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बुराइयों से बचने की हिदायत

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कुरआन
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तीसरी तरावीह में कुरआन के तीसरे पारे आधे भाग से चौथे पारे की तिहाई पढ़ी जाएगी। इस भाग में इस्लाम की दो मशहूर जंगों- 'जंगे-बद्र' और 'जंगे-ओहद' का जिक्र है। इस जंग में दुश्मन फौज में एक हजार फौजें थीं और मुसलमान सिर्फ तीन सौ तेरह ही थे। फिर जीत मुसलमानों की ही हुई थी।

लेकिन इसके बाद हुई जंगे ओहद में मुसलमानों के एक हिस्से ने मोहम्मद सल्ल. की हिदायत नहीं मानी और दुश्मन का माल लूटना शुरू कर दिया। इसी भाग में मुसलमानों की कमजोरियों पर रोशनी डालते हुए उन्हें सही राह पर चलने का आदेश दिया गया।

इसी भाग में पैगंबर ईसा (अ.स.) और उनकी माँ मरियम (अ.स.) का भी उल्लेख है। बाद में माँ मरियम ने ईसा (अ.स.) को बिना बाप के जन्म दिया। इसी पारे में उनके अन्य अजूबों का भी जिक्र है। यहूदियों-ईसाइयों के बारे में स्पष्ट करते हुए बुराइयों से परहेज की हिदायतदी है। माल और औलाद निजात या मोक्ष का रास्ता नहीं है।

निजात इबादत और परेहजगारी से मिलती है। मुसलमान कुरआन पर ईमान रखता है और कुरआन की आयतों का मुआवजा नहीं लेता है। मोमिन के नेक अमल का सिला 'रब' के पास है। मुसलमानों को हिदायत दी कि वे अपने ईमान पर कायम रहते हुए मोर्चों पर डटे रहें।

चौथी तरावीह : कुरआन के चौथे पारे के अंतिम भाग और पाँचवें पारे के अंत तक की तिलावत में बिना तहकीकात के अफवाहों पर यकीन न करें। और मुसलमान अपने आचरण का खयाल रखें और अपने चरित्र की बुलंदी पर ध्यान दें। इसी भाग में यहूदियों-ईसाइयों की सांप्रदायिकता का भी जिक्र करते हुए कहा गया है कि सब आदम अलेहिस्सलाम की औलाद हैं। इसलिए अपने सामाजिक ढाँचे को न बिगाड़ें।

आदेश हुआ कि अनाथों के माल को वापस कर दो। इसी पारे में तयम्मुम की अनुमति भी दी गई है। कुरआन की इस तिलावत में कहा गया है कि आज तुम अपनी बीवियों के साथ इंसाफ नहीं कर सकते तो सिर्फ एक बीवी ही रखें। बीवियों को मेहर की रकम खुश होकर अदा करें। बदकार या बुरी आदतों में लिप्त औरतों को कैद में रखें और इसी तरह बद किरदार मर्दों को भी सख्त सजा दें। इसी भाग में जिन से निकाह जाइज है उसका जिक्र है।

कारोबार में खुद की इच्छा से मुनासिब मुनाफा जाइज है। जुल्म या हेराफेरी मना है। इसकी सजा दोजख (नरक) है। नशे और नापाकी की हालत में नमाज नाजाइज है। मुसलमान अमानत में खयानत न करें। जिहाद करने वालों को शहादत का दर्ज मिलेगा। सच्ची गवाही पर जोर देते हुए खुदा के साथ किसी को भी शरीक नहीं माना गया। सिर्फ एक अल्लाह की इबादत कुबूल है।

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