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सत्ता के खिलाफ सच कहने का साहस!

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जयदीप कर्णिक

इंसान पहले बंदर था। ...रहा होगा। उसकी इवॉल्युशनरी कवायद में जाने का कोई भी इरादा यहां नहीं है। कोशिश सिर्फ यह समझने की है कि पेड़ों पर झूलते बंदर और जमीन पर चलते इंसान में अब क्या अंतर है? ...शायद यह कि इंसान धरती पर सीधा चल पाता है? अपनी रीढ़ को सीधा रखकर। बंदर से इंसान बनने के सफर में रीढ़ का सीधा हो जाना एक महत्वपूर्ण घटना है। ...उसको सीधा रख पाना उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण पराक्रम है। जमीन पर सीधे चलते दिखने वाले लोग अपनी रीढ़ को कितना सीधा रख पाते हैं, उनके इंसान बने रह पाने का असली पैमाना तो यही है। अफसोस यही है कि रीढ़ का सीधापन अब पाषाण हो चला है। जो लोग इसे इन परिस्थितियों में भी सीधा रख पा रहे हैं, वे मानवता के जीवाश्म बनकर इंसानी सभ्यता के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

 
विश्वप्रसिद्ध टाइम पत्रिका ने अपने मुखपृष्ठ पर तीन महिलाओं का चित्र प्रकाशित कर उन्हें वर्ष 2002 के व्यक्तित्व के रूप में सुशोभित किया था। तीन महिलाएं, जिन्होंने अपनी रीढ़ को सीधा रखने का साहस दिखाया। उन्होंने साहस किया सत्ता के खिलाफ सच कहने का। ...व्यवस्था से समझौता कर उसका अंग बन जाने से इंकार करने का साहस। सुविधाभोगी हो जाने से मुकर जाने का साहस। असत्य की अट्टालिकाओं पर सत्य का परचम फहरा देने का साहस। तनख्वाह के एवज में गुलाम नहीं हो जाने का साहस। ...अपने जमीर से आंख मिलाकर बात कर पाने का साहस।
 
सिंथिया कूपर, कॉलीन रावली और शेरॉन वॉ‍टकिंस, ये नाम हैं उन तीन महिलाओं के जो टाइम पत्रिका के मुखपृष्ठ पर मानवता की अच्छाइयों के प्रकाश-स्तंभ के रूप में विराजमान हैं। तीनों ही ने अपनी-अपनी संस्थाओं में चल रही गड़बड़ियों को उजागर किया, परिणाम की परवाह किए बगैर। उनका साहस बड़ा था या छोटा, इसकी तुलना किए बगैर उन्हें दाद इस बात के लिए मिल रही है कि उन्होंने संस्था और अपनी नौकरी से ऊपर समाज-हित को रखा। अपनी नौकरी, अपनी जिंदगी, अपनी कार, अपना... अपना और अपना के संकुचित होते जा रहे सोच से बाहर निकलकर इस बात की चिंता की कि गलत धारणाएं, गलत उदाहरण, गलत व्यवस्थाएं इस समाज के आदर्श न बन जाएं। 

सिंथिया कूपर : अमेरिका की नामी कंपनी वर्ल्डकॉम में आंतरिक ऑडिट (अंकेक्षण) का कार्य उनके जिम्मे रहा। उन्होंने कंपनी द्वारा विभिन्न मदों में किए जा रहे खर्चों पर प्रश्नचिह्न लगाए। कंपनी के संस्थापक बर्नी एब्बर और मुख्य वित्त अधिकारी स्कॉट सुलिवन की तमाम नाराजगी और सहकर्मियों की उपेक्षा झेलते हुए उन्होंने सच कहना जारी रखा। अब वे लोग सिंथिया की उपेक्षा की सजा झेल रहे हैं। सिंथिया की चेतावनी के कुछ महीनों बाद ही कंपनी के उसे हुए 3-8 बिलियन डॉलर के घाटे की घोषणा की। स्कॉट सुलिवन और बर्नी एब्बर सहित कंपनी के कुछ प्रमुख पदाधिकारी मुकदमे का सामना कर रहे हैं, कइयों को हथकड़ी सहित सींखचों के पीछे डाल दिया गया है। तब इन्हीं लोगों ने सिंथिया को हाशिए पर खड़ा कर दिया था, आज वे हाशिए पर हैं। सिंथिया ने कोई बदला-वदला नहीं लिया, वे तो केवल सच के साथ रहीं। अब नवगठित वर्ल्डकॉम में 38 वर्षीय सिंथिया कूपर आंतरिक अंकेक्षण विभाग में उपाध्यक्ष पद पर कार्यरत हैं और उनके पास पहले से दुगुना स्टाफ है।

