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पं. जवाहरलाल नेहरू की सलाह पर जारी हुआ था अनुच्छेद 35A, सरदार पटेल ने किया था मना

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, सोमवार, 6 अगस्त 2018 (14:31 IST)
जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले आर्टिकल 35A की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई टल गई। अलगाववादी नेता और दूसरी पार्टियां इसे लेकर कश्मीर में प्रदर्शन कर रहे हैं।  उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती की पार्टी इस मुद्दे पर एक साथ खड़ी नजर आ रही हैं। कांग्रेस भी इस 35A याचिका का विरोध कर रही है। आखिर जानिए अनुच्छेद 35A का इतिहास।
 
संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत ही अनुच्छेद 35A को जोड़ा गया था। इस अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता है। 14 मई 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा एक आदेश पारित कर संविधान में इस अनुच्छेद को जोड़ा गया था। यह आदेश तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट की सलाह पर जारी हुआ था। संसद को बताए बिना 35ए को ऐसे आदेश के जरिए संविधान में जोड़ दिया गया। बताया जाता है कि इससे दो साल पहले 1952 में नेहरू और शेख अब्दुल्ला का दिल्ली समझौता हुआ था।
 
इस समझौते के तहत भारतीय नागरिकता जम्मू-कश्मीर राज्य के विषयों में लागू करने की बात कही गई थी। अनुच्छेद 35A को खासतौर पर कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिखाने के लिए लाया गया था। इस अनुच्छेद के विरोधियों की दलील यह थी कि यह राष्ट्रपति आदेश है जिसे खत्म होना चाहिए, क्योंकि इस पर संसद में कोई चर्चा और बहस नहीं हुई। संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत ही जोड़ा गया था अनुच्छेद 35A को। इस अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता है।  
 
सरदार वल्लभभाई पटेल की बात नहीं मानने का नतीजा : कश्मीर मामले पर सरदार वल्लभ भाई पटेल की कोई बात नहीं मानी गई। 1947 में जब पाकिस्तान ने अपने सैनिकों व कबाइलियों के साथ हमला किया तो तब कश्मीर रियासत के राजा हरिसिंह भारत में विलय के लिए पूर्णत: स्वायत्तशासी अलग राज्य बनाने की मांग पर राजी हुए। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना और कबाइलियों को ठिकाने लगा दिया था, तभी प्रधानमंत्री नेहरू ने एकतरफा युद्धविराम घोषित कर दिया और कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र में ले गए और बाद में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35A बनाने से कश्मीर समस्या का अंतरराष्ट्रीय करण हो गया। 
 
क्या है धारा 370 : अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू और कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता है। इस धारा के कारण जम्मू कश्मीर में अलग झंडा और अलग संविधान चलता है। इसके कारण कश्मीर में विधानसभा का कार्यकाल 6 साल का होता है, जबकि अन्य राज्यों में 5 साल का होता है। इसके कारण जम्मू-कश्मीर को लेकर कानून बनाने के अधिकार भारतीय संसद के पास बहुत सीमित हैं। संसद में पास कानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होते जैसे ना शिक्षा का अधिकार, ना सूचना का अधिकार। ना तो आरक्षण मिलता है, न ही न्यूनतम वेतन का कानून लागू होता है। जम्मू-कश्मीर का अलग झंडा है। वित्तीय आपातकाल लगाने वाली धारा 360 भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती। 
 
कश्मीरियों को अनुच्छेद 35 ए में अधिकार : अनुच्छेद 35A से जम्मू-कश्मीर को यह अधिकार मिला है कि वह किसे अपना स्थायी निवासी माने और किसे नहीं। जम्मू कश्मीर सरकार उन लोगों को स्थाई निवासी मानती है, जो 14 मई 1954 के पहले कश्मीर में बसे थे। ऐसे स्थाई निवासियों को जमीन खरीदने, रोजगार पाने और सरकारी योजनाओं में विशेष अधिकार मिले है। देश के किसी दूसरे राज्य का निवासी जम्मू-कश्मीर में जाकर स्थाई निवासी के तौर पर नहीं बस सकता। दूसरे राज्यों का निवासी न कश्मीर में जमीन खरीद सकता है, न राज्य सरकार उसे नौकरी दे सकती है। अगर जम्मू-कश्मीर की कोई महिला भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी कर ले तो उसके अधिकार छीन लिए जाते हैं।
 
फारुक अब्दुल्ला के बेटे उमर अब्दुल्ला ने दूसरे राज्य की महिला से शादी की है, लेकिन उनके बच्चों को राज्य के सारे अधिकार हासिल हैं , जबकि उनकी बहन सारा अब्दुल्ला राज्य से बाहर के व्यक्ति से विवाह करने के बाद संपत्ति के अधिकार से वंचित कर दी गई हैं।
 
पश्चिमी पाक के शरणार्थियों की परेशानी
- विभाजन के समय पश्चिमी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में शरणार्थी जम्मू-कश्मीर आए जिनमें वाल्मीकि, गोरखा जैसे समुदायों के थे। ये वहां रहे, लेकिन इनकी चौथी पीढ़ी तक को स्थायी नागरिक के अधिकार नहीं मिले। 
- कई वर्षों से जम्मू-कश्मीर में रह रहे गैरस्थायी नागरिक लोकसभा में चुनाव में वोट दे सकते हैं, परंतु जम्मू-कश्मीर चुनावों में नहीं दे सकते हैं। 
- गैरस्थायी नागरिकों को वहां के सरकारी शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश और वजीफे का अधिकार नहीं।

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