देश का अगला प्रधानमंत्री कौन हो और मौजूदा समय में सबसे बड़ी चुनौती क्या है, परमाणु करार को क्या लोग देशहित में मानते हैं और संप्रग सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि और असफलता क्या है, ऐसे कई सवालों को लेकर नईदुनिया-सी फोर के एक संयुक्त जनमत सर्वेक्षण में लोगों की राय ली गई, जिसके मुताबिक इस समय भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी अगले प्रधानमंत्री पद के लिए पहली पसंद हैं और राहुल गाँधी को लोग आडवाणी के बाद सर्वाधिक ऊर्जावान और भविष्य निर्माता नेता के रूप में देखते हैं।
लेकिन भाजपा और संघ परिवार के हिन्दुत्व और विकास के रोल मॉडल नरेंद्र मोदी का नंबर पाँचवाँ है। वे मायावती, मनमोहनसिंह और सोनिया गाँधी से पीछे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह का नंबर इस दौड़ में तीसरा है। आडवाणी के बाद दूसरा नंबर मायावती का है। यह सर्वेक्षण साप्ताहिक पत्रिका 'संडे नईदुनिया' के 12 अक्टूबर के अंक में प्रकाशित किया गया है। 1 से 6 अक्टूबर के बीच देश के 11 शहरों में किए गए इस सेम्पल सर्वे में 2026 लोगों को शामिल किया गया।
सरकार विफल
सर्वेक्षण के मुताबिक देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती आतंकवाद है और गृहमंत्री शिवराज पाटिल को इस्तीफा दे देना चाहिए। महँगाई का नंबर इसके बाद है। संप्रग सरकार को बहुसंख्यक लोगों ने आतंकवाद और महँगाई के मोर्चे पर असफल माना है। यह मानते हुए भी कि महँगाई पर अंकुश न लगा पाना संप्रग सरकार की सबसे बड़ी असफलता है, बहुसंख्यक लोगों ने आर्थिक मोर्चे और महँगाई को काबू करने के मामले में सबसे ज्यादा राय डॉ. मनमोहनसिंह के पक्ष में दी है।
हिन्दूवादी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में
कांग्रेस महासचिव और नेहरू-गाँधी परिवार के राजनीतिक वारिस राहुल गाँधी ने यह कहकर कि प्रधानमंत्री बनने का विकल्प उनके सामने खुला हुआ है, देश में अगला प्रधानमंत्री कौन हो, इस बहस की शुरुआत कर दी है। हालाँकि बाद में कांग्रेस ने दोहराया कि वह अगला लोकसभा चुनाव प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की ही अगुआई में लड़ेगी, उधर खुद मनमोहनसिंह ने कह दिया है कि पार्टी और देश में उनसे भी योग्य कई लोग मौजूद हैं जो प्रधानमंत्री बन सकते हैं।
इसके पहले अर्जुनसिंह, शरद पवार, लालूप्रसाद यादव जैसे यूपीए नेता भी अगले प्रधानमंत्री के लिए राहुल और मनमोहन के नाम पर अपनी-अपनी राय जाहिर कर चुके हैं। जहाँ कांग्रेस और यूपीए में प्रधानमंत्री के सवाल पर मंथन है, वहीं भाजपा और एनडीए में कोई दुविधा नहीं है। वहाँ लालकृष्ण आडवाणी को सर्वसम्मति से अगले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जा चुका है। हालाँकि संघ परिवार और हिंदुत्ववादी खेमे का एक बड़ा वर्ग आडवाणी से ज्यादा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहता है।
उत्तरप्रदेश में पहली बार पूर्ण बहुमत लाकर चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं मायावती की नजर भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है। यूपीए सरकार के विश्वास मत पर दिल्ली में हुई राजनीतिक जोड़-तोड़ के दौर में वाम दलों और तथाकथित तीसरे मोर्चे के घटक दलों तेलुगुदेशम आदि ने भी मायावती को अगला प्रधानमंत्री बनाने की तैयारी कर ली थी।