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सिंथिया फिर भी सौभाग्यशाली हैं कि उनका संघर्ष सकारात्मक मुकाम पर जाकर थमा। ऐसा सभी के साथ हो जरूरी भी नहीं, और ऐसा होता भी नहीं। जैसा कि हमको कॉलीन रावली के उदाहरण से समझ में आता है। अमेरिका के खुफिया विभाग एफबीआई की इस 48 वर्षीय महिला अधिकारी ने अपने विभाग की गड़बड़ियों को उजागर करने का दुस्साहस दिखाया। उन्होंने 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर हुए भयावह आतंकवादी हमलों के संदर्भ में विभाग द्वारा बरती गई असावधानियों को उजागर किया। उन्होंने एफबीआई के निदेशक रॉबर्ट मूलर को लिखे 13 पृष्ठीय पत्र में यह उजागर किया कि किस तरह उनके दफ्तर द्वारा 11 सितंबर के एक मुख्य अभियुक्त के बारे में दी गई चेतावनियों को मुख्यालय ने नजरअंदाज कर दिया। रावली के दफ्तर ने जकारिया मोसोई नामक अभियुक्त की गतिविधियों पर संदेह जा‍हिर किया था और उसकी गहरी पड़ताल के आदेश चाहे थे। उस वक्त वह हवाई जहाज उड़ाने का प्रशिक्षण ले रहा था। इस पत्र के बाद तो जैसे पूरे अमेरिकी तंत्र में ही हड़कंप मच गया।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कॉलीन पहले यह सब मौखिक रूप से बयान करना चाहती थी, पर उन्हें बहुत कुछ कहना था। इसके लिए उन्होंने उस सबको व्यवस्‍थित सिलसिलेवार रूप से लिख लेना ही उचित समझा। लिखने के बाद भी उनकी मंशा इस पत्र को केवल एफबीआई निदेशक तक पहुंचाने की ही थी। पर वह पत्र लीक हो गया और कॉलीन अखबारों के मुखपृष्ठ पर आ गईं। उन्होंने खुद ऐसा न तब चाहा था और न अब। अभी वे सच कहने की, अपनी रीढ़ को सीधा रखने की कीमत चुकाने में लगी हुई हैं। एफबीआई के आला अधिकारी उनकी लगातार उपेक्षा कर रहे हैं और उन्हें शाबाशी देने की बजाए उन्हें गुनाहगार साबित करने का प्रयत्न किया जा रहा है। ...ये दीगर बात है कि कॉलीन के दफ्तर के अनुरोध को मानकर जकारिया मोसोई की पड़ताल किए जाने पर जुड़वां इमारतों को ध्वस्त होने से रोका जा सकता था या नहीं, पर कॉलीन की आवाज को उस वक्त नजरअंदाज करना और अब दबाया जाना व्यवस्था की कलई खोलकर रख देता है। 
 
