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बच्चों को खुशी ईदी में

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ईद उल अजहा
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ईद के दिन सब खुश रहते हैं। लेकिन बच्चों की खुशी का क्या कहना! उन्हें मेले में दोस्तों के साथ घूमना, अपनी पसन्द की चीज़ें ख़रीदना और खूब मौज-मस्ती करना अच्छा लगता है। इन सब कामों के लिए पैसों की जरूरत होती है और ईद के दिन पैसों की कोई कमी होती नहीं है। ईद के दिन ईदी जो मिलती है।

हर बड़ा अपने से छोटे को अपनी हैसियत के हिसाब से कुछ रुपए देता है, इसी रकम को ईदी कहते हैं छोटे बड़ों के सामने जाते हैं, सलाम करते हैं और ईद मुबारक कहते हैं, बस! हो गई ईदी पक्की। कुछ बच्चे यहाँ ज़िद भी कर लेते हैं और अपनी मुँह माँगी रकम हासिल कर लेते हैं।

जकात
इसलाम के पाँच जरूरी अरकान में से एक है जकात। जो ईद की नमाज से पहले अदा की जाती है। हर बालिग(वयस्क) मुसलमान को अपने माल (धन-दौलत) का चालीसवाँ हिस्सा गरीबों, यतीमों, बेसहारा लोगों को देना होता है।

हर वो शख्स मालदार समझा जाता है जिसके पास साढ़े बावन तोला चाँदी या साढ़े सात तोला सोना हो या इनकी क़ीमत के बराबर रुपया हो और उसे उसके पास रहते एक साल का अरसा हो चुका हो। तो उसे उस दौलत का चालीसवाँ हिस्सा दान करना है।

इस तरह जकात समाज में बराबरी खुशहाली का न सिर्फ पैगाम देती है बल्कि उस पर अमल करके भी दिखाती है।

सदका-ए-फित्र
जिस पर जकात का देना फर्ज है उस पर फितरा देना भी वाजिब है। फजर की नमाज के बाद से ईद की नमाज से पहले तक फितरा दे देना चाहिए। फितरा अपनी तरफ से और अपनी नाबालिग औलाद की तरफ से दिया जाता है।

एक फर्द की तरफ से पोने दो किलो गेहूँ या उसका आटा या इसकी कीमत के बराबर रुपया गरीबों और नादारों में तकसीम किया जाता है। इसी को सदका-ए-फित्र या फितरा कहा जाता है।

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