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‘कामसूत्र’ की धरती भारत में ‘सहवास’ पर इतना संकोच क्‍यों?

यौन संबंधों को लेकर खुली किताब था प्राचीन काल, नए दौर में हो गया टैबू

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नवीन रांगियाल

‘जब तक गुप्‍त रहेगा, तब तक रोग रहेगा’... जल्‍दी ही रिलीज होने वाली एक फिल्‍म की पंच लाइन कुछ यही है। यह फिल्‍म यौन गुप्‍त रोग और उसके इलाज को लेकर है। भारत में यौन विषय को लेकर बहुत संकोच और हिचकिचाहट रही है। जहां प्राचीन समय में यौन विषय एक खुली किताब रहा है तो वहीं आज के दौर में यह बंद कमरों की बात है। यौन विषय पर लिखे गए साहित्‍य और मंदिरों में स्‍थापित मूर्ति कला और प्रतीकों की मदद से हमने जानने की कोशिश की कि आखिर उस दौर में कितना खुलापन था, जबकि आज यह ‘जब तक गुप्‍त रहेगा, तब तक रोग रहेगा’ इस पंक्‍ति को चरितार्थ कर रहा है।

भारत ‘कामसूत्र’ की धरती है। यानी वो जगह जहां रतिक्रिया या सहवास के विषय पर अब तक का सबसे बड़ा, वैज्ञानिक और विस्‍तृत साहित्‍य रचा गया। इस किताब के लेखक थे ऋषि वात्स्यायन।

महाराष्‍ट्र की अजंता-एलोरा की गुफाओं से लेकर मध्‍यप्रदेश के खजुराहो के मंदिरों में तक में भारत में विकसित हुईं रति-क्रियाओं (INTERCOURSE) के प्रतीक मिलते हैं। भारत में कहीं चित्रों के रूप में है तो कहीं मूर्तिकला के रूप में सहवास क्रियाओं की ये खुली गवाही मिलती है। लेकिन अगर हम ऋषि वात्स्यायन के युग से साल 2022 में आज की विकसित दुनिया में लौटें तो शारीरिक संबंधों और रति-क्रियाओं के बारे सिर्फ एक फुसफुसाहट सी सुनाई पड़ती है। एक संकोच और हिचकिचाहट साफ नजर आती है। जबकि वात्स्यायन से लेकर ओशो तक ने खुलकर यौन संबंधों पर बात की है। अब इतना संकोच है कि यौन से जुड़े शब्‍द कहीं दीवारें भी न सुन लें।
नए भारत में सेक्‍स या अपनी सेक्‍सुअलिटी के बारे में बात करना एक टैबू है। एक ऐसा विषय जिसके बारे में सार्वजनिक बात करना बहुत हद तक अपराध की श्रेणी में आता है।

किसी मर्द या पुरुष की यौन आकांक्षाएं तो दूर अपनी सेक्‍सुअल प्राथमिकता (LGBTQ) के बारे में बात करना भी यहां चौंकाने वाला बयान है। बावजूद इसके कि भारत में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 को खत्म कर इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया।

यौन कर्म : कहीं पाप, कहीं सुख का सिद्धांत
325 ईस्वी में कैथलिक चर्च ने जब अपने कायदे स्‍थापित किए तो उसमें साफ कहा गया कि 'शरीर एक खराब चीज है, शारीरिक सुख फिजूल की बात है और देह को पाने की इच्छा रखना पाप है।' उनका मानना था कि सेक्स का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ संतान को जन्म देना है। हालांकि भारत में स्‍थिति बिलकुल विपरीत थी। ठीक इसी समय में ऋषि वात्स्यायन गंगा के तट पर बैठकर ‘कामसूत्र’ की रचना कर रहे थे और कह रहे थे कि यौन संबंध से पैदा हुआ आनंद एक बहुत अच्छी चीज है, यह कला है और आदमी की कामयाबी के लिए इसका अहम योगदान है। बता दें कि भारत में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का सिद्धांत भी रहा है।

यौन संबंध... सफल जीवन की गारंटी
इसके इतर अगर भारत के यौन संबंध के इतिहास और अपने पूर्वजों की निगाह से देखें तो उस दौर में यह विषय आज से कहीं ज्‍यादा खुला और संकोच-विहीन विचार था। उसकी अभिव्‍यक्‍ति इतनी मुखर थी कि ऋषि वात्स्यायन के कामसूत्र को फॉलो करना स्‍त्री और पुरुष के लिए सेक्‍सुअल संतुष्‍टि, आध्‍यात्‍मिक व भावनात्‍मक जुड़ाव की गारंटी माना जाता था।

भारत में यौन संबंधों के प्रतीक : कोणार्क, खजुराहो और अजंता एलोरा 
कामसूत्र :
13वीं सदी के प्राचीन भारत में यौन संबंधों पर खुलकर चर्चा होती थी और इसे एक सब्‍जेक्‍ट के तौर पर पढ़ाया जाता था। 'कामसूत्र' भारत में ईसा से 4 सदी पूर्व से लेकर ईसा के बाद की दूसरी सदी के बीच लिखा गया। प्राचीन भारत में यौन संबंधों के खुलेपन को लेकर कई सबूत और गवाह मिलते हैं।

