'धरती की उम्मीदों' का सम्मेलन

एक ग्रह जिसे हम 'घर' कहते हैं

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आज शुरू हो रहे कोपेनहेगन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में ऐसे बहुत से मुद्दों पर सहमति बनना जरूरी है जिनसे भविष्य में सभी देश एकजुट होकर अपने घर 'पृथ्वी' को ग्लोबल वॉर्मिंग से बचा सकें।

जिन प्रमुख मुद्दों पर चर्चा होनी है उनमें हैं, विकसित देशों के कार्बन उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य, विकासशील देशों के लगातार बढ़ते कार्बन उत्सर्जन को कम करना और जलवायु परिवर्तन से होने वाले खतरों से बचने के उपायों विशेषकर गरीब देशों की मदद पर चर्चा के अलावा कार्बन क्रेडिट को लेकर भी चर्चा होनी है।

ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे का एहसास होने के बाद इस पर विचार और काबू पाने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयासों में एकजुटता लाने के लिए 1997 में जापान के शहर क्योटो में पहले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन का आयोजन किया गया।

ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते हो रहे जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण पाने के लिए तय हुआ कि ग्लोबल वॉर्मिंग का सबसे बडा कारण और कारक है कार्बन डाऑक़्साइड का बेतहाशा उत्सर्जन जिसके लिए हर देश को कार्बन का उत्सर्जन कम करना शुरू होगा। इसलिए तय किया गया कि प्रमुख औद्योगिक कंपनियों को अपनी तकनीक में सुधार लाना होगा। उन्हें इसके लिए प्रेरित करने के लिए कार्बन क्रेडिट का सिद्धांत शुरू किया गया।

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क्या है कार्बन क्रेडिट : कार्बन क्रेडिट के सिद्धांत के तहत जो कंपनियाँ स्वच्छ तकनीक का इस्तेमाल कर कार्बन उत्सर्जन कम करेंगी उन्हें कार्बन क्रेडिट मिलेगा और ऐसा करने वाली कंपनियाँ अपना सामान उन देशों में बेच सकेंगी जहाँ कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है। भारत में भी रिलायंस इंडस्ट्रीज़, मफ़तलाल इंडस्ट्रीज़, गुजरात अम्बुजा सीमेंट और एसीसी जैसी कई बड़ी कंपनियों ने कार्बन क्रेडिट का सफलतापूर्वक उपयोग किया है।

क्या है कार्बन उत्सर्जन : कार्बन उत्सर्जन मुख्यत: मानवीय गतिविधियों जैसे औद्योग‍िकीकरण, वाहनों से निकलने वाली गैसें, जैव ईंधन को जलाने और जंगलों को काटने के कारण होता है।

लगातार कटते जंगलों से वातावरण में कम होती आवश्यक ऑक्सीजन से धरती गरम होती जा रही है जिसे वायुमंडल में कार्बन की मात्रा बढ़ रही है, इसे ग्लोबल वार्मिंग कहा जाता है। इसके दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए जरूरी है कि धरती के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक की बढ़ौत्री नहीं हो। इसके लिए कोशिश करना होगी कि धरती के वातावरण में कार्बन की मात्रा में 250 अरब टन या 2.5 लाख मेगाटन से ज्यादा न हो।

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एक अनुमान के आधार पर 2.5 लाख मेगाटन कार्बन 9 लाख मेगाटन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर होता है। वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि वातावरण में कार्बन की मात्रा को 7.5 लाख मेगाटन तक सीमित रखा जाए तो इस बात की 75 प्रतिशत संभावना है कि ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस तक नियंत्रित किया जा सकेगा।

इस बार कोपेनहेगन में उम्मीद की जा रही है कि सभी देश इस बात पर सहमत हो जाए कि समग्र प्रयासों से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी की जाए। जंगलों की कटाई कम की जाए। ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों को बढ़ावा दिया जाए। लेकिन इसके लिए बहुत से देशों को अपने हित भी छोड़ने होंगे जिससे उन्हें हानि भी होगी पर अपने घर 'पृथ्वी' को बचाने के 'लाभ' के सामने यह हानि कुछ भी नहीं है। यह धरा सुंदर और सुरक्षित रहे इस दिशा में सम्मेलन के प्रयास सफल सिद्ध हो। यह 'उम्मीद' बस इस बेबस धरा की नहीं बल्कि हर सच्चे पर्यावरण प्रेमी और पृथ्वीवासी की होना चाहिए।

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