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निर्जला एकादशी 2022 में कब है? क्या है पौराणिक कथा, कैसे करें पूजन, जानिए विधि

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पं. हेमन्त रिछारिया

हमारे सनातन धर्म में व्रत एवं उपवासों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में अनेक प्रकार के व्रतों का उल्लेख हमें प्राप्त होता है। उन्हीं व्रतों में से एक है-एकादशी व्रत। एकादशी व्रत वैसे तो सभी सम्प्रदायों के साधकों एवं सभी श्रद्धालुओं को करना श्रेयस्कर होता है किन्तु वैष्णव सम्प्रदाय से जुड़े साधकों के लिए एकादशी व्रत विशेष महत्त्व रखता है। 
 
एकादशी व्रत करने से साधकों व श्रद्धालुओं को पुण्यफल की प्राप्ति होती है। एक वर्ष में लगभग 24 एकादशी आती हैं, अधिक मास की एकादशी भी यदि इसमें सम्मिलित कर दी जाए तो एकादशी व्रत की संख्या 25 हो जाती है। इन्हीं 25 एकादशी व्रतों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एकादशी होती है- "निर्जला-एकादशी", जिसे "भीमसेनी" एकादशी भी कहा जाता है। निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को होता है। इस वर्ष यह "निर्जला एकादशी" का व्रत 10 जून 2022 को है। शास्त्रानुसार केवल "निर्जला एकादशी" का व्रत करने मात्र से वर्ष भर की सभी एकादशियों के व्रतों का पुण्यफल प्राप्त हो जाता है। अत: जो साधक वर्ष की समस्त एकादशियों का व्रत कर पाने असमर्थ हों उन्हें "निर्जला एकादशी" का व्रत अवश्य करना चाहिए।
 
पौराणिक कथा-
एक बार पाण्डु पुत्र भीम ने व्यास जी से कहा कि मुझे भोजन अतिप्रिय है और मैं एक भी दिन भूखा नहीं रह सकता क्योंकि मुझसे क्षुधा सहन नहीं होती है। अत: आप मुझे बताईए कि मैं एकादशी का व्रत किस प्रकार करूं जिससे मेरा कल्याण हो? तब प्रत्युत्तर में व्यासजी से कहा कि -वत्स ! तुम्हें वर्ष भर के एकादशी व्रतों को करने की कोई आवश्यकता नहीं है तुम केवल "निर्जला एकादशी" का एकमात्र व्रत कर लो जिससे तुम्हें वर्ष की सभी एकादशियों के पुण्यफल की प्राप्ति हो जाएगी। भीमसेन ने व्यासजी कथनानुसार ऐसा ही किया और स्वर्ग की प्राप्ति की इसलिए "निर्जला एकादशी" को "भीमसेनी" एकादशी भी कहते हैं।
 
कैसे करें "निर्जला एकादशी" व्रत-
जो साधक व श्रद्धालु "निर्जला एकादशी" का व्रत करना चाहें वे प्रात:काल सूर्योदय के समय स्नान के उपरान्त विष्णु भगवान की पूजा-अर्चना कर "निर्जला एकादशी" व्रत का संकल्प करें। साधक-श्रद्धालुओं के लिए यह आवश्यक है कि वह पवित्रीकरण हेतु आचमन किए गए जल के अतिरिक्त अगले दिन सूर्योदय तक जल की बिन्दु तक ग्रहण ना करें एवं अन्न व फलाहार का भी त्याग करें तत्पश्चात अगले दिन द्वादशी तिथि में स्नान के उपरान्त पुन: विष्णु पूजन कर किसी विप्र को स्वर्ण व जल से भरा कलश व यथोचित दक्षिणा भेंट करने के उपरान्त ही अन्न-जल ग्रहण कर "निर्जला एकादशी" व्रत का पारण करें। शास्त्रानुसार "निर्जला एकादशी" का व्रत मोक्षदायी व समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
 
विशेष निवेदन-"निर्जला-एकादशी" व्रत का नियम व उपर्युक्त कथा शास्त्रानुसार श्रद्धालुओं की जानकारी हेतु वर्णित की गई है। समस्त साधकों व श्रद्धालुओं से निवेदन है कि वे अपनी शारीरिक क्षमता व स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए अपने स्वविवेक से "निर्जला एकादशी" व्रत करने का निर्णय करें।
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-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

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