क्या नरेंद्र मोदी भारत के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं?

कैमरे की आंखें नरेंद्र मोदी के चेहरे से जैसे डिगती नहीं। मंत्रमुग्ध सी उनका पीछा करती रहती हैं, जैसे उनमें कोई चुम्बकीय तत्व हो। नरेंद्र मोदी के कहे गए एक-एक शब्द को मीडिया के मानसरोवर के हंस अहर्निश चुगते रहते हैं। एक एक बात पर बहस, एक एक संकेत पर चर्चा। ऐसा व्यापक प्रभावक्षेत्र, ऐसी अपार लोकप्रियता और इतनी विस्तृत फ़ॉलोइंग वाला कोई और भारतीय नेता निकट-स्मृति में तो नहीं आता। नरेंद्र मोदी की वैश्विक कीर्ति और स्वीकृति ने भी देश में उनकी जनप्रियता के मिथक में और इज़ाफ़ा ही किया है।
 
लेकिन इसके बावजूद क्या यह कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी भारत के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं?
 
वास्तव में, मौजूदा वक़्त के साधनों ने जिस तरह से महज़ तीन डग में दुनिया नाप लेने की विराट-क्षमता हमें दे दी है, उसके परिप्रेक्ष्य में इस तरह का कोई भी सर्वकालिक आकलन करना हमेशा ही दुष्कर लगता है। यह ठीक उसी तरह है, जैसे हम कहें कि "शोले" बॉलीवुड की सबसे बड़ी हिट फ़िल्म है, लेकिन सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्मों की ताज़ा फ़ेहरिस्त में ये कहीं नज़र नहीं आएगी। एक कालखंड के मिथक की तुलना दूसरे से करने पर वैसी ही दिक़्क़तें आती हैं। और हिट फ़िल्मों के मामले में तो फिर भी मुद्रास्फीति के आंकड़ों को जोड़कर एक आकलन किया जा सकता है, लेकिन दो भिन्न कालखंडों में हुए दो विपरीत व्यक्त‍ित्वों की लोकप्रियता की तुलना भला कैसे की जाए?
 
 
यह सोचना ही अजीब लगता है कि अगर आज महात्मा गांधी या जवाहरलाल नेहरू फ़ेसबुक या ट्विटर पर होते तो उनके कितने फ़ॉलोअर्स होते। क्या वे अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए लगातार ऑनलाइन रहते? क्या वे भी "ट्रॉलिंग" के शिकार नहीं होते? और क्या "ट्रॉलिंग" और "इंटरनेट एब्यूसिंग" उनकी लोकप्रियता में और इज़ाफ़ा ही तो नहीं करते? सूचना तकनीक के नए दौर में बदनामी की पूंजी का बड़ा मोल है।
 
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आज नरेंद्र मोदी को ट्विटर पर 1.8 करोड़ लोग फ़ॉलो करते हैं और वे दुनिया की दूसरी सबसे ज़्यादा फ़ॉलो की जाने वाली सियासी शख्स‍ियत हैं। एक मायने में यह हर रोज़ 1.8 करोड़ लोगों को अनेक मर्तबा संबोधित करने की तरह है। जब गांधी या नेहरू किसी सभा को संबोधित किया करते थे तो वहां उन्हें सुनने के लिए चंद हज़ार लोग ही उपस्थित रहते थे। इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के अभाव में उनका "यूनिवर्सल एक्सपोज़र" नहीं हुआ करता था। और ना ही, उस ज़माने के नेता "पर्सनल ब्रांडिंग" के लिए किन्हीं पेशेवर एजेंसियों की सेवाएं ले रहे थे। फिर भी उनकी अथाह लोकप्रियता थी। फ़र्क यही है कि ना केवल उस ज़माने की लोकप्रियता के मानदंड आज से अलग थे और इसीलिए आज के वक़्त से उसकी तुलना करना बेमानी है, बल्कि फ़ॉलोअर्स की संख्या के आधार पर लो‍कप्रियता और प्रभावशीलता के आंकड़े तय कर लेना एक भरम साबित हो सकता है।
 
