कोपनहेगन : एक उम्मीद, एक चिंता

अब जाकर हरा-हरा सूझा दुनिया को

कपिल पंचोली
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प्रकृति सभी मनुष्य की जरूरतें पूरी कर सकती है पर लालच किसी एक का भी नहीं। इस एक पंक्ति में जलवायु परिवर्तन की वजह साफ होती है। डेनमार्क की राजधानी कोपनहेगन में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विभिन्न देश एक बार फिर बातचीत के लिए जब जुटने वाले हैं तो दुनिया के बड़े-छोटे सभी देशों की यह साझा चिंता दिखती है कि पर्यावरण को लेकर अब ढिलाई बरतना विनाश को अनदेखा करना होगा।

पिछले तीन दशक पर्यावरण की घोर उपेक्षा के रहे हैं। विकास की चक्की को तेज करने के चक्कर में दुनिया के हर देश ने पर्यावरण का जमकर दोहन किया है। यह मनुष्य के बढ़ते लालच का ही परिणाम है कि दुनिया की आबोहवा बहुत तेजी से बदली है। आज दुनिया के तकरीबन सभी देश बाढ़, सूखे और तूफान जैसी आपदाओं से जूझ रहे हैं। मौसम की तमाम भविष्यवाणियाँ झूठी साबित हो रही हैं। खाद्यान्न संकट बढ़ रहा है। पिछले दिनों '2012' नाम की फिल्म में दिखाई गई फंतासी ने दुनिया भर में डर पैदा किया कि कुछ ही सालों में दुनिया विनाश के मुँह में समा जाएगी। डरे हुए लोगों को नासा ने संभालते हुए कहा कि अभी ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा है, तो लोगों की जान में जान आई। पर जिस तरह के हालात हैं उनमें समझने वालों के लिए इशारा काफी है कि हम कहाँ खड़े हैं।

विनाश की आहट...
दुनिया के विभिन्न देशों में विनाश की आहट सुनाई दे रही है। अमेरिका में पिछले वर्षों में वर्षा की स्थिति बहुत असामान्य हुई है। तूफानों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। भारत जैसे देश में जलवायु परिवर्तन को मौसम चक्र में हो रहे बदलाव में देखा जा रहा है। मौसम में अचानक आ रहे बदलाव ने भारत के सामने खाद्यान्न उत्पादन का गहरा संकट पैदा किया है। सूखा और बाढ़ दोनों कमर तोड़ रहे हैं। वैश्विक तापमान में वृद्धि के साथ ही हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।

आने वाले समय में अगर ग्लोबल वॉर्मिंग इसी तरह जारी रही तो भारत की सदानीरा नदियाँ पहले बाढ़ पैदा करेंगी और फिर इनमें पानी नहीं रहेगा। भारत की समुद्री सीमा 7500 किमी है और वैश्विक तापमान में वृद्धि से समुद्र का जलस्तर इतना उठ जाएगा कि कई इलाके जलमग्न हो जाएँगे, तब इनमें रहने वाली आबादी की बसाहट की समस्या प्रमुख होगी। ग्लोबल वॉर्मिंग से आने वाले सालों में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में पानी की किल्लत और भी बढ़ेगी।

समुद्री तूफानों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ेगी। योरपीय देशों में गर्मियों के दिनों में होने वाली बारिश गायब हो जाएगी और पानी की कमी परेशानी पैदा करेगी। जंगलों की आग व्यापक पैमाने पर तबाही करेगी। उत्पादन तेजी से गिरेगा। इन देशों में गर्मी से अनेक बीमारियाँ होंगी। दुनिया के अधिकांश देश जलवायु परिवर्तन के कारण पानी व खाद्यान्न कमी, बीमारियों, तूफान और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से भयंकर रूप से प्रभावित होंगे। दुनिया के विभिन्न देशों में जलवायु में परिवर्तन के थोड़े-बहुत लक्षण नजर भी आने लगे हैं, हालाँकि इन लक्षणों की वजह ग्लोबल वॉर्मिंग ही है, यह स्पष्ट नहीं हो पाया है।

पर्यावरण की चिंता और दो दशक
पर्यावरण की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव 1992 में ब्राजील के रिओ-डी-जेनेरियो में हुआ 'पृथ्वी सम्मेलन' था। इस सम्मेलन के बाद 1997 में क्योटो संधि की शर्तें सामने आईं। क्योटो संधि में देशों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया था। पहले विकसित देश जिनकी अर्थव्यवस्था 1992 में शिफ्ट हो रही थी (जो पर्यावरण के लिए विकास की योजनाएँ बंद नहीं कर सकते थे), दूसरे वे विकसित देश जो विकासशील देशों की मदद ले रहे थे और तीसरी श्रेणी में विकासशील देश। क्योटो संधि की शर्तों को मानने वाले पहली तरह के विकसित देशों को अपने यहाँ ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 1990 में जितना था, उससे 5.2 प्रतिशत कम करना था।