तब से माया की महत्वाकांक्षाएँ भी हिलोरें मार रही हैं और वह अगले लोकसभा चुनावों में 70 से 80 सांसद जुटाने का तानाबाना बुनने में जुटी हैं, जिनकी संख्याबल के आधार पर वह अपना दावा ठोंक सकें। अगले प्रधानमंत्री के नाम पर चल रही इसी बहस और सियासी कवायद के मद्देनजर नईदुनिया और सामाजिक विषयों की शोध एवं विश्लेषण संस्था सी फोर ने अक्टूबर के पहले सप्ताह में एक व्यापक जन सर्वेक्षण कराया।
आडवाणी सबसे आगे
नईदुनिया-सी-फोर के इस सर्वेक्षण के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी और एनडीए के लिए यह एक अच्छी खबर हो सकती है कि अभी अगले प्रधानमंत्री पद की दौड़ में लालकृष्ण आडवाणी सबसे आगे चल रहे हैं। इससे भाजपा में भी आडवाणी विरोधियों की आवाज कमजोर होगी। भाजपा के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र के मुताबिक,'आडवाणीजी जैसा परिपक्व, तपा हुआ, कुशल और सख्त प्रशासक और बड़े कद का कोई नेता किसी अन्य दल के पास है ही नहीं।
भारतीय राजनीति में अटलबिहारी वाजपेयी के बाद अगर कोई प्रखर व्यक्तित्व है तो वह लालकृष्ण आडवाणी का ही है।' लेकिन सर्वेक्षण में लोगों ने यह भी कहा कि आडवाणी की अटलबिहारी वाजपेयी जैसी लोकप्रियता नहीं है। अपनी कट्टर हिन्दूवादी छवि बदलने की आडवाणी ने पूरी कोशिश की है और इसके लिए उन्हें संघ नेतृत्व की आलोचना का शिकार होना पड़ा। लेकिन सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं इससे उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है, तो दूसरी तरफ एक वर्ग उन्हें ऐसा अवसरवादी नेता भी मानता है जो मौके के हिसाब से अपनी राजनीति बदलने में माहिर है।
दूसरे नंबर पर मायावती
आडवाणी के बाद दूसरा नंबर बसपा अध्यक्ष और उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का है। मायावती के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क है कि उन्होंने जातीय उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष किया है और दलित महिला होने के नाते उन्हें प्रधानमंत्री बनने का मौका मिलना चाहिए लेकिन मायावती पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से लोगों ने उन्हें अवसरवादी नेता भी माना है। कांग्रेस इस बात पर संतोष कर सकती है कि भाजपा के गुजरात मॉडल और हिन्दुत्व के नायक नरेंद्र मोदी इस दौड़ में मनमोहनसिंह और सोनिया गाँधी दोनों से ही पीछे हैं। लोगों ने उनके गुजरात मॉडल सुशासन और विकास को पसंद तो किया लेकिन प्रधानमंत्री की दौड़ में मोदी को पांचवें नंबर पर रखा।
आतंकवाद सबसे बड़ा मुद्दा
बहुमत पाटिल के इस्तीफे के पक्ष में
भाजपा अगले लोकसभा चुनावों में आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर यूपीए और कांग्रेस को घेरना चाहती है । इस मुद्दे पर वह लोगों को यह समझाने में कामयाब होती नजर आ रही है कि आतंकवाद को लेकर यूपीए सरकार का रवैया नरम और कमजोर है। सर्वेक्षण के मुताबिक भी देश के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती आतंकवाद है।
दिल्ली बम धमाकों के बाद केंद्र सरकार पर गृहमंत्री शिवराज पाटिल के इस्तीफे के लिए बेहद दबाव पड़ा, लेकिन पाटिल अभी तक बचे हुए हैं। जबकि सर्वेक्षण में बहुमत 63 फीसदी लोगों की राय है कि गृहमंत्री शिवराज पाटिल को इस्तीफा दे देना चाहिए। यही नहीं, बहुमत इस पक्ष में है कि आडवाणी ही सबसे कारगर तरीके से आतंकवाद से निबट सकते हैं।
