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श्रीराम को चढ़ावे की नहीं, हमारे विश्वास की जरूरत है

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Ayodhya Ram Mandir
"Quis custodiet ipsos custodes?"
पहरेदारों की निगरानी कौन करेगा?

लगभग दो हजार वर्ष पहले रोमन व्यंग्यकार जुवेनाल ने यह प्रश्न पूछा था। यह प्रश्न रोमन साम्राज्य के लिए था, लेकिन समय ने उसे सार्वभौमिक बना दिया। आधुनिक लोकतंत्रों से लेकर धार्मिक संस्थाओं तक, हर सभ्यता अंततः इसी प्रश्न के सामने आकर खड़ी होती है।

भारतीय सार्वजनिक जीवन में आज यह प्रश्न एक बार फिर प्रासंगिक हो उठा है।

और इस बार इसका संबंध किसी सरकार, निगम या राजनीतिक दल से नहीं, बल्कि उस नाम से जुड़ा है जो करोड़ों भारतीयों के लिए केवल धर्म नहीं, बल्कि संस्कृति, स्मृति और नैतिकता का पर्याय है—श्रीराम।

भारतीय सभ्यता के सबसे बड़े नैतिक और सांस्कृतिक प्रतीकों में से एक श्रीराम हैं। वे केवल एक देवता नहीं, बल्कि एक विचार हैं; केवल एक धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत स्मृति हैं। वे राजा भी हैं और निर्वासित भी। विजेता भी हैं और त्यागी भी। उन्होंने सत्ता पाई, लेकिन सत्ता के लिए नियम नहीं बदले। उन्होंने विजय प्राप्त की, लेकिन विजय के बाद अहंकार को स्थान नहीं दिया। उन्होंने राज किया, लेकिन स्वयं को राजधर्म से ऊपर कभी नहीं माना।

यही कारण है कि भारतीय परंपरा ने उन्हें केवल पूजा नहीं, बल्कि अनुकरण के योग्य माना।

विडंबना यह है कि मर्यादा के इस सबसे बड़े प्रतीक के नाम पर खड़ी हुई संस्थाओं के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न भी मर्यादा का ही है—सार्वजनिक विश्वास की मर्यादा का।

इतिहास हमें सिखाता है कि संस्थाएँ बाहर से कम और भीतर से अधिक कमजोर होती हैं।

रोमन साम्राज्य का पतन केवल बर्बर आक्रमणों की कहानी नहीं था; वह आंतरिक संस्थागत क्षरण की भी कहानी था। यूरोप के मध्यकालीन चर्च केवल धार्मिक संकटों से नहीं जूझे; वे वित्तीय और नैतिक संकटों से भी जूझे। सोलहवीं शताब्दी में मार्टिन लूथर का सुधार आंदोलन केवल धर्मशास्त्र का विवाद नहीं था; उसके केंद्र में चर्च की वित्तीय पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के प्रश्न भी थे।

भारत भी इससे अलग नहीं रहा।

दक्षिण भारत के चोल और विजयनगर काल के मंदिर केवल पूजा के स्थल नहीं थे; वे विश्वविद्यालय, नियोक्ता, वित्तीय संस्थान और स्थानीय अर्थव्यवस्था के केंद्र थे। मंदिरों को मिली भूमि, दान और संपत्तियों का विस्तृत विवरण पत्थरों पर अंकित किया जाता था ताकि समुदाय स्वयं उसका साक्षी बने।

पारदर्शिता आधुनिक लोकतंत्र का आविष्कार नहीं है।

यह सभ्यताओं का पुराना ज्ञान है।

अयोध्या आने वाला श्रद्धालु केवल धन नहीं देता।

वह विश्वास देता है।

किसी ने दानपात्र में बीस रुपये डाले होंगे। किसी ने परिवार की स्मृतियों से जुड़ा कोई आभूषण चढ़ाया होगा। किसी उद्योगपति ने करोड़ों रुपये का चेक सौंपा होगा। उनकी आर्थिक क्षमता अलग हो सकती है, लेकिन उनकी धार्मिक भावना का मूल्य समान है।

उनकी अपेक्षा भी समान है।

जो कुछ राम को अर्पित किया गया है, उसका उपयोग उसी ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ हो, जिसके साथ वह दिया गया था।