सच कहने का साहस करने वाली एक और दुस्साहसी महिला का नाम है- शेरॉन वॉटकिंस। वे भारत में भी बहुचर्चित एनरॉन कंपनी के न्यूयॉर्क स्थित मुख्यालय में उपाध्यक्ष के पद पर कार्यरत थीं। मात्र 13 वर्ष की उम्र में अपने प्राचार्य तक से पंगा मोल लेकर सच कहने का साहस दिखाने वाली वॉटकिंस ने सत्य को सीधा कह पाने की ताकत को अपनी जीवनशैली का अंग ही बना लिया। इसीलिए तो एनरॉन में जारी आर्थिक अनियमितताओं ने उन्हें बेचैन कर दिया। कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेफरी स्किलिंग की कार्यप्रणाली उन्हें संदेहास्पद और दोषपूर्ण नजर आई। उन्होंने बहुत हिम्मत के साथ अपनी बात कंपनी के चेयरमैन केन ले तक पहुंचाई। कुछ अनसुनी होने के बाद भी उन्होंने अपनी बात कहना जारी रखा। जब कंपनी डूबने के कगार पर आई, तब इस बात का एहसास किया गया कि शेरॉन वॉटकिंस सही कर रही है। ...पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। शेरॉन को और भी बड़ा झटका यह जानकर लगा कि उनके सच के एवज में उन्हें निकाले जाने की तैयारी की जा रही थी!! उस संस्‍था ने उनके साथ ऐसा बर्ताव किया जिसे उन्होंने बहुत प्यार किया था। उन्होंने तो संस्‍था का भला ही करना चाहा था। उनके पति रिकी ने परिवार को अधिक समय देने के लिए नौकरी छोड़ दी थी। अब शेरॉन के पास नौकरी नहीं है। रिकी और शेरॉन की तीन वर्षीय सुपुत्री है- सेरियन। अपनी दूसरी संतान की ख्‍वाहिश को उन्हें इसलिए दबाना पड़ रहा है, क्योंकि घर की आर्थिक स्‍थिति ठीक नहीं है।
 
...शेरॉन के दफ्तर में सभी को दफ्तर की ओर से एक नोटबुक दी गई थी। इस नोटबुक पर मार्टिन लूथर किंग जूनियर की लिखी पंक्तियां छपी थीं- ' हमारा जीवन उस दिन से समाप्त होना शुरू हो जाता है जिस दिन हम उन मुद्दों को लेकर चुप्पी साध लेते हैं, जो मायने रखते हों।' .. अफसोस की एनरॉन में शेरॉन के अलावा सभी चुप रहे।
 
सिंथिया कूपर, कॉवली रावली और शेरॉन वॉटकिंस का यह मामला अब अपने दफ्तर की अनियमितताओं को उजागर कर देने के मामले नहीं हैं। ये मामले हैं पूरे सभ्य समाज की शुचिता के। ये मुद्दा है इंसानी कौम के दिशा-निर्धारण का। बात पाश्चात्य या पूर्व संस्कृति की नहीं है... बात समूची मानव संस्कृति की है। वहां भी यौन दुराचार के लिए बिल क्लिंटन तक को कटघरे में खड़ा होना पड़ता है। आज अगर वही पाश्चात्य समाज इन तीन महिलाओं की ताजपोशी कर रहा है, तो दरअसल वह मानव समाज के प्रकाश स्तंभ में एक बाती और जोड़ रहा है। ये वह प्रकाश स्तंभ है, जो मानव सभ्यता को बताएगा कि उसे किस राह पर चलना चाहिए। इसकी बातियां सैकड़ों सिंथिया कूपर से बनी हैं और राम, कृष्ण, सुकरात, ईसा मसीह और स्वामी विवेकानंद की आहुतियों से इसको रोशन करने वाला तेल बना है।
 
अहम मुद्दा यह है कि जब बड़ा हित सामने हो तो छोटे हित की कीमत पर भी उसे उजागर करना ही पड़ेगा। विभीषण या ता-कायनात 'घर का भेदी लंका ढाए' की तोहमत सहकर भी मानव समाज के लिए राम की जीत सुनिश्चित कर गया। विभीषण ने जो सहा होगा उसका रंचमात्र भी एहसास कर पाना मुश्किल है पर उसने साहस किया राम के साथ, सत्य के साथ खड़े रहने का। लंका जो है उसे तो ढहना ही है, क्योंकि सोने की होने के बाद भी वह लंका है। वहां रावण का राज है। बुराई का राज है। या तो आप शुरू से ही रामत्व को अंगीकार किए रहो, राम की, सत्य की तरफ रहो या फिर दुर्भाग्य से लंका में जा भी पहुंचे तो वि‍भीषण का साहस (तमाम लानतें सहकर भी) दिखाना ही होगा। वर्ना अगर यह एहसास लंका के साथ जलते हुए हुआ तो बहुत देर हो चुकी होगी। कृष्ण किसी अर्जुन या पांडवों के साथ नहीं थे। के केवल सच्चाई के साथ थे। वे प्रकाश स्तंभ की दिशा जानते थे।
 