यह अलग बात है कि आतंकवाद को लेकर भाजपा जब भी कांग्रेस और केंद्र सरकार पर निशाना साधती है, कांग्रेस जवाब देती है कि भाजपा नेतृत्व वाली वाजपेयी सरकार के जमाने में जब आडवाणी गृहमंत्री थे तब संसद, अक्षरधाम, रघुनाथ मंदिर, जम्मू-कश्मीर विधानसभा, लालकिले पर आतंकवादी हमले हुए, कंधार विमान अपहरण कांड हुआ।
गृह मंत्रालय ने आँकड़े जारी करके यह बताने की कोशिश भी की है कि एनडीए राज में यूपीए राज की तुलना में देश में कुल आतंकवादी घटनाएँ ज्यादा हुईं और यूपीए राज में एनडीए राज की तुलना में ज्यादा आतंकवादी मारे गए। इसके बावजूद 41 फीसदी लोगों के मुताबिक भाजपा बेहतर तरीके से आतंकवाद से निपट सकती है, जबकि 31 फीसदी लोग कांग्रेस को इस मामले में बेहतर मानते हैं। 53 फीसदी लोगों ने कहा कि हाल के आतंकवादी हमले उनके मतदान के रुझानों पर असर डालेंगे।
मायावती-सोनिया के सब कायल
मायावती को प्रधानमंत्री पद पर देखने वालों में 33 फीसदी दलित महिला होने के नाते उन्हें देश के सर्वोच्च प्रशासकीय पद पर देखना चाहते हैं। सोनिया गाँधी के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क उनमें सत्ता का लालच न होना है। लोग उनके सामाजिक आचरण और भारतीयता से भी बेहद प्रभावित हैं। अगले प्रधानमंत्री के लिए नरेंद्र मोदी के पक्ष में राय देने वालों में 35 फीसदी सुशासन के उनके गुजरात मॉडल से प्रभावित हैं।
26 फीसदी आतंकवाद के खिलाफ उनकी लड़ाई से प्रभावित हैं। राहुल गाँधी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखने वालों में 36 फीसदी उन्हें युवा और ऊर्जावान नेता मानते हुए उन्हें मौका दिया जाने के पक्ष में हैं। 26 फीसदी के मुताबिक राहुल ही जाति, संप्रदाय और अपराधीकरण के चंगुल में फँसी राजनीति को सामाजिक सौहार्द और विकास की पटरी पर ला सकते हैं। 20 फीसदी उन्हें देश के भविष्य के प्रति बेहद स्वप्नदर्शी मानते हैं।
राहुल ऊर्जावान और स्वप्नदर्शी नेता
कांग्रेस के लिए राहत की बात यह हो सकती है कि पार्टी के अगले खेवनहार माने जाने वाले राहुल गाँधी भले ही प्रधानमंत्री की दौड़ में अभी पीछे हैं, लेकिन आडवाणी के बाद ऊर्जावान और भविष्य के स्वप्नदर्शी नेता के रूप में सबसे ज्यादा उन्हें ही पसंद किया गया है। जहाँ आडवाणी के पक्ष में 22 प्रतिशत लोगों ने राय दी वहीं राहुल के पक्ष में 19 प्रतिशत लोग हैं। बाकी सब इनसे पीछे हैं। इसके अलावा 36 फीसदी लोग राहुल को ही सबसे ज्यादा ऊर्जावान और भविष्यदृष्टा नेता के रूप में देखते हैं।
राहुल के पक्ष में एक तर्क यह भी है कि वही अकेले ऐसे नेता हैं जो देश को सांप्रदायिक और जातीय ध्रुवीकरण और अपराधीकरण की राजनीति से मुक्त कर साफ-सुथरी राह और सामाजिक सौहार्द की दिशा दे सकते हैं। लोग यह भी मानते हैं कि राजनीति में राहुल को अभी बहुत कुछ सीखना है। कांग्रेस प्रवक्ता मोहन प्रकाश कहते हैं, 'नई पीढ़ी हो या पुरानी, सबको राहुल गाँधी में नई उम्मीद और रोशनी दिखाई देती है। भाजपा या अन्य विपक्षी दलों के घिसे-पिटे नेतृत्व के पास न नए सपने हैं और न ही नई दृष्टि है। इसलिए देश राहुल को सबसे ज्यादा ऊर्जावान नेता के रूप में देखता है तो यह स्वाभाविक है।' (नईदुनिया)