भारत-विभाजन और गांधी-वध जैसी त्रासदियों के बावजूद पं. जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता भोगी। सत्रह साल देश पर राज किया और मृत्यु के उपरांत ही उनका सिंहासन ख़ाली हो सका। वैसी कोई मिसाल आज के वक़्त में राष्ट्रीय राजनीति में नहीं दिखाई देती है। लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि सन् 1952 के लोकसभा चुनाव से पहले नेहरू अपनी लोकप्रियता को लेकर सशंकित हो उठे थे और अनेक स्वर उनके विरोध में उठ खड़े हुए थे। एक तरफ़ बाबासाहेब आंबेडकर थे, दूसरी तरफ़ श्यामाप्रसाद मुखर्जी, तीसरी तरफ़ सी. राजगोपालाचारी, चौथी तरफ़ राजेंद्र प्रसाद। 1950 में दिवंगत हुए सरदार पटेल से नेहरू के मतभेद तो जगजाहिर हैं। 
 
चुनाव से पहले असुरक्षा की भावना ने नेहरू को इस क़दर घेर लिया था कि वे देशाटन पर निकल पड़े। तब उन्होंने पूरे देश का चक्कर लगाया और गांव-गांव, शहर-शहर में सभाओं को संबोधित किया। आम जनजीवन से जीवंत संपर्क के कारण उनका आत्मविश्वास लौटा और उन्हें इस बात का भी आभास हो गया कि आज उनके क़द का कोई और नेता भारत में नहीं है। जब चुनाव परिणाम आए तो एकतरफ़ा नतीजों ने रहे-सहे संशय को भी दूर कर दिया। पूरे 62 साल बाद 2014 के चुनावों में वैसा ही देशाटन नरेंद्र मोदी ने भी किया था, लेकिन इस बार एक-एक सभा का सजीव प्रसारण टीवी मीडिया पर किया गया और देश का राजनीतिक वातावरण पूरे दो महीनों के लिए नरेंद्र मोदी की "साउंडबाइट्स" से भर गया। नेहरू और मोदी ने इन प्रचार अभियानों के दौरान जिस लोकप्रियता का जीवंत साक्षात किया था, उनके मायने स्वयं उनके लिए क्या थे? क्योंकि मीडिया में तो दोनों के कवरेज में ज़मीन आसमान का अंतर है और नेहरू की 1952 की सभाओं की एक ढंग की यूट्यूब क्ल‍िप तक नहीं मिलती है।
 
लालबहादुर शास्त्री पाकिस्तान से जंग जीतकर चीन से मिली शर्मनाक हार का नैराश्य मिटाने में सफल रहे थे। "जय जवान जय किसान" का नारा लगाने वाला यह ख़ुद किसानों जैसा दिखने वाला प्रधानमंत्री लोगों के दिल में घर कर गया था, लेकिन मृत्यु ने असमय ही उन्हें हमसे छीन लिया। रामचंद्र गुहा ने अपने एक लेख में इस पर मंथन किया है कि अगर लालबहादुर शास्त्री ने नेहरू की तरह 17 साल देश पर राज कर लिया होता तो क्या होता और तब भारतीय राजनीति में कांग्रेस के "प्रथम परिवार" की भूमिका कैसी रही होती। हमारे मौजूदा संदर्भ में हम यह भी पूछ सकते हैं कि तब उनकी लोकप्रियता का आलम क्या होता। यह जानने का अब कोई तरीक़ा नहीं।
 
इंदिरा गांधी "गूंगी गुड़िया" के रूप में प्रधानमंत्री बनी थीं लेकिन 1971 की लड़ाई के बाद "लौह महिला" के रूप में स्थापित हुईं। कांग्रेस की राजनीति में जिस समाजवादी पूर्वग्रह की छाप आज तलक नज़र आती है, वह इंदिरा गांधी की ही देन है। उनका "ग़रीबी हटाओ" का नारा वस्तुत: ग़रीबी के राजनीतिक पूंजी के रूप में दोहन करने की एक युक्त‍ि भी रही है। वंचित तबक़े के बीच इंदिरा की अथाह लोकप्रियता रही। आदिवासियों महिलाओं के बीच जाकर नृत्य करने की उनकी तस्वीरें तब अख़बारों में यदा-कदा छपती रहती थीं।
 