पहले रोशनी का साम्राज्य था। आज के घटाटोप में इंसानी पवित्रता का एक दीप भी जलता है तो वह बहुत दूर से दिखाई पड़ता है, रोशनी देता है। भरत शाह मामले में सब गवाह मुकर गए, केवल एक प्रीति जिंटा को छोड़कर। वे इस मुकदमे के मुकाम तक सच पर कायम रहती हैं, तो वे भी इस दीये को और रोशन करेंगी। इसकी बाती जलती रहे, इसमें तेल पड़ता रहे, यह बहुत कष्टसाध्य लेकिन जरूरी कार्य है। ऐसा नहीं हुआ तो लड़खड़ाना शुरू कर चुका मानव समाज त्राहि-त्राहि कर उठेगा। लोग टकरा-टकराकर गिर पड़ेंगे। कोई राह नहीं सूझेगी।
 
... जो रीढ़ें झुक चुकी हैं, बिक चुकी हैं वे सभ्यता के ताबूत की कीलें हैं। सभ्यता इस ताबूत को देखकर घबरा रही है। वह अभी मरना नहीं चाहती...। रीढ़ सीधी रखने की कीमत चुकानी पड़ती है, कई बार बहुत बड़ी कीमत। पर फिर भी रीढ़ सीधी रखनी ही होगी। जो लोग इस संघर्ष में लगे हैं, वे जानते हैं कि सच और साहस है जिसके मन में, अंत में जीत उसी की है।
 
तीनों में क्या है समानताएं 

तीनों में क्या है समानताएं 
 
शेरॉन वॉटकिंस, कॉवली रावली और सिंथिया कूपर ने अलग-अलग परिस्‍थितियों में अपनी-अपनी संस्थाओं में हो रही अनियमितताओं को उजागर किया। इसके बाद भी तीनों में आश्चर्यजनक रूप से समानताएं हैं। तीनों ही मध्यमवर्गीय परिवार में पली-बढ़ीं (आजकल संस्कार शायद बस वहीं पलते-बढ़ते हैं।) तीनों ने ही अपने बाल्यकाल से ही संघर्ष किया। किशोरवय में अपने खर्च स्वयं चलाकर पढ़ाई की। सच कहना, भरपूर मेहनत करना और ठानी हुई बात को पूरा करना इन्होंने बचपन से ही सीख लिया। तीनों ही अपने परिवार की प्रमुख आय प्राप्तकर्ता थीं। कूपर तथा रावली तो अपने परिवार की एकमात्र जीविका चलाने वाली सदस्या थीं। रोजी-रोटी और परिवार की चिंता उन्हें दूसरों से कम नहीं, ज्यादा ही थी। फिर भी उन्होंने सच कहना का साहस किया।

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एक बात और थी, जो तीनों में समान थी- जब उन्होंने साहस के साथ सच कहा तो उनके दफ्तर के सहकर्मी जिन्हें वे बहुत अपना मानती थीं, उन्होंने स्वयं को इस मामले से बिलकुल अलग कर लिया। उन्होंने कहा कि ये तुम्हारी लड़ाई है, तुम जानो। हर वो पायदान जिस पर पैर रखकर वे अपनी बात मजबूती से कहना चाहती थीं, वह पोली नजर आई। ...पर उन्होंने अपने जमीर को मजबूत बनाए रखा।
 
जब ऐसा होता है तो मन के कोने से कहीं किरच जाता है। दिल धसक जाता है। इंसान थोड़ा बिखर जाता है। ...पर इस बिखराव के बाद जब वह जुड़ता है तो वह पहले से कहीं ज्यादा मजबूत होता है। दिल और दिमाग का सही 'कम्पोजिशन' बिखराव के बाद के नए 'कॉम्बिनेशन' से उपजता है। ये मनुष्य की परिपक्वता, स्थायित्व और आवश्यक जीवट प्रदान करता है। दरअसल, ऐसे समय बिखराव और जुड़ाव की प्रक्रिया साथ-साथ चलती रहती है। आदमी अलग होता है भ्रम से, दिखावे से, मृग मरीचिका से। ...और जुड़ता है अपने आप से, अपने स्व से- अतींद्रिय सच से, सकारात्मक ऊर्जा से। इसीलिए तो अकेला खड़े रहने पर भी सच में इतनी ताकत होती है कि वह अपनी शक्ति और अपने अस्ति‍त्व को मनवा ले। 

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