दूसरे तरह के विकसित देशों को थोड़ी कम और विकासशील देशों को थोड़ी ज्यादा रियायत इस प्रोटोकॉल में दी गई थी। संधि की शर्तों पर सख्ती से अमल की ज्यादा उत्सुकता किसी भी देश ने नहीं दिखाई। अमेरिका, जो सबसे बड़ा ग्रीन-हाउस गैस उत्सर्जक देश है, ने इस संधि से खुद को बाहर ही रखा और क्योटो संधि एक मखौल बनकर रह गई। क्योटो के बाद 2007 में बाली (इंडोनेशिया) में होने वाली बैठक भी बेअसर रही। अब 2012, जो क्योटो संधि की शर्तों के पालन की डेडलाइन तय की गई थी, उससे पहले कोपनहेगन में होने जा रही बैठक पर सारी आशाएँ आ ठहरी हैं।

कोपनहेगन : एक उम्मीद
कोपनहेगन में 7 से 18 दिसंबर तक आयोजित जलवायु परिवर्तन सम्मेलन संयुक्त राष्ट्र संघ के बुलावे पर आयोजित किया जा रहा है। इसमें सिर्फ क्योटो की शर्तों की नाकामी पर ही चर्चा होगी। यह बैठक अगर किसी कारण सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है तो इसलिए कि इस संधि का भविष्य क्या होगा और क्या अमेरिका पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझेगा।

चीन ने इस बैठक के कुछ दिनों पहले यह कहकर एक बड़ा कदम उठाया है कि वह इस बैठक में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगाने की नई सीमा तय कर सकता है। गौरतलब है कि अमेरिका और चीन इस समय सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाले देशों में हैं। अमेरिका ने अब तक पर्यावरण की चिंता करने वाली शर्तों से खुद को बाहर रखा है। यह ऐसा देश है जिसने अपने स्वार्थों को पर्यावरण से ज्यादा अहमियत दी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि वह अपनी पीठ पर कितनी पाबंदियाँ लादता है।

कार्बन फुटप्रिंट कम करना जरूरी
कार्बन फुटप्रिंट प्रति व्यक्ति या संस्था द्वारा उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा है। इसकी गणना कार्बन डाय ऑक्साइड में की जाती है। हर व्यक्ति का कार्बन फुटप्रिंट उसके द्वारा उपयोग में लाई गई वस्तुओं या सुविधाओं द्वारा वातावरण में कितनी कार्बन डाय ऑक्साइड उत्सर्जित होती है, इससे पता लगता है। हर व्यक्ति और संस्था अगर अपने कार्बन फुटप्रिंट को कम करने का प्रयास करे तो ग्लोबल वॉर्मिंग से निपटा जा सकता है। विकसित देशों में प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट बहुत अधिक है जबकि विकासशील देशों में यह तेजी से बढ़ रहा है। ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों का उपयोग और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का अभाव बढ़ते कार्बन फुटप्रिंट की बड़ी वजह है।

2007 में विभिन्न देशों के कार्बन फुटप्रिंट पर गौर करें तो संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, अमे‍रिका, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैड जैसे देश सूची में बहुत ऊपर है। जबकि भारत जैसे देश का कार्बन फुटप्रिंट बहुत ही कम है। जब तक हर व्यक्ति अपने कार्बन फुट प्रिंट को कम करने के बारे में नहीं सोचेगा, ग्लोबल वॉर्मिंग को कम नहीं किया जा सकता है। अमेरिका अपने यहाँ विकास की गति को बनाए रखने के लिए किसी तरह की लगाम लगाने के पक्ष में नहीं है और विकासशील देश विकास को अपनी जरूरत बताते है। ऐसे में देखते हैं कि कोपेनहेगन में ऊँट किस करवट बैठते हैं।

सुरक्षित धरती के लिए कम करना होगा
बढ़ती आबादी
प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत
जीवाश्म ईंधन का प्रयोग
ज्यादा दोहन की मानसिकता

बढ़ाना होगी
ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों पर निर्भरता
जंगल और वनस्पतियाँ
प्रदूषण रहित उद्योगों की संख्या

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