कोणार्क और अजंता एलोरा : ओडिशा के कोणार्क के सूर्य मंदिर में तराशे गई नग्न मूर्तियां महज एक बानगीभर है। बुद्ध धर्म से जुड़ी अजंता- एलोरा की गुफाओं में कलाकृति के रूप में स्‍त्रियों की नग्न मूर्तियां आज भी मौजूद हैं।
खजुराहो : मध्यप्रदेश के खजुराहो के मंदिर करीब एक हजार साल पुराने हैं। इन्हें चंदेल राजाओं ने 950 से 1050 ईस्वी में बनाया था। इन मंदिरों में यौन संबंध का हर एंगल नजर आ जाएगा। औरत-मर्द की सहवास के दौरान की वे सारी पोजीशन और एंगल यहां उकेरे नजर आ जाएंगे। यहां एक जोड़े के बीच यौन की सबसे मुखर अभिव्‍यक्‍ति दिखेगी तो एक साथ तीन लोगों (threesome) के बीच रति-क्रियाएं अभिव्‍यक्‍त की गई हैं। इन सारे प्रतीकों ने भारत के सेक्‍स के इतिहास को बेहद सरल तरीके से दिखाया गया है।

चाह है, लेकिन मुखर क्‍यों नहीं
ऐसा नहीं है कि आज के नए भारत में यौन आकांक्षाएं कम हो गई हैं। आज भी ये आकांक्षाएं उतनी ही तीव्र और भड़कीली हैं, जितनी प्राचीन काल में रही हैं। लेकिन इसे लेकर नए दौर में वो मुखरता और खुलापन नहीं है। सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप वाली मॉडर्न एज में भी सेक्‍स एक टैबू है। आज यह सिर्फ बंद कमरों और दीवारों के पीछे का सब्‍जेक्‍ट है। जिसकी वजह से यह एक कुंठा में बदल गया है, जिसके परिणाम हमें ग्‍लानि, अपराध और दुष्‍कर्म के रूप में मिलते हैं।
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सेक्‍स पर ओशो : ‘सेक्स से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं’
ओशो भारत के बहुत बड़े और क्रांतिकारी विचारक हुए हैं। उन्‍होंने स्‍त्री- पुरुष के संबंधों पर खुलकर बोला और लिखा। उनकी लिखी किताब ‘संभोग से समाधि की ओर’ इस विषय पर क्रांतिकारी दस्‍तावेज माना जाता है। ओशो कहते हैं ‘प्रेम का प्राथमिक बिंदु सेक्स ही है और जो लोग सेक्स को घृणा के नजरिए से देखते हैं, वे कभी प्रेम कर ही नहीं सकते’। हालांकि ओशो सेक्‍स में लिप्‍त होने की बात नहीं कर रहे हैं, उनका कहना है पहले सेक्‍स से पार पा लो और फिर समाधि की ओर मुड़ जाओ। हालांकि उनके इस विचार को बेहद मिसअंडरस्‍टैंड भी किया गया
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एक्‍सपर्ट व्‍यू : सेक्सुअल मिथ्स शोषण का कारण
सेक्स की बातचीत को लेकर जो टैबू है वो हमारी ही मनोदशा का प्रोजेक्शन है। स्थापित सिद्धांतों को टटोलने की नितांत आवश्यकता है। सेक्स के प्रति बातचीत के प्रति असहजता ने पोर्न इंडस्ट्री और सेक्स क्राइम को बढ़ावा दिया है। सेक्स एजुकेशन जैसे नवाचार लाना व्यक्ति को न केवल सेक्स के टैबू से मुक्त करेगा, बल्कि पोर्न जैसे अस्वस्थ शिक्षकों से भी बचाएगा। सैकड़ों युवा सेक्सुअल मिथ्स के चलते आर्थिक और मनोवैज्ञानिक शोषण का शिकार होते हैं।- डॉ सत्‍यकांत त्रिवेदी, मनोचिकित्‍सक, भोपाल

क्‍या है सेक्‍स कुंठा की हकीकत?
  • गूगल का एक सर्वे बताता है कि ऑनलाइन पोर्नोग्राफी देखने में भारत दुनिया में छठे स्‍थान पर है।
  • इंडिया टुडे के एक सेक्स सर्वे के मुताबिक अहमदाबाद में जबसे ज़्यादा 78 फीसदी लोग (महिला और पुरुष दोनों) ऑनलाइन पोर्न देखते हैं।     
  • हाल ही में कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन के दौरान भारत में सबसे ज्‍यादा पोर्न फिल्‍में देखी गईं, या पोर्न साइट को सर्फ किया गया। 
  • एक रिसर्च कहती है कि भारत में शादी से पहले यौन संबंधों के ग्राफ में जबरदस्त इजाफा हुआ है।
  • रिसर्च कहती है कि अर्बन इंडिया में 18 से 24 साल के 75 फीसदी लोग शादी से पहले चोरी छिपे सेक्स कर लेते हैं।
  • बिहार में पापुलेशन कौंसिल के सर्वे के मुताबिक 14.1 प्रतिशत अविवाहित युवकों और 6.3 प्रतिशत अविवाहित युवतियों ने शादी के पहले शारीरिक संबंध बनाए।

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