यहीं एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है।

ईश्वर और संस्थाएँ एक ही चीज़ नहीं हैं।

आस्था दिव्य हो सकती है, लेकिन उसका प्रबंधन हमेशा मानवीय होता है।

चमत्कार समुद्र को विभाजित कर सकते हैं, लेकिन वे खातों का मिलान नहीं करते। सोना अब भी तौला जाता है। नकदी अब भी गिनी जाती है। ताले अब भी मनुष्य लगाते हैं और रजिस्टर अब भी मनुष्य भरते हैं।

देवताओं ने इतिहास में अनेक चमत्कार किए होंगे, लेकिन लेखांकन उनमें कभी शामिल नहीं रहा।

यह कार्य हमेशा मनुष्यों के हिस्से आया है।

और मनुष्यों के साथ हमेशा एक शब्द जुड़ा रहता है—जवाबदेही।

आधुनिक लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि उसने मनुष्य को बेहतर बना दिया। उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने यह स्वीकार किया कि मनुष्य पूर्ण नहीं है।

इसी स्वीकार्यता से संस्थाएँ पैदा हुईं।

इसी स्वीकार्यता से ऑडिट पैदा हुआ।

इसी स्वीकार्यता से स्वतंत्र न्यायपालिका, सूचना का अधिकार और सार्वजनिक निगरानी की अवधारणा विकसित हुई।

विश्वास और सत्यापन को विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे का पूरक माना गया।

ब्रिटिश इतिहासकार लॉर्ड एक्टन ने लिखा था, "Power tends to corrupt, and absolute power corrupts absolutely."

शक्ति केवल राजनीतिक नहीं होती।

धार्मिक प्रतिष्ठा भी शक्ति होती है।

नैतिक वैधता भी शक्ति होती है।

सांस्कृतिक प्रभाव भी शक्ति होता है।

और हर शक्ति, चाहे वह किसी भी रूप में हो, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करती है।

समस्या तब शुरू होती है जब संस्थाओं पर उठे प्रश्नों को आस्था पर हमला घोषित कर दिया जाता है। ऑडिट को अविश्वास का पर्याय बना दिया जाता है। पारदर्शिता को विरोध और आलोचना को ईशनिंदा का रूप दे दिया जाता है।

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?

क्या कोई धार्मिक संस्था अपने अनुयायियों के प्रति जवाबदेह हुए बिना भी उनकी आस्था की संरक्षक बनी रह सकती है?

या फिर सच्चाई इसके ठीक विपरीत है—कि जवाबदेही ही आस्था की सबसे बड़ी संरक्षक होती है?

भारत में राम केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं रहे हैं। पिछले चार दशकों में उन्होंने भारतीय राजनीति, सार्वजनिक विमर्श और राष्ट्रीय कल्पना को गहराई से प्रभावित किया है। बहुत कम प्रतीकों ने आधुनिक भारत के राजनीतिक भूगोल को उतना बदला है जितना श्रीराम के नाम ने बदला।

लेकिन इतिहास एक कठोर शिक्षक है।

वह विशेषाधिकारों के साथ जिम्मेदारियाँ भी देता है।

जो प्रतीक जितना बड़ा होता है, उसके साथ जुड़ी संस्थाओं से समाज की अपेक्षाएँ भी उतनी ही बड़ी होती हैं।
भव्य मंदिर केवल भव्य स्थापत्य नहीं बनाते।

वे भव्य नैतिक दायित्व भी निर्मित करते हैं।

जिस मजदूर ने अपनी दिनभर की कमाई में से बीस रुपये निकाले और जिस उद्योगपति ने करोड़ों रुपये का दान दिया, दोनों की आस्था का मूल्य समान है।

दोनों का अधिकार समान है।

दोनों यह पूछ सकते हैं कि उनकी भेंट का क्या हुआ।

आस्था अमीर और गरीब में भेद नहीं करती।

जवाबदेही को भी नहीं करना चाहिए।

अंततः यह विवाद धन का नहीं है।

यह विश्वास का है।

सभ्यताओं की सबसे बड़ी संपत्ति उनके स्मारक नहीं होते। साम्राज्यों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी सेनाएँ नहीं होतीं। और मंदिरों की सबसे बड़ी पूँजी उनकी तिजोरियों में रखा सोना नहीं होता।

उनकी सबसे बड़ी पूँजी वह विश्वास होता है जिसे लोग स्वेच्छा से उनके चरणों में रख देते हैं।

श्रीराम को शायद कभी धन की आवश्यकता नहीं थी।

उन्हें हमेशा केवल हमारे विश्वास की आवश्यकता थी।

और विश्वास का स्वभाव बड़ा विचित्र होता है।

उसे अर्जित करने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।

उसे खोने में केवल एक क्षण। 

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