, दिल्ली और उत्तरप्रदेश में आयोजित किए जा रहे हैं। 
 
केएससीएफ का यह ऐतिहासिक कार्यक्रम बच्चों में संविधान में निहित न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को स्थापित करने और उन्हें उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करने का काम करेगा। साथ ही नई पीढ़ी को इस बात से अवगत कराएगा कि देश की एकता, अखंडता और गरिमा की हर हाल में रक्षा करनी है।
 
2011 की जनगणना के अनुसार देश की कुल आबादी का 40 प्रतिशत बच्चों की आबादी थी। जिसमें आधिकारिक रूप से 1 करोड़ बाल श्रमिक थे, जबकि गैर सरकारी संगठनों ने 5 करोड़ बाल श्रमिक होने का आंकलन किया था। आज देश जब कोरोना काल में आजादी के 75 साल पूरे होने का अमृत महोत्सव मना रहा है, तब ऐसे में यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि देश की आबादी के इस बड़े वर्ग को उनके अधिकारों के प्रति संजीदा बनाएं जिससे वे राष्ट्र के उत्थान में उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हुए अपनी आने वाली पीढ़ियों को सशक्त बना बना सकें। यह इसलिए महत्वपूर्ण है जब कोरोना काल में ट्रैफिकिंग, बाल श्रम और चाइल्ड पोर्नोग्राफी के मामलों में अप्रत्याशित इजाफा हुआ है। 
 
बच्चों के अधिकारों के मामलों में मुखर रहने वाले कैलाश सत्यार्थी समय-समय पर इस पर चिंता जताते हुए सरकारों को आगाह करते रहे हैं। सत्यार्थी का संगठन बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) हो या कैलाश सत्यार्थी चिल्‍ड्रेन्‍स फाउंडेशन (केएससीएफ) दोनों ही चाइल्ड ट्रैफिकिंग, बाल विवाह एवं अन्य बच्चों से जुड़े अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए काम कर रहे हैं। असल रूप से संविधान दिवस मनाने के सही मायने तब होंगे जब देश, देश की सत्ता, सरकार और राजनैतिक नेतृत्व यह सुनिश्चित करें कि बच्चे उनके कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति शिक्षित और जागरूक होकर पूर्ण रूप से स्वतंत्र, स्वस्थ और समृद्ध हों।

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(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)
 
 

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