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पनामा पेपर्स और पत्रकारिता का नया आयाम

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अनवर जमाल अशरफ

पिछले पांच साल में विकीलीक्स से लेकर एडवर्ड स्नोडन जैसे कई खुलासे सामने आए हैं। ये अलग बात है कि उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और आरोपियों को कोई फर्क नहीं पड़ा। पनामा पेपर्स के खुलासों के बाद भी यह उम्मीद नहीं लगाई जा सकती है कि दुनिया बदल जाएगी। लेकिन इस ऑपरेशन से पत्रकारिता के दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं– एक तो मीडिया में अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है और दूसरा कि डिजिटल मीडिया ने परंपरागत पत्रकारिता को पीछे छोड़ दिया है।
जर्मनी के म्यूनिख से निकलने वाला अखबार 'ज्यूड डॉयचे साइटुंग' को कोई सालभर पहले गुमनाम सूत्र से इतनी जानकारियां मिलीं, जो उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा। डिजिटल फॉर्म में यह जानकारी देने वाला पहचान नहीं बताना चाहता था। यह बात समझ से परे है कि पनामा की कंपनी का कोई राजदार ये डाटा जर्मन अखबार को क्यों देना चाहता था, पनामा या अमेरिकी अखबार को क्यों नहीं। तार सिर्फ इतना जुड़ता है कि विवादित कंपनी मोसाक फॉन्सेका शुरू करने वाले युर्गेन मोसाक प्रवासी जर्मन हैं, जिनके पिता हिटलर की सेना में काम कर चुके थे और जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए में काम करने के लिए पनामा चले गए।
 
अंतरराष्ट्रीय सहयोग : बहरहाल, अगर पनामा पेपर्स की जानकारियां 'ज्यूड डॉयचे साइटुंग' साझा करने की जगह अपने पास ही रखकर जांच करता, तो क्या वह यह खुलासा नहीं कर सकता था। शायद नहीं। क्योंकि भ्रष्टाचार का यह मामला वैश्विक है। विशाल डाटा की जांच कई देशों में की जानी थी। दुनियाभर में फैली फर्जी कंपनियों का पता लगाना था, अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग कानूनों को समझने की जरूरत थी। यही वजह थी कि 'ज्यूड डॉयचे साइटुंग' ने अपने सिर पर कामयाबी का सेहरा बांधने की जगह अंतरराष्ट्रीय खोजी पत्रकारों के संगठन आईसीआईजे के साथ मिलकर इसे करने का फैसला किया।
 
आईसीआईजे की रिपोर्ट तैयार करने में 76 से ज्यादा देशों के 107 मीडिया संस्थानों ने हिस्सा लिया। जांच-पड़ताल के लिए 25 भाषाओं का सहारा लिया गया। इसके बाद जो खुलासा सामने आया है, उसने अमिताभ बच्चन से लेकर जैकी चेन और व्लादिमीर पुतिन से लेकर लायोनल मेसी तक को एक ही प्लेटफॉर्म पर खड़ा कर दिया।
 
मीडिया में भरोसा : दुनियाभर के इन सैकड़ों पत्रकारों को बधाई मिलनी चाहिए कि उन्होंने सालभर तक ये डाटा अपने पास संजोकर रखा और इस पर रिसर्च करते रहे। इस दौरान उन्होंने अपना मुंह बंद रखा। वक्त से पहले इस लीक के लीक हो जाने से सारा खेल खराब हो सकता था।
 
पनामा पेपर्स से पत्रकारिता के प्रति लोगों का भरोसा भी बढ़ा है। पिछले एक दशक में सोशल मीडिया ने परंपरागत मीडिया को हाशिए पर खड़ा कर दिया है। यह एक खुला रहस्य है कि रिपोर्टिंग की जगह कॉपी पेस्ट पत्रकारिता चल रही है। यह सिर्फ भारतीय मीडिया में नहीं, पूरी दुनिया में हो रहा है। एजेंसियों या फेसबुक टि्वटर के बयानों से खबरें तैयार होती हैं, जिनमें कुछ नयापन नहीं, कुछ रिसर्च नहीं। पनामा पेपर्स ने कुछ नया, कुछ मूल और कुछ शानदार करके दिया है, जिससे मीडिया की साख मजबूत होती है। यह युवा पत्रकारों को अपनी रिपोर्टिंग, रिसर्च के लिए भी प्रोत्साहित करता है।
 
डिजिटल पत्रकारिता : इस खुलासे में पिछले 40 साल के दस्तावेज सामने आए हैं। यह वही दौर है, जब कंप्यूटर और डिजिटल दुनिया तेजी से फैली है और इंटरनेट पर आने वाली हर चीज कहीं न कहीं डिजिटल फॉर्म में सुरक्षित हो गई है। इसने रिकॉर्डों को सर्च करने और उनके एलगोरिदम तैयार करने के भी नए विकल्प दिए हैं। लेकिन इस बदलाव ने परंपरागत मीडिया के स्वरूप को भी बदला है। पनामा लीक तैयार करने में भी पत्रकारों से ज्यादा उन लोगों की जरूरत पड़ी, जो टेक्नोलॉजी समझते हैं, इंटरनेट प्रोटोकॉल को पढ़ सकते हैं और जिन्हें तकनीक की बारीकी पता है।
 
साल 2011 में ब्रिटिश वर्जीनिया की संदलवुड कंपनी ने साइप्रस की एक कंपनी को 20 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया। इसके अगले दिन संदलवुड ने इस कर्ज की उगाही का अधिकार ब्रिटिश वर्जीनिया की ही दूसरी कंपनी ओव फाइनांशियल कॉर्प को दो दिया। उसी दिन ओव ने अपने कर्जों की उगाही का अधिकार पनामा की रहस्यमयी कंपनी इंटरनेशनल मीडिया ओवरसीज को दे दिया। चौबीस घंटे के अंदर 20 करोड़ की राशि तीन देशों और चार कंपनियों से होते हुए उड़नछू हो गई। आईसीआईजे का दावा है कि ये पैसे रूसी राष्ट्रपति पुतिन के थे। इंटरनेट पर फर्जी ही सही, अगर इन कंपनियों की जानकारी नहीं होती, तो शायद यह खुलासा भी नहीं हो सकता था।
 
नहीं छिपा है कुछ भी : दो लाख 14 हजार लेटरबॉक्स (टैक्स बचाने के लिए तैयार की गई) कंपनियों के सवा करोड़ दस्तावेजों में ईमेल से लेकर आर्थिक बहीखाते और पासपोर्ट से लेकर बैंक खातों तक की जानकारी है। इस खुलासे के लिए तो ये जानकारियां मददगार साबित हुईं लेकिन इससे यह बात भी साबित होती है कि इस युग में अब कुछ भी छिपाकर नहीं रखा जा सकता और डाटा सुरक्षा के जो दावे किए जाते रहे हैं, उनका कोई महत्व नहीं।
 
फिलहाल मीडिया इन करोड़ों दस्तावेजों की तह तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है। इस रिपोर्ट की कई रिपोर्टें बन रही हैं। आरोपों में फंसे नेता इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं। आइसलैंड की जनता अपने आरोपी प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगने निकल चुकी है। लेकिन यह बात साफ है कि पनामा पेपर्स के तौर पर पत्रकारिता ने एक विशाल उपलब्धि हासिल की है और इसका असर काफी देर तक देखने को मिलेगा।

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