Environment day 2020 : जल, सूर्य, धरती, वृक्ष, हिन्दू परंपरा में इनकी महिमा जानकर दंग रह जाएंगे आप

हिन्दुत्व वैज्ञानिक जीवन पद्धति है। प्रत्येक हिन्दू परम्परा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है। हिन्दू धर्म के संबंध में एक बात दुनिया मानती है कि हिन्दू दर्शन 'जियो और जीने दो' के सिद्धांत पर आधारित है। यह विशेषता किसी अन्य धर्म में नहीं है। हिन्दू धर्म का सह अस्तित्व का सिद्धांत ही हिन्दुओं को प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है।

वैदिक वाङ्मयों में प्रकृति के प्रत्येक अवयव के संरक्षण और संवर्धन के निर्देश मिलते हैं। हमारे ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है।हिन्दू धर्म का प्रकृति के साथ कितना गहरा रिश्ता है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि की स्तुति में रचा गया है।
 
परम्परा में जल को भी देवता मानते हुए नदियों को जीवनदायिनी कहकर सम्बोधित किया गया है। यही नहीं, नदियों, तालाबों एवं पोखरों में मल-मूत्र विसर्जन पर भी रोक लगायी गयी है। जैसा कि मनुस्मृति में भी कहा गया है कि- 
 
नात्सु मूत्रं पुरीषं वाष्टोवनं समुरसृजेत।
अमेध्यलिप्तभव्यद्वा लोहिवं वा विषाणि वा।।’
 
अर्थात जल में मूल-मूत्र, थूक अथवा अन्य दूषित पदार्थ, रक्त या विष का विसर्जन न करें। 
 
-वैदिक ऋषियों द्वारा जल की प्राप्ति के लिए भी कामना की गयी है, जैसा कि अथर्ववेद के भूमि सूक्त (12/1/30) में उल्लेख आया है कि-
 
‘शुद्धा व आपस्तन्वे क्षरन्तु..................।’
 
अर्थात हमारे शरीर में शुद्ध जल प्रवाहित होता रहे।
 
-हमारी नदियों के बारे में कहा गया है कि गंगा के दर्शन मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है  
 
‘गंगे, तव दर्शनात मुक्तिः।’
 
-‘गंगे व यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलस्मिन सन्निधि कुरू।।
 
भारतीय चिन्तन परम्परा में जल को इतनी महत्ता प्रदान की गयी है कि जल स्रोतों में प्रातः काल स्नान करने से पहले कंकड़ी मारकर सो रही गंगा को जगाया जाता है, तब उसमें स्नान किया जाता है और स्नान करने से पूर्व उनका चरण स्पर्श किया जाता है। इस तरह प्रत्येक जल स्रोत में गंगा का स्वरूप देखा जाता है। यही नहीं, सभी प्रकार के जल स्रोतों को देवता मानकर पूजा करने का विधान हमारी भारतीय संस्कृति में निहित है, ताकि इन जल स्रोतों का संरक्षण किया जा सके। 
 
-ऊर्जा के अजस्र स्रोत सूर्य को देवता मानते हुए ‘‘सूर्य देवो भव’’ कहा गया है। हम जानते हैं कि सूर्य के बिना इस पृथ्वी पर प्राणी जगत का अस्तित्व सम्भव नहीं है। सम्भवतः इसी तथ्य को ध्यान में रखकर हमारे मनीषियों ने ऋग्वेद में कहा है कि सूर्य से हमारा कभी भी वियोग न हो- 
 
‘नः सूर्यस्य संदृशो मा युयोधाः’ (ऋग्वेद, 2/33/1)
 
-सूर्य को स्थावर-जंगम की आत्मा कहकर पुकारा गया है  
 
‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्रच’ (ऋग्वेद, 1/115/1)
 
उपनिषदों में भी सूर्य को प्राण की संज्ञा दी गयी है
 
‘आदित्यो ह वै प्राणः (प्रश्नोपनिषद-1/5)
 
-सूर्य प्रकाश हमें निरन्तर प्राप्त होता रहे एवं सूर्य रश्मियों से हमारा जीवन संचारित होता रहे, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही घर का द्वार पूरब की तरफ अथवा उत्तर की तरफ रखने का प्रावधान हमारे मनीषियों द्वारा किया गया है। कारण कि इन दिशाओं में सूर्य प्रकाश निरन्तर मिलता रहा है  
 
‘प्राङ्गमुखमुदङ्ग मुखं वा विमुखतीर्थ कूटागारं कारयेत’
 
(चरक, शा.अ. 14/46)
 
- भारतीय चिन्तन परम्परा में वायु को देवता माना गया है। उपनिषदों में वायु की दैवीय शक्ति की संकल्पना का वर्णन किया गया है, जिसमे कहा गया है कि वायु ही प्राण बनकर शरीर में वास करती है  
 
‘वायुवै वै प्राणो भूत्वा शरीरमाविशत्।’
 
वेदों में वायु को औषधीय गुणों से युक्त माना गया है और प्रार्थना की गई है कि ‘हे वायु, अपनी औषधि ले आओ एवं यहाँ से सभी दोषों को दूर करो, क्योंकि तुम ही सब औषधियों से युक्त हो।’
 
‘आ वात वाहि भेषजं विवात वाहि पदुपः।
त्वंहि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे।। (ऋग्वेद-137/3)
 
-भारतीय चिन्तन परम्परा में वैदिक मंत्रों के माध्यम से मानव को यह शिक्षा दी गयी है कि वह पशु-पक्षियों को अपने से हेय न समझें एवं नदियों, पर्वतों, वृक्षों तथा प्रकृति के अन्य अंगों में देवी शक्ति का दर्शन करें। इसी दृष्टि से मानव एवं पशु-पक्षी को आश्रय प्रदान करने वाली इस पृथ्वी को माता एवं अपने को उसका पुत्र माना गया है
 
‘माता भूमिः पुत्रों अहं पृथिव्याः।’
 
अर्थात भूमि हमारी माता है एवं हम पृथ्वी की संतान हैं। यह पृथ्वी हमें अपना पुत्र मानकर उसी तरह निरन्तर अजस्र स्रोत के समान धन-धान्य प्रदान करती रहती है, जैसे कि गाय से दूध मिलता है
 
‘सहस्त्रं धारा द्रविणस्य मेदुहां,
ध्रवेत धेनुः अनवस्युरन्ती तथा
मणिं हिरण्यं पृथिवी ददातु में।
 
पृथ्वी के इस महत्व को समझ कर ही पृथ्वी को बार-बार प्रणाम किया गया है
 
नमो मात्रे पृथिव्यैः, नमो मात्रे पृथिव्यैः।
 
-वृक्षों को भी देवता माना गया है। भारतीय आयुर्विज्ञान के अनुसार विश्व में कोई भी वनस्पति ऐसी नहीं है जो औषधि न हो। सम्भवतः इसीलिए ‘श्वेताश्वरोपनिषद’ में वृक्षों को साक्षात ब्रह्म के समान माना गया है।
 
वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकः।
 
मत्स्यपुराण में भी कहा गया है-
 
दशकूप समावापी दशवापी समोहृदः।
दशहृदः समः पुत्रो, दश पुत्रो समोवृक्षः।
 
अर्थात दस कुंओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब है, दस तालाब के बराबर एक पुत्र है एवं दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष है।
 
वृक्षों के प्रति ऐसा प्रेम एवं अनुराग शायद ही किसी अन्य देश की संस्कृति एवं चिन्तन परम्परा में मिलता हो, जहां वृक्ष को पुत्र से भी उच्च दर्जा दिया गया है एवं पूजा की जाती है, वहां वृक्षों को काटने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती है। सम्भवतः इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर वृक्षों को पूजनीय एवं वंदनीय माना गया है एवं ‘भामिनी विलास’ में कहा गया है कि-
 
‘धत्ते भरं कुसुमपत्रफला वली नां धर्मव्यथां।
वहाति शीत भवा रुजश्च।।
यो देहमर्ययति चान्यसुखस्य हेतोस्तस्मै।
वादाव्यगुरवे तस्ये नमोस्तु।।’
 
अर्थात जो वृक्ष फूल, पत्ते एवं फलों के बोझ को उठाए हुए धूप की गर्मी एवं शीत की पीड़ा को बर्दाश्त करता है एवं दूसरों के सुख के लिए अपना शरीर अर्पित कर देता है, उस वन्दनीय श्रेष्ठ वृक्ष को नमस्कार है। ‘नृसिंह पुराण’ में भी वृक्ष को ब्रह्म स्वरूप मानकर उसे आदर प्रदान किया गया है  
एतद् ब्रह्म परं चैव ब्रह्म वृक्षस्य तस्य तव।
 
जातक कथाओं में तो वृक्षों को हमारी सभी आवश्यकताओं को पूरा करने वाले कल्पवृक्ष के रूप में कल्पना की गयी है ...
 
सर्वकामदा वृक्षाः।
 
महाभारत एवं रामायण में कल्पवृक्षों का विवरण प्रस्तुत है। महाभारत के भीष्म पर्व में वृक्ष को सभी मनोरथों को पूरा करने वाला कहा गया है
 
‘सर्वकामः फलाः वृक्षा।’
 
महाभारत के आदि पर्व में किसी गांव के अकेले फले-फूले वृक्ष को चैत्य के समान पूजनीय माना गया है   
 
एको वृक्षा हियो ग्रामे भवेत पर्णकलान्वितः।
चैत्यो भवति निज्ञांतिर्चनीयः सपूजितः।।
 
‘स्कन्दपुराण’ में वृक्ष में विष्णु का वास माना गया है- 
 
‘एको हरिः सकल वृक्षगतो विभाति।’
 
‘अथर्ववेद’ में पीपल के वृक्ष को देवसदन माना गया है- 
 
‘अश्वत्थः देवसदन।’
 
‘विष्णु धर्म सूत्र’ में कहा गया है कि प्रत्येक जन्म में लगाये गये वृक्ष अगले जन्म में संतान के रूप में प्राप्त होते हैं-
 
वृक्षारोपयितु वृक्षाः परलोके पुत्राः भवन्ति।
 
‘चाणक्य नीति’ में कहा गया है कि एक वृक्ष से वन उसी प्रकार सुन्दर लगता है, जिस प्रकार अकेले पुत्र से कुल
 
एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगंधिना।
वासितं स्याद वन सर्व सुपुत्रेण कुलं यथा।
 
‘वाराह पुराण’ में उल्लेख आया है कि जो पीपल, नीम या बरगद का एक, अनार या नारंगी का दो, आम के पांच एवं लताओं के दस वृक्ष लगाता है, वह कभी नरक में नहीं जाता
 
अश्वस्थमेकं पिचुमिन्दमेकं व्यग्ग्रेषमेकं दसुपुष्पजातीं।
द्वे-द्वे दाडिम मातुलुंगे पंचाभ्ररोपी, नरकं न याति।।
 
तुलसी के पौधे के बारे में कहा गया है जिस घर में तुलसी की नित्य पूजा होती है, उसमें यमदूत भी नहीं आते
 
तुलसी यस्य भवने तत्यहं परिपूज्ये।
तद्गृहं नोवर्सन्ति कदाचित यमकिंकरा।।
 
चरक संहिता कहती है कि मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए वायु, जल, धरती, देश, काल एवं पंचमहाभुतों की गुणसंपन्नता में कभी होने के कारण संसार धीरे-धीरे विनाश की ओर बढ़ता है।
 
युगे युगे धर्मपाद : क्रमेणानेन हीयते।
 
गुण पादश्च भूतानामेवं लोक: प्रलीयते॥
 
अर्थात मनुष्य का कर्तव्य है कि वह प्रकृति की न केवल स्वच्छता और पवित्रता का ध्यान रखें बल्कि सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह अपने जीवन की रक्षा के लिए इनका संरक्षण करें। अन्यथा धरती पर से शनै: शनै: जीवन समाप्त हो जाएगा और इसकी आहट आज बदलते पारिस्थितिकीय वातावरण में देखी जा सकती है।
 
विष्णुधर्म सूत्र, स्कंदपुराण एवं याज्ञवल्क्यस्मृति में वृक्ष को काटने को अपराध माना गया है और उसके लिए राजा द्वारा दण्ड का विधान बनाया गया है। 
 
वृक्षों की तरह ही पशु-पक्षियों की सुरक्षा की भावना भी भारतीय चिन्तन परम्परा में युगों-युगों से निहित है। यही कारण है कि हिंसक एवं अहिंसक तथा विषधर जीव जन्तुओं को भी किसी न किसी देवता का वाहन बनाकर इनकी श्रेष्ठता प्रदान करते हुए इनकी सुरक्षा एवं संरक्षण का प्रावधान किया गया है। यही कारण है कि इन पशु-पक्षियों की भी पूजा का विधान बनाया गया है। गाय एवं बैल तो भारतीय संस्कृति की पहचान हैं। 
 
‘बाघ, शेर, चीता, हाथी, चूहा, गरुण, सर्प, कच्छप, हंस, उल्लू और आदि छोटे एवं बड़े हिंसक एवं अहिंसक सभी जीव-जन्तुओं का संबंध देवी देवताओं से उनके वाहन के रूप में जोड़कर उन्हें सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करने की जो उदात्त भावना भारतीय चिन्तन परम्परा में है, वह अन्यत्र कहां। 

विभिन्न वृक्षों में विभिन्न देवताओं का वास माना जाता है। पीपल, विष्णु और कृष्ण का, वट का वृक्ष ब्रह्मा, विष्णु और कुबेर का माना जाता है, जबकि तुलसी का पौधा लक्ष्मी और विष्णु, सोम चंद्रमा का, बेल शिव का, अशोक इंद्र का, आम लक्ष्मी का, कदंब कृष्ण का, नीम शीतला और मंसा का, पलाश ब्रह्मा और गंधर्व का, गूलर विष्णु रूद्र का और तमाल कृष्ण का माना जाता है। 
 
इसके अलावा अनेक पौधे ऐसे हैं, जो पूजा-पाठ में काम आते हैं, जिनमें महुआ और सेमल आदि शामिल हैं। वराह पुराण में वृक्षों का महत्व बताते हुए कहा गया है- जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, एक बड़, दस फूल वाले पौधे या बेलें, दो अनार, दो नारंगी और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह नरक में नहीं जाएगा। अपने दायित्व व शीलन करते हुए अपना जीवन निर्वाह करें, तो निश्चित है कि पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा एवं पारिस्थितिकी संतुलन बना रहेगा।

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