आपातकाल ने इंदिरा की राजनीतिक विरासत को हमेशा के लिए कलंकित कर दिया, लेकिन अगर आपातकाल नहीं होता तो क्या इंदिरा गांधी देश के इतिहास की सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री कहलाने की हक़दार नहीं थीं? 1977 की त्रासदी के बाद जिस तरह से 1980 में देश की जनता ने फिर से उनका राजतिलक किया और उनकी हत्या के बाद सहानुभूति की जैसी लहर में
राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, वह इंदिरा गांधी की लोकप्रियता के मिथक को और पुख़्ता ही करता है।
 
राजीव गांधी एक ताज़ा चेहरा लेकर राजनीति में आए थे। सौम्य छवि, भविष्य पर नज़र, युवा नेतृत्व। 1989 का साल आते-आते राजीव का वह आभामंडल शाहबानो, रामलला और मंडल कमीशन की "त्रिवेणी" में छिन्न-भिन्न हो गया। वीपी सिंह एक ज़माने में शुचिता की राजनीति की कितनी बड़ी उम्मीद थे, जिन्हें वह याद है, वे ही आज इसकी ताईद कर सकते हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रमुग्ध कर देने वाली वक्तृता शैली के नेता थे। विपक्ष में भी लोकप्रिय। किंतु पहले 13 दिन और फिर 13 महीने में प्रधानमंत्री की कुर्सी गंवाकर और फिर गठबंधन सहयोगियों की बैसाखियों के बलबूते पांच साल की वैतरणी पार करने वाले
अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता भाजपा को सत्ता की धुरी के रूप में स्थापित नहीं ही कर सकी थी। और दस साल सरकार चलाने के बावजूद मनमोहन सिंह को कभी किसी ने प्रधानमंत्री माना ही नहीं। लोकप्रियता और मनमोहन सिंह, दो विपरीत ध्रुव थे। उन्होंने तो कभी एक लोकप्रिय चुनाव तक नहीं जीता था।
 
यही कारण है कि आज जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा केंद्र में सत्तासीन है, देश के अनेक राज्य भगवा रंग में रंग गए हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश जैसा राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य भी बहुमत के साथ भाजपा के खाते में है, जब नरेंद्र मोदी नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, जीएसटी जैसे साहसी निर्णय लेने का आत्मविश्वास निरंतर प्रदर्श‍ित कर रहे हैं और विदेशों में भारत की स्वीकार्यता लगातार बढ़ती जा रही है, तो इन तथ्यों ने आज मोदी को लोकप्रियता के उस शिखर पर स्थापित कर दिया है, जहां पर आज तक इससे पहले कोई और भारतीय प्रधानमंत्री कभी पहुंच नहीं सका था। दाग़ उनके दामन पर लगे हैं, लेकिन वर्तमान समय "स्मृतिलोप के व्याकरण" में रचा-बसा है और चंद लिबरलों को छोड़कर कोई भी "2002 की शवसाधना" में यक़ीन नहीं रखता। 
 
जब प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी का नाम प्रस्तावित किया गया तो बहुतों ने कहा था कि इससे राजग टूट जाएगा। वैसा हुआ नहीं, उल्टे मोदी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आए। आज अपने कार्यकाल के तीन साल पूरे करने के बाद उनकी स्थिति सुदृढ़ है और 2019 की विजय-पताका को वे अभी से फहराता देख सकते हैं।

सार्वजनिक विमर्श में ध्रुवीकरण पैदा करने वाले अत्यंत विवादास्पद व्यक्त‍ित्व के बावजूद देश में आज नरेंद्र मोदी के पक्ष में एक "पॉलिटिकल नैरेटिव" जम चुका है और सच्चाई यही है कि आप उन्हें पसंद करें या नापसंद करें, लेकिन मोदी पर बात किए बिना आज आपका काम नहीं चल सकता है। राष्ट्रीय विमर्श को अपने इर्द-गिर्द केंद्रित कर लेने का यह हुनर भी अभूतपूर्व है, नरेंद्र मोदी के नाम के साथ जुड़े अनेक अभूतपूर्वों की तरह।

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