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मैं आग हूं : पराली से लेकर प्रदूषण तक और पुराणों से पर्यावरण तक पढ़ें मेरी गाथा

हमें फॉलो करें Agni tatva
शनिवार, 4 जून 2022 (17:14 IST)
5 June World Environment Day Agni tatva: पांच तत्वों से मिलकर धरती बनी है। ये पांच तत्व है- धरती, जल, वायु, अग्नि और आकाश। में से वायु को देखा नहीं जा सकता है लेकिन महसूस किया जा सकता है। आकाश को न तो देखा जा सकता है और न ही मनसूस किया जा सकता है। महसूस करने के लिए अंतरिक्ष में झांकना होगा। अग्नि एक ऐसा तत्व है जो अदृश्य रूप में रहने के बावजूद दृश्यमान भी है। इसे देखा भी जा सकता है और महसूस भी किया जा सकता है।
 
1. क्या है अग्नि : अग्नि से जल की उत्पत्ति मानी गई है। हमारे शरीर में और धरती पर अग्नि ऊर्जा के रूप में विद्यमान है। अग्नि तत्व ऊर्जा, ऊष्मा, शक्ति और ताप का प्रतीक है। ये तत्व ही भोजन को पचाकर शरीर को बल और शक्ति वरदान करता है। अग्नि के कारण भी धरती संकट में है।
 
2. पुराणों में अग्नि : हिन्दू पुराणों के अनुसार ब्रह्मा के पुत्र अग्निदेव ही शरीरस्‍थ और ब्रह्मांड में स्थिति अग्नि को संचालित करते हैं। ऐसा कहते हैं कि अग्नि किस तरह उत्पन्न और संरक्षित करें इसकी खोज भृगु ऋषि ने की थी। अग्नि कई प्रकार की होती है जैसे एक जठराग्नि, पांच भूताग्नियां- भौमग्नि, आप्याग्नि, आग्नेयाग्नि, वायव्याग्नि और आकाशाग्नी। सात धात्वाग्नियां- रसाग्नि, रक्ताग्नि, मान्साग्नि, मेदोग्नि, अस्थ्यग्नि, मज्जाग्नि और शुक्राग्नि। वेदों में अग्नि को वैश्वानर कहा गया है। यानी विश्‍व को कार्य में संलग्न करने वाली। वेदों के अनुनसार तीन तरह की अग्नि होती है- पार्थिव अग्नि, अंतरिक्ष अग्नि और द्यौस्थान अग्नि। मतलब एक अग्नि वह जो धरती पर विचरण करती है, दूसरी वो जो विद्युत के रूप में अं‍तरिक्ष में विचरण करती है और तीसरी वह जो सूर्य के रूप में विद्यमान है।
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अग्नि के आंकड़े (Fire figures):
1. लाखों वर्ष पूर्व मनुष्य ने सर्वप्रथम पत्‍थर और लकड़ी से अग्नि पैदा करना सीखा। यानी रगड़कर अग्नि पैदा करते हैं। आज भी माचिस की तीली हो या अन्य कोई साधन इसी तरह अग्नि पैदा की जाती है। कहते हैं कि पुरा पाषाण काल में इसकी खोज हुई थी। वैज्ञानिक कहते हैं कि इसकी खोज होमो सेपियंस ने की थी। इज़रायल में जिन जगहों पर आग के इस्तेमाल के सबूत मिले हैं, वो तो करीब सात लाख 80 हज़ार साल पुरानी है। 
 
2. अग्नि का प्रकाश स्वरूप जीवन देता है और ताप स्वरूप जीवन को भस्म कर देता है। आग खतरनाक जरूर है लेकिन आग ने ही इंसानों को कड़ाके की ठंड और जंगली जानवरों से बचाया भी है। आग के कारण ही इंसान भोजन को पकाकर खान सीखा।
 
3. घर में जलने वाला विद्युत, आकाश की बिजली और सूर्य की अग्नि दोनों ही मूल रूप में एक ही है। जलना, आंच, धूप और प्रकाश अग्नि ही है। मनुष्य के भीतर भी अग्नि भोजन को पचाने का कार्य करती है। 
 
4. ज्वालामुखी से निकलने वाली अग्नि धरती के भीतर है और सूर्य के बढ़ते ताप से जंगलों में आग लग जाती है।
 
5. आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों से अग्नि का ही जन्म होता है, जिसके चलते धरती संकट में है। कई ज्वलनशील पदार्थ से जीवन संचालित होता है। यह ईंधन का एक रूप है जैसे कोयला, पेट्रोल, घासलेट, लकड़ी आदि। लेकिन जब बड़ी संख्या में इनमें आग लग जाती है तो यह बहुत ही भयानक होती है।  अग्नि को जलाए रखने के लिए दो ही चीजों की आवश्यकता होती है। पहला ऑक्सीजन और दूसररा ज्वलनशील पदार्थ।
 
6. धरती पर अनावश्यक अग्नि के जलने से जलवायु और पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। जैसे पराली जलाना, जंगल की आग आदि। खेतों में पराली के रूप में जलाई गई अग्नि से वायू प्रदूषण का स्तर बढ़ा है। पराली जलाने से सांस लेने की समस्या, आंखों में जलन, गले की समस्या के साथ ही मृदा में कार्बनिक पदार्थ की क्षति, जमीन में पाए जाने वाले लाभकारी सूक्ष्म जीवाणुओं का सफाया, मुख्य एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी इत्यादि प्रमुख है। इसे पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचता है। 
 
8. जंगल में लगी आग से जैव विविधता, वनस्पति को नुकसान पहुंचा है और कई वन्य जीव लुप्त भी हो चले हैं। जिससे चलते पारिस्थितिकी संकट उत्पन्न हो गया है। 
 
9. प्राचीनकाल से लेकर अब तक आग की लाखों घटनाएं हुए हैं। धरती पर गिरने वाले उल्लापिंडों ने जो आग उत्पन्न की थी उससे एक समय पूर्व डायनासोर की प्रजाति लुप्त हो गई। 
 
10. शोध में दुनिया भर के 410 इलाकों के आग लगने के चारकोल रिकॉर्ड से पता चला कि चरने वाले बड़े जानवरों के लुप्त होने के कारण आग लगने की घटनाओं में वृद्धि हुई। चरने वाले विशालकाय जानवरों में ऊनी मैमथ, विशाल बाइसन और प्राचीन घोड़े शामिल थे। कुछ वर्षों के भीतर ही भरत सहित दुनिया के सभी बड़े जंगलों में आग का भयानक रूप देखने को मिला है। हाल के वर्षों में जंगलों में लगने वाली आग की घटनाएं काफी ज्यादा तेजी से बढ़ी हैं। 2030 तक ऐसी घटनाओं में 14 फीसदी और इस सदी के मध्य यानी 2050 तक 30 फीसदी की वृद्धि देखने को मिल सकती है। याने आने वाले समय में संपर्ण धरती आग की लपटों में जल रही होगी। 

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