Webdunia - Bharat's app for daily news and videos

Install App

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia
Advertiesment

History Of Diwali : दीपावली का पौराणिक और प्राचीन इतिहास, जानिए कब से मनाया जा रहा है यह पर्व

हमें फॉलो करें webdunia
बुधवार, 27 अक्टूबर 2021 (17:10 IST)
प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। वक्त के साथ इस त्योहार को मनाने के तरीके भी बदले हैं। माना जाता है कि दिवली के यह पर्व प्राचीन काल से ही मनाया जाता रहा हैं। इस उत्सव के प्रारंभ होने को लेकर कई तरह के तथ्‍य सामने आते हैं। आओ जानते हैं कि  दीपावली का पौराणिक और प्राचीन इतिहास क्या है।
 
 
पौराणिक तथ्य
 
यक्ष और दिवाली : कहते हैं कि प्रारंभ में दीवाली के पर्व यक्ष और गंधर्व जाति का उत्सव था। मान्यता है कि दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते थे। बाद में यह त्योहार सभी जातियों का प्रमुख त्योहार बन गया।
 
लक्ष्मी और दिवाली : सभ्याता के विकासक्रम के चलते बाद में धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी, क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मीजी की देव तथा मानव जातियों में मान्यता थी।
 
गणेश और दिवाली : कहते हैं कि लक्ष्मी, कुबेर के साथ बाद में गणेशजी की पूजा का प्रचलन भौव-सम्प्रदाय के लोगों ने किया। ऋद्धि-सिद्धि के दाता के रूप में उन्होंने गणेशजी को प्रतिष्ठित किया।
webdunia
कुबेर, लक्ष्मी और गणेशजी की दिवाली : तार्किक आधार पर देखें तो कुबेर जी मात्र धन के अधिपति हैं जबकि गणेश जी संपूर्ण ऋद्धि-सिद्धि के दाता माने जाते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी जी मात्र धन की स्वामिनी नहीं वरन ऐश्वर्य एवं सुख-समृद्धि की भी स्वामिनी मानी जाती हैं। अत: कालांतर में लक्ष्मी-गणेश का संबध लक्ष्मी-कुबेर की बजाय अधिक निकट प्रतीत होने लगा।
 
लक्ष्मी विवाह का दिन : दीपावली के साथ लक्ष्मी पूजन के जुड़ने का कारण लक्ष्मी और विष्णुजी का इसी दिन विवाह सम्पन्न होना भी माना गया है।
 
लक्ष्मी और काली : कहते हैं कि इस दिन एक ओर जहां समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए थे, वहीं इसी दिन माता काली भी प्रकट हुई थी इसलिए इस दिन काली और लक्ष्मी दोनों की ही पूजा होती है और इसी कारण दीपोत्सव मनाया जाता है।
  
बली और दिवाली : कहते हैं कि दीपावली का पर्व सबसे पहले राजा महाबली के काल से प्रारंभ हुआ था। विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बली की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू लोकवासी प्रत्येक वर्ष दीपावली मनाएंगे। तभी से दीपोत्सव का पर्व प्रारंभ हुआ। 
 
इंद्र और दिवाली : यह भी कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने राजा बली को पाताल लोक का स्वामी बनाया था और इन्द्र ने स्वर्ग को सुरक्षित जानकर प्रसन्नतापूर्वक दीपावली मनाई थी।
 
श्री राम और दिवाली :  कहते हैं कि भगवान श्रीराम अपना 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद पुन: लौट आए थे। कहते हैं कि वे सीधे अयोध्या न जाते हुए पहले नंदीग्राम गए थे और वहां कुछ दिन रुकने के बाद दीपावली के दिन उन्होंने अयोध्या में प्रवेश किया था। इस दौरान उनके लिए खासतौर पर नगर को दीपों से सजाया गया था। तभी से दिवाली के दिन दीपोत्सव मनाने का प्रचलन हुआ। 
 
श्री कृष्ण और दिवाली : ऐसा कहा जाता है कि दीपावली के एक दिन पहले श्रीकृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध किया था जिसे नरक चतुर्दशी कहा जाता है। इसी खुशी में अगले दिन अमावस्या को गोकुलवासियों ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं। दूसरी घटना श्रीकृष्ण द्वारा सत्यभामा के लिए पारिजात वृक्ष लाने से जुड़ी है। श्री कृष्ण ने इंद्र पूजा का विरोध करके गोवर्धन पूजा के रूप में अन्नकूट की परंपरा प्रारंभ की थी।
 
ऐतिहासिक तथ्‍य
 
सिंधु घाटी और दिवाली : नवीनतम शोधानुसार सिंधु घाटी की सभ्यता लगभग 8000 वर्ष पुरानी है। अर्थात ईसा से 6 हजार वर्ष पूर्व सिंधु घाटी के लोग रहते थे। मतलब रामायण काल के भी पूर्व। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और 3500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता की खुदाई में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे। मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की शृंखला थी मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं। इससे यह सिद्ध स्वत: ही हो जाता है कि यह सभ्यता हिन्दू सभ्यता थी जो दीपावली का पर्व मनाती थी।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

पुष्य नक्षत्र 2021 विशेष : Guru Pushya Nakshatra